Thursday, 18 December, 2008

श्रद्धा

श्रद्धा

(४५)


प्रगति के सोपानों की तस्वीरें तूने

कमाई के चढ़ते ग्राफों में ही ढाली है

कर दर-किनार मानव-मूल्यों को

कमाने की आपा-धापी ही पाली है


निःशक्त बनोगे कालांतर में जब

अपने तो क्या, ग्राफ भी बेमानी होंगें


जो रमें मानव-मूल्यों में श्रद्धा से

तो सेवार्थियों ने भीड़ जमा ली है

Thursday, 20 November, 2008

श्रद्धा

श्रद्धा

आज प्रीति जी का ब्लॉग देखा ,जो हू-ब-हू प्रस्तुत है

बाकि...गंगा मैया पर छोङ दो।

पाप करो तुम, बाकि,
गंगा मैया पर छोङ दो,
खाओ पियो तुम, बाकि,
गंगा मैया पर छोङ दो।।
ऐश करो तुम, बाकि,
गंगा मैया पर छोङ दो,
गंद करो तुम, बाकि,
गंगा मैया पर छोङ दो।।
शहर का कचरा लाकर,
गंगा मैया पर छोङ दो,
फूंक दो मुझको, बाकि,
गंगा मैया पर छोङ दो,
हर-हर गंगे बोल,
बाकि,गंगा मैया पर छोङ दो।।

पढ़ कर प्रसन्नता हुई की किसी ने तो आवाज बुलंद की।

आज इसी को मैं श्रद्धा जोड़ना चाहता हूँ , ताकि हम यह भी समझ सकें की जिम्मेदार कौन है और कालांतर में फल भी किसे भुगतना पड़ेगा.........................

बुरे कामों का बुरा नतीजा तो भोगना ही पड़ेगा।
हर-हर गंगे बोल, बाकि,
गंगा मैया पर छोङ दो।।
कौन क्या कर्म कर रहा है, किस भावः से कर रहा है, गंगा मैया तो ये भी देखती रहती है। कालांतर में फल भी उसी के अनुरूप प्राप्त होते हैं.
कृष्ण ने भी गीता में कर्म को ही प्राथिमिकता दी है, फल कालांतर की वस्तु है।
गंगा मैया पवित्र रूप में ही उत्सर्जित होती है, और उसे
*गन्दा आज के तथाकथित पढ़े-लिखे,
*तथाकथित सभ्य कहलाने वाले,
*अर्थतंत्र के स्तम्भ बनने वाले औद्योगिक घरानों के कर्ता-धरता,
*शहरों की व्यवस्था को चलने वाले व्यवस्थापक, आदि
ही तो इसके लिए जिम्मेदार हैं।

इनमें से शायद ही कोई तबका अनपढ़ हो जिसे समझाने के जरूरत है।

गंगा मैया को गन्दा कह कर उसका मखौल भी तो यही तबका उडाता है।
बेचारे गाँव के श्रद्धालु आज भी गंगा मैया में बिना किसी गंदी भावना के लाखों की संख्या में स्नान करते हैं, सच्चे मन की श्रद्धा रखने वालों को ही तो गंगा मैया संरक्षण प्रदान करती है।
ऐसे ही श्रद्धालु लोगसच्चे मन से उवाचते है ........
" हर-हर गंगे"

Friday, 7 November, 2008

श्रद्धा

श्रद्धा
(४४)
युग नहीं कभी भी है बदला करता
स्वार्थियों के भाव बदल जाया करते हैं
आतुरता गुलाब-फूल की कोमलता में
तो काँटें अपना अहसास करा जाते हैं
बेमानी सारे कर्तव्य,अधिकार,धाराएं वे
है नाचे जब स्वार्थियों की अँगुलियों पे
त्याग स्वार्थ, जुडोगे जब श्रद्धा से तो
विष-प्याले अमृत हो जाया करते हैं

Monday, 13 October, 2008

करें तो क्या करे ?????????????

करें तो क्या करें??????????????
मित्रो,
अक्सर हमें हिदायतों भरे ऐसे लेख पात्र- पत्रिकाओं में पढने को मिल जातें हैं, जो देखने-सुनने में तो काफी लुभावने, और मार्गदर्शक से लागतें हैं, पर यदि अमल में लेते हैं तो " लौट के बुद्धू घर को आए" सरीखा हाल होता है।
ऐसा ही एक लेख हमें इकोनोमिक्स टाइम्स में मिला जो हु-ब-हु प्रस्तुत है.......


नौकरी कर रहे हैं, तो जानिए अपने अधिकारों
3 Oct, 2008, 1510 hrs IST, इकनॉमिक टाइम्स
टेक्स्ट:
वॉल स्ट्रीट के डरावने सपने ने कई भारतीयों को पहली बार आर्थिक अनिश्चितताओं के रूबरू लाकर खड़ा कर दिया है। खास तौर से उन लोगों को जिन्होंने अपने करियर के दौरान मंदी का दौर नहीं देखा था। नौकरी पर खतरा मंडराने लगा है और भविष्य की चिंता में कई लोगों की नींदें उड़ गई हैं। वित्तीय भूचाल की ताकत ने ज्यादातर निराशावादी विश्लेषकों को भी हिलाकर रख दिया है। बीते कुछ महीनों से अमेरिकी अर्थव्यवस्था में मंदी का असर पूरे आर्थिक पटल पर देखा जा सकता है। भारतीय और बहुराष्ट्रीय , कई कंपनियां ' राइट साइजिंग ' की रणनीति अपना रही हैं। यानी कंपनियां छंटनी कर रही हैं। हालांकि , कई जानकारों ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर भरोसा जताया है , लेकिन हालात में सुधार की उम्मीद बांधने के साथ-साथ हमें बदतर स्थितियों के लिए तैयार भी रहना चाहिए। अगर आपको जानकारी मिलती है कि नौकरी पर चलने वाली तलवार की धार तेज की जा रही है , तो कुछ बातों का ध्यान रखना फायदेमंद साबित हो सकता है।
फाइन प्रिंट पर गौर एचआर कंसल्टिंग फर्म द हेड हंटर्स इंडिया के संस्थापक मुख्य कार्यकारी अधिकारी और प्रबंध निदेशक क्रिस लक्ष्मीकांत ने कहा , ' ऑफर लेटर को गौर से पढ़ना काफी महत्वपूर्ण होता है लेकिन कई लोग इसे नजरअंदाज करते हैं। ' इसे पढ़ने से आप यह समझ सकते हैं कि मंदी के वक्त आपकी कंपनी क्या कदम उठा सकती है।
अधिकार जानिए करियरनेट कंसल्टिंग के को-फाउंडर और सीईओ विक्रम श्रॉफ ने कहा , ' कर्मचारियों को इस बात की जानकारी होनी चाहिए कि उनका नियोक्ता नोटिस दिए बिना या फिर उस अवधि की एवज में मुआवजा दिए बगैर आपकी सेवाएं खत्म नहीं कर सकता। कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियां बाहर निकाले जाने वाले कर्मचारियों को सेवरेंस पैकेज भी देती हैं। नीतियों के मुताबिक , इसके तहत 3-6 महीने का वेतन दिया जाता है। ' निशित देसाई असोसिएट्स में एचआर लॉ के हेड विक्रम श्रॉफ ने कहा , ' अगर लागू होने वाली श्रम कानून और रोजगार अनुबंध या कर्मचारी हैंडबुक में शामिल प्रावधानों में कोई टकराव होता है तो वे प्रावधान लागू होंगे जो कर्मचारियों के पक्ष में होंगे। '
किसी कंपनी के बोरिया-बिस्तर समेटने की स्थिति में कंपनी एक्ट , 1956 दूसरे कर्जदारों के बकाए के सेटलमेंट से पहले कंपनी की संपत्ति पर कर्मचारियों (कंपनी की कर देनदारी के साथ) को पहला हक देती है। इसके अलावा संस्थान की वित्तीय सेहत कितनी खराब ही क्यों न हो , लेकिन कर्मचारियों का प्रोविडेंट फंड (पीएफ) सुरक्षित रहे। श्रॉफ ने कहा , ' संस्थान के दिवालिया घोषित करने का निर्णय होने या कारोबार समेटने के हालात में यह सुनिश्चित करने के लिए श्रम कानूनों के तहत प्रावधान हैं कि संपत्ति बांटे जाते वक्त दूसरे कर्ज के अलावा कर्मचारी भविष्य निधि की ओर नियोक्ता की देनदारी को चुकाने में प्राथमिकता बरती जाए। पीएफ में हिस्सेदारी के लिए नियोक्ता की ओर से गठित निजी ट्रस्ट पर भी असर नहीं पड़ना चाहिए।
' कानूनी उपाय अगर कर्मचारी को लगता है कि उसे गलत तरीके से बर्खास्त किया गया है तो वह इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट , 1947 के तहत कानूनी उपाय कर सकता है।
कानूनी सलाहकार अतुल नागार्जन के मुताबिक , ' अगर कंपनी का प्रबंधन कर्मचारी की सेवाएं खत्म करने के लिए नोटिस देता है और वह उसे चुनौती देना चाहता है तो पत्र और मुआवजे का चेक मिलने और कंपनी को विरोध पत्र लिखकर ऐसा कर सकता है। इसके बाद वह कर्मचारी इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट के तहत श्रम अदालत में नियोक्ता के फैसले को चुनौती दे सकता है। मुआवजे का चेक लेने के बावजूद इस तरह की शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।
' मालिकाना हक बदलना अगर आपके संस्थान के मालिकाना हक दूसरे हाथों में जाता है तो आपको नए अनुबंध के नियम-कायदों को स्पष्ट रूप से समझने की जरूरत होती है। दास ने कहा , ' ऐस मामलों में कर्मचारियों को नए प्रबंधन दर के साथ पिछले प्रबंधन की ओर से किए गए वादों पर चर्चा करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वह इस पर अमल भी करे। ' नागार्जन ने कहा , ' कई बार ऐसा होता है कि कर्मचारियों को ऐसे संकेत दिए जाते हैं कि उन्हें तनख्वाह में इजाफे के साथ नई कंपनी में नियुक्त किया गया है और बॉन्ड पर दस्तखत करने की जरूरत होगी। हालांकि इस स्तर पर वे पिछली सेवा से जुड़े फायदे गंवा देंगे और ऐसी स्थिति में याचिका दायर करना भी काफी मुश्किल हो जाएगा। इसलिए कर्मचारियों को बॉन्ड पर दस्तखत करते वक्त सतर्क रहना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनकी सेवा की निरंतरता जारी रहे क्योंकि ऐसा न होने पर गेचुएटी , अवकाश , वेतन वृद्धि और प्रमोशन पर असर हो सकता है।
' जब हालात हों मुश्किल अगर आपको नौकरी से निकालने की पर्ची लेने से जुड़े दुर्भाग्यपूर्ण क्षण का सामना करना पड़े तो आपको कुछ महत्वपूर्ण उपाय करने होंगे। खर्च के चलन और होल्डिंग क्षमता यानी बैंक डिपॉजिट और फिक्स्ड डिपॉजिट जैसी तरल संपत्तियों पर गौर करते हुए पुनर्गठन योजना तैयार करनी होगी। इस प्रक्रिया के बाद आप खुद को तीन तरह की स्थिति में खड़ा पा सकते हैं। पहला , कर्ज चुकाने में सक्षम लेकिन हाथ में नकदी न हो। दूसरा उधार चुकाने में असमर्थ और हाथ में नकदी न होना और तीसरा आरामदायक हालात। इसमें आप वित्तीय रूप से सक्षम भी होंगे और बकाया चुकाने के लिए आपके हाथ में पर्याप्त तरल निवेश भी होगा। अगर आप पहली श्रेणी में आते हैं यानी अगर आपकी कुल संपत्ति एक साल के खर्च को पूरा कर सकती है , लेकिन तरलता 3 महीने के खर्च से निपटने में अक्षम है तो आपको प्रॉपर्टी , सोना और बीमा पॉलिसी को नकदी में भुनाने पर गौर करना चाहिए। पार्क फाइनेंशियल एडवाइजर्स के निदेशक स्वप्निल पवार ने कहा , ' आपको खर्च पर कठोरता के साथ तलवार चलाने की जरूरत नहीं है लेकिन कार बेचना और तरलता की कमी वाली संपत्तियों को भुनाने पर गौर किया जा सकता है। मसलन , अगर किसी व्यक्ति ने 2004 में कोई मकान खरीदा था तो उसका बाजार भाव बढ़ गया होगा। इसके अलावा एक हद तक उसका लोन भी चुका दिया गया होगा , ऐसे में संपत्ति के खिलाफ टॉप अप लोन हासिल करने का रास्ता साफ हो सकता है। '

ऐसा सार गर्भित लेख आपको भी पसंद आया होगा, उम्मीद है, पर वस्तुतः जो होता है, वैसा मैंने अपने कमेन्ट में लिखा और उससे निपटने का हल माँगा, पर कोई ठोस हल अभी तक भुक्तभोगी कर्मचारियों/अधिकारीयों हेतु नही मिला। मेरे कमेन्ट भी आप सभी के लिय एक बार पुनः प्रस्तुत हैं .............

पाठकों की राय
नौकरी कर रहे हैं, तो जानिए अपने अधिकारों को

Chandra Mohan Gupta , Jaipur , says:एक बढ़िया जानकारी प्रकाशित करने के लिए धन्यवाद। किंतु यह भी बताएं कि यदि कंपनी प्रबंधन मुआवजा देने या नोटिस देने से बचने के लिए तरह-तरह से परेशान कर कंपनी के नुकसान की ज़िम्मेदारी कर्मचारी पर डाले तो क्या कर्मचारी परेशान होकर, डरकर स्वतः नौकरी न छोड़ देगा? यदि ऐसा करता है और नियोक्ता इस्तीफ़ा स्वीकार करके भी बकाया वेतन नही देता या आजकल देने का वादा कर साल निकल देता है तो भुक्तभोगी कर्मचारी या अधिकारी क्या करे? अधिकारी या कर्मचारी कंपनी लॉ के हिसाब से मैंनेजमेंट का हिस्सा है तो क़ानून क्या कहता है और भुक्तभोगी कैसे निपटे?3 Oct 2008, 0932 hrs ईस्ट

हमारे इस कमेन्ट पर इसी पत्र में एक समस्या भरा सपोर्टिंग कमेन्ट निम्न प्रकार और छपा
nj , us , says:मेकॉन लिमिटेड रांची नाम की कंपनी में भी ऐसा ही हुआ। वहां वीआरएस फॉर्म भरवाकर 1200 कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया गया। इसका दोषी वहां का मैनेजमेंट है। 9 Oct 2008, 0732 hrs ईस्ट

आप सभी से अनुरोध है कृपया अपने विचार , सुझाव भुक्तभोगी कर्मचारियों / अधकारियों के निहितार्थ प्रेषित करें.

Thursday, 2 October, 2008

कुकिंग गैस की समस्या और शिकायत की अपेक्षा

कुकिंग गैस की समस्या और शिकायत की अपेक्षा

१५अगस्त के बाद आज २ अक्तूबर को आप सब से रु-ब-रु हो रहा हूँ अपने ब्लॉग पर इकोनोमिक टाइम्स के आज के अंक में मेरी लिखित पाठकों की राय हु-ब-हु पढ़वाने के लिए .........

पाठकों की राय
सीधे तेल कंपनियों से कर सकेंगे रसोई गैस के लिए शिकायत

chandra Mohan Gupta , Jaipur , says: समझ में नहीं आता कि कंपनी वाले शिकायतों के लिए बलि का बकरा क्यों चाहते हैं? समस्याएं हैं तो ही पत्र-पत्रिकाओं में इस ओर ध्यान दिलाया जाता है। कंपनी के ज़िम्मेदार अधिकारी एसी रूम से निकलकर शहर की गैस एजेंसियों पर वेश बदलकर आकस्मिक निरीक्षण करें तो दूध का दूध और पानी का पानी अपने आप हो जाएगा।

*आवश्यकता कार्रवाई की, नए नियम बनाने की नहीं।
*आवश्यकता ज़िम्मेदार बनने की है, टालमटोल करने की नहीं।
* आवश्यकता समस्या पैदा ही नहीं होने देने की है, समस्याओं के पैदा होने और उनके समाधान खोजने हेतु जनता की शिकायतों के अंबार की नहीं।
* हंडी का एक ही चावल देखा जाता है, न की हंडी के सभी चावलों को, फिर ज़िम्मेदार अधिकारी को क्या इतना भी वेतन नही मिलता कि वह हंडी में चावल ठीक तरह से पकाकर जनता को परोसें।
*गैस सेवा भी उपभोक्ता अदालत के कार्य क्षेत्र में आनी चाहिए, ताकि जनता एजेंसी वालों और संबंधित अधिकारी को भी कटघरे में खड़ा कर सके।2 Oct 2008, 1035 hrs ईस्ट

कृपया अपनी राय से अवगत कराएं.

Thursday, 14 August, 2008

स्वंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर विशेष

क्योंकि "निःस्वार्थी", "संतोषी" "कर्मयोगी", "ज्ञानी" न थे हम
( भाई नीरज जी का आदेश है कि एक ही विषय बोरियत का अनुभव करा देता है, सो आज एक नया विषय उठा कर गद्य के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ, प्रयास कितना सार्थक है, फ़ैसला आप करे)
वर्ष २००८ के प्रारंभिक माह में गुजरात के माननीय राज्यपाल पंडित नवल किशोर शर्मा जी ने राजस्थान जन सतर्कता समिति के संस्थापक अध्यक्ष एवं स्वतन्त्रता सेनानी प्रताप भानु खंडेलवाल के पच्चासीवें जन्मदिवस के मौके पर आयोजित अमृत महोत्सव में मुख्य अतिथि के पद से बोलते हुए कहा था ...
"देश में भ्रष्टाचार जड़ों तक प्रवेश कर गया है। इसके खिलाफ आवाज बुलंद करना ही काफी नही है, बल्कि मुहिम छेड़ना जरुरी है"।
बात सुनने में जोरदार लगती है, सो तालियाँ भी खूब बजी, पर मैं यंहा कुछ प्रश्न उठाना चाहता हूँ कि
१ महामहिम को स्पस्ट करना चाहिए कि पत्ते, टहनी, तना एवं जड़ हैं कौन- कौन?
2 स्वतंत्रता प्राप्त किए साठ वर्ष हो गए, महामहिम को स्पष्ट करना चाहिए कि सत्ता में रहते हुए स्वदेशी नेताओं ने भ्रष्टाचार को जड़ों तक पहुचने में कितना सहयोग किया?
३ भ्रष्टाचार का जड़ तक फैलना स्वयं में लचर कानून -व्यवस्था की पोल खोलता है , फिर हमारे स्वदेशी नेता बिगत साठ वर्षों से शासन किस अधिकार और जवाबदेही से करते रहे और कर रहे हैं?
४ जनता कानून कानूनन हाथ में ले नही सकती, फिर मुहिम छेडें कैसे?कानून हाथ में लेकर व्यवस्था बनाये रखने का अधिकार सरकार के पास है, लेकिन वह भ्रष्टाचार मिटाने के लिए आज तक कुछ क्यों न कर सकी ?
.......................................................................................................................................................
अफ़सोस होता है गांधी के भारत में गांधी के नाम पर वोट मांग कर राज़ करने वाले नेताओं पर!
गांधी ने कभी कोई बात बिना प्रयोग किए कही नही, पर आज के नेता सिर्फ़ और सिर्फ़ कहतें हैं, प्रयोग करने को निह्साय जनता को उकसाते हैं ।
आज देश में है कोई ऐसा नेता , जो सिर्फ़ भ्रष्टाचार के खात्में के लिए प्रतिबद्ध हो तथा पाँच वर्षों के अन्दर अपनी छेड़ी मुहिम से देश में भ्रष्टाचार का खात्मा कर सके। यदि किसी के पास भी ऐसी किसी मुहिम की ठोस रुपरेखा , दिशा-निर्देश हो तो सूचित करें, साथही यह भी बताये कि यह किस तरह से सम्भव होगा एवं यथार्थ रूप में आएगा।
किसी सत्तासीन व्यक्ति का समय-असमय भ्रष्टाचार के विरूद्ध कुछ कहना कुछ इस तरह ही लगता है....

भाषण देने से होगा क्या
जो करके न दिखलाया तो
नहीं, अब नही सहन होगा
जो फिर से ललचाया तो
आ कर्म क्षेत्र में, हो लथपथ
पाओ पहले अनुभव,तुम्हे शपथ
श्रधा से मतवाले दौड़ पडेंगे
ज्ञान ज़रा सा भी छलकाया तो

अपने संक्षिप्त जीवन काल में भ्रष्टाचार के बारें में मेरे व्यक्तिगत विचार निम्न चार पंक्तियों में हैं ....
देश का है कोढ़ "भ्रष्टाचार" सभी कहते हैं
भाषणों में इसे मिटाने का संज्ञान सभी लेते हैं
फिर भी, क्यों न मिटा पाए इसे आज तक हम
क्योंकि "निःस्वार्थी","संतोषी","कर्मयोगी","ज्ञानी"न थे हम

मुहिम कभी भी न भाषणों से शुरू होती है न बात करने से! इसके लिए गहन इच्छा शक्ति , निःस्वार्थ भावना एवं प्रायोगिक विचारों की आवश्यकता होती है।
मुहिम चाणक्य की थी, पर राजा चन्द्र गुप्त को बनाकर,
मुहिम गांधी की थी पर प्रधानमंत्री स्वयं न बने,
मुहिम जयप्रकाश की थे पर प्रधान मंत्री स्वयं न बनें

रामायण की बात हम सभी करतें नही थकते, बहस , विवादों में भी उलझतें हैं, पर थोड़ा इस ओर भी गौर करें की रावण रुपी राक्षस का वध करने के लिए श्री राम को वनवास का रास्ता क्यों चुनना पड़ा? इसे बेहतर समझाने के लिए थोड़ा अपने चारों ओर की जिंदगी देखें..........ग़लत काम करने वालों को उत्साह एवं साथ बिंदास मिला करता है, पर इनका विरोध करने वालों को प्रताड़ना एवं लोगों से कटाव ही मिलता है. नाहक पचडे में क्यों पड़ते हो अपना काम करो.श्री राम भी इसी तरह अयोध्या में रह कर कम करते तो उन्हें भी तरह तरह के ऐसे ही कमजोर करने वाले विचारों का सामना करना पड़ता.किंतु,जंगल में जहाँ मानव का साथ ही नही, कमजोर करने वाले विचार कौन देगा? जंगल में उन्हें साथ भी मिला तो पशु-पक्षियों जैसे प्राकृतिक जीवों का, जो प्रकृति के संस्कारित नियमों से बंधें हैं.ऐसों से हे उन्हें ढाढस मिला, संबल मिला सहयोग मिला और अंततः मिली विजय श्री. किन्यु जब वही श्री राम पत्नी सीता को लेकर अयोध्या आए, प्रजा के एक कटाक्ष पर पत्नी सीता को अग्नि परीक्षा देने के लिए कहने पर विवश होना पड़ा.ऐसा पराक्रमी श्री राम अपनी प्रजा के समक्ष किस तरह कमजोर और विवश हो गया ? शायद मर्यादित होने की वज़ह से!
रामायण के एक और बात का ध्यान रखे कि राम- रावण युद्ध में श्री राम ने अंततः एक व्यक्ति (विभीषण) का साथ लिया पर वह भी मानव के नाम को कलंकित कर गया ।

Wednesday, 13 August, 2008

श्रद्धा

श्रद्धा
(४३)
ज्यों रहे स्वामी सम्मुख श्वान सदा
रोटियों - बोटियों हेतु दुम हिलाते
त्यों डरे-सहमें से स्वार्थी मातहत
रहे अधिकारियों का चरित्र बखानते
रह-रह ये गुर्रातें हैं , चिल्लातें हैं
क्रियाशीलता का अहसास दिलाते हैं
पर श्रद्धामय निःस्वार्थी जन, श्वान नहीं,
रहे "त्वमेव माता च पिता" ही कहलाते

Wednesday, 6 August, 2008

श्रद्धा

श्रद्धा
(४२)
कुचले- रौन्दें जाने पर भी पेडों ने
आशाओं, उमंगों से न बढ़ना छोड़ा
जब तलक रही जमीं जड़ें धरा में
बिपरीत हालातों से न लड़ना छोड़ा
भ्रष्टाचार, मक्कारी के आधारों पर तो
आशाएं नहीं, मदमस्त लोभ पनपता
पर जुड़ने वालों ने श्रद्धा-आधारों से
लोभ-मोह के सोपानों पे चढ़ना छोड़ा

Tuesday, 29 July, 2008

श्रद्धा

श्रद्धा
(४१)
एक अकेला अबोध बालक भी
खुशियाँ तो पा ही लेता है
नाना भांति के खेल रचा कर
अपने मन की कर ही लेता है
हम अनजाने उसको बाधित कर
क्रोधमय क्रंदन का पाठ पढ़ाते हैं
अरे रमों,श्रद्धा-भावों में बच्चों-सा
भर आँचल, अपना कर ही लेता है

Tuesday, 22 July, 2008

श्रद्धा

श्रद्धा
(४०)
"घटना" सिर्फ़ हादसों का होना ही होता है
अन्य जिसे न्यून,भुक्तभोगी बड़ासमझता है
लगती जुड़ने ज्यों-ज्यों स्वार्थी संवेदनाएं
"घटना" का तभी तो विकृत रूप उभरता है
अन्यथा असमय मौत में समा जाती है
बददुवाओं की हवाओं में बदल जाती है
श्रद्धानत बेफिक्र, रमे बस सेवा भावों में
हर "घटना" को प्रभु-प्रसाद समझता है

Wednesday, 16 July, 2008

श्रद्धा

श्रद्धा
(३९)
कहते हैं कि आज का जीवन
अत्यधिक त्वरित हो गया है
अमन-चैन, भाई-चारा तो अब
आपाधापी को तिरोहित हो गया है
हो सहज ज़रा प्रकृति तो निहारें
बिखेरती स्फूर्ति जो संजोग के सहारे
हो श्रद्धानत सीखोगे जीना संयम से
लगेगा जीवन बाधा रहित हो गया है

Tuesday, 8 July, 2008

श्रद्धा

श्रद्धा
(३८)
है जुड़ा हर कर्म आज फायदे से
फायदा भी क्या, बस पैसा मिलना चाहिए
है अपेक्षा दूसरों से संस्कार, तहजीब की
ख़ुद का कैसे भी काम निकलना चाहिए
स्वार्थ से आदमी चालाक हो गया है
संस्कारित लगता है नालायक हो गया है
थे बुद्ध पढ़े-लिखे, पर ज्ञान कब मिला
श्रद्धा मिलते ही अज्ञान निकलना चाहिए

Tuesday, 1 July, 2008

श्रद्धा

श्रद्धा
(३७)
भ्रष्टाचारी -दम्भी के अट्टाहस का
हुआ सदा है एक न एक दिन नाश
दे यातना कितना भी जल्लादों-सा
आहों ने ही इनका किया विनाश
गौर तनिक रावण वध पर फरमाएं
पशु-पक्षी ही क्यों राम सखा कहाए
श्रद्धा से दे अपना सामर्थ्य इन्होनें ही
था रचा असंभव से सम्भव का इतिहास

Sunday, 6 April, 2008

श्रद्धा

श्रद्धा
(३६)
हर दिल को बरबस छू लेती है
बालक की बाल सुलभ चंचलता
हर युग में नए गीत बना करती है
माँ की सहज त्यागमयी ममता
पर स्वार्थियों की तथाकथित सेवाकता
न दिल को छूती, न गीत बना करता
त्याग स्वार्थ श्रद्धा से कर्म करेगा तो
जन-जन में तेरा ही रूप संवारता

श्रद्धा

श्रद्धा

(३५)

गहन विचारों में है जाता कौंन

सतही बातें ही होती रहती है

गैरों के दर्दों को है किसने समझा

अपनी तो जान निकलती रहती है

थोड़े पल को तो करो मुक्त, खो

जाने को, गैरों के अहसासों में

श्रद्धा स्वयं अवतरित होगी मन में

'मानवता' नहीं अनजानी रहती है

Saturday, 5 April, 2008

श्रद्धा

श्रद्धा
(३४)
कर्म करोगे हैवानों सद्रश्य
तो सबकी गाली खानी होगी
पा प्रतिस्पर्धा चरम दौर में
गला काटने की ठानी होगी
मिला है जीवन इंसानों का तो
कुछ इंसानों सा कर दिखलाओ
रमे श्रद्धा से सेवा-भावों में तो
इंसानियत नहीं अनजानी होगी

Friday, 4 April, 2008

श्रद्धा

श्रद्धा
(३३)
अच्छा दिखाने कि ख्वाहिश सबकी
फिर, झूँठ ज़हन में क्यों आते हैं
शायद अन्दर डर है या फिर वे
इच्छाओं का सागर अपनाते हैं
प्रयास सदा चींटी भी करती है
पर झूंठ-ग़लत कर्मों से रह दूर
ज्यों श्रद्धा में डूबे कर्मवीर को सब
पर्याय"प्रयास" का ही बतलाते हैं

Tuesday, 25 March, 2008

श्रद्धा

श्रद्धा
(३२)
है झूठों को क्या ज्ञात नहीं
झूंठ - सचों के सारे अन्तर
मुँह से निकले बोले तो ऐसे
ज्यों दे रहे हैं सच का जंतर
साक्ष्य सभी खड़े भी कर देते हैं
सच लाचार खड़ा रह जाता है
लाचार , ठगा - सा सच्चा मन
फिर भी न छोड़े श्रद्धा का जंतर

Monday, 24 March, 2008

श्रद्धा

श्रद्धा

(३१)

हे राम ! तुम्हारी रामायण को

कब किसने समझा- जाना है

दिए उदाहरण स्वार्थ हेतु ही

समझा इसको ताना- बाना है

करें कल्पना राम - राज्य की

पर हरकत विपरीत मिले हरदम

आदर्श रचोगे हो श्रद्धा में रत

तभी राम - राज्य को आना है

Thursday, 20 March, 2008

श्रद्धा

श्रद्धा
(३०)
है किस्मत एक पहेली ऐसी जो
सिंचित केवल कर्मों से होती है
कहने दो लोंगों को कुछ भी
"गीता" में ही ज्ञानों का मोती है
छोड़ सभी तुम फल कि इक्षाएं
अपने कर्मों में तल्लीन बनोगे
अनायास श्रद्धा में ऐसा जा डूबोगे
पाओगे सीप वही जिसमें मोती है

श्रद्धा

श्रद्धा
(२९)
लिखा हुआ जो किस्मत में तेरे
बस उतना ही तू पा पायेगा
लाख करेगा कुछ भी तो बस
दोषी किस्मत को ही ठहरायेगा
अरे नादान! किए कर्म तेरे ही
किस्मत कि गाथा लिखते हैं
अपना कर श्रद्धा , जितना डूबोगे
हर "फल" में तू अमृत ही पायेगा

श्रद्धा

श्रद्धा
(२८)
हमने तो है बुरा किया नहीं
फिर बुरा हुआ क्यों अपने संग
चल रहा सदा अपनी ही राहों में
फिर भी कर रहे लोग क्यों तंग
खेल सभी ये हैं बस किस्मत के
जिसको समझ सका है न कोई
अपना कर श्रद्धा जितना डूबोगे
अलमस्त रहोगे उतना देव-संग

Wednesday, 19 March, 2008

श्रद्धा

श्रद्धा

(२७)

नहीं बुलाती मधुशाला उनको

जो पीने से कतराता है

छक कर ये तो खूब पिलाती

जो ख़ुद ही पीने आता है

क्यों कहते हो शिक्षा देने को

लेने वाला तो ले ही जाता है

श्रद्धा रही जहाँ जिसकी जैसी

मनचाहा वह हरदम पाता है

श्रद्धा

श्रद्धा
(२६)
शपथ दिलाने से होगा क्या
पेट अगर उनका खाली होगा
हाथों में है यदि काम नहीं तो
बनना उन्हें मवाली होगा
व्यर्थ लगी वे सारी शिक्षाएं
पेट नहीं जो भर पाती हैं
कुछ काम सिखाओ श्रद्धा से
जीवन में बस खुशहाली होगा

श्रद्धा

श्रद्धा
(२५)
भाषण देने से होगा क्या
जो कर के न दिखलाया तो
नहीं, अब नहीं सहन होगा
जो फिर से ललचाया तो
आ कर्म - क्षेत्र में , हो लथ-पथ
पाओ पहले अनुभव,तुम्हे शपथ
श्रद्धा से मतवाले दौड़ पड़ेंगे
ज्ञान ज़रा सा भी छलकाया तो

श्रद्धा

श्रद्धा
(२४)
अगर बंधोंगे माया - मोहों में
बन्धन से तो विस्तार रुकेगा
अगर डरोगे तुम गिरने से तो
डर से रह-रह हर बार गिरेगा
"जीना" दुनियाँ में व्यापार बना है
"सब देना" कुछ पाने का द्वार बना है
पर बंधने पर श्रद्धा के बन्धन में
खोने-पाने का संस्कार बनेगा

श्रद्धा

श्रद्धा
(२३)
है लगता, क्यों "कुछ बुरा हुआ"
"कुछ पाने पर" है क्यों इठलाना
छिपा सभी कुछ भविष्य -गर्त में
फिर क्या है , तुमको बतलाना
"गीता" कहती है "कर्म करो तुम"
"फल देना" तो है अधिकार हमारा
श्रद्धा से डुबो अपने ही करमों में
छूट जाएगा फिर तेरा ये ललचाना

Tuesday, 18 March, 2008

श्रद्धा

श्रद्धा
(२२)
थे तुमने जो दीप मँगाए
और उन्हें जो दी थी ज्वाला
कर रहे वही प्रकाशित नभ को
जप कर तेरे नाम की माला
रह ईर्ष्या - द्वेष से दूर सदा ही
तू परोपकार में ही मगन रहा
है तूने श्रद्धा की जो राह दिखाई
उसी राह चल रहा ये मतवाला

श्रद्धा

श्रद्धा
(२१)
कभी किसी ने कहा यहाँ पर
कुछ भी तो अपने हाथ नहीं
हानि-लाभ, जीवन - मरण,
यश-अपयश विधि हाथ रही
मैं - मेरा से, उठ कर ऊपर
मानवता में तो विश्वास करो
हो कर तुम श्रद्धा से अवनत
क्या कह पाओगे,"नाथ" नहीं

श्रद्धा

श्रद्धा
(२०)
हुए हादसे , उबले जन - आक्रोश
लाचार - प्रशासन के उड़े होश
रुके हिंषा-प्रतिहिंषा कैसे, हम जो
देते रहे एक - दूजे को ही दोष
भड़कीले वक्तव्यों ने जोश जगाये
जाति-धर्म में क्यों संतोष समाये
अरे अपनाओ मानवता श्रद्धा से
शान्ति - दूत सद्रश्य हरे सब रोष

श्रद्धा

श्रद्धा
(१९)
देखे जीवन जीने के रंग निराले
न कहना था , वो भी कह डाले
ख़ुद आगे रहने की बात चली है
तो, बातों से सबकी हवा निकाले
सब होगा यदि बातों से बैठे-ठाले
तो कर्म - हीनों से संसार भरेगा
कर्मवीर रमेगें श्रद्धा से कामों में
तो ही प्रतिफल पातें हैं मतवाले

Monday, 17 March, 2008

श्रद्धा

श्रद्धा
(१८)
रहा व्यस्त ,जीवन को क्या जानूं
जीत - हार को क्या पह्चानूं मैं
कथा - आत्मकथा कैसे कह डालूँ
बे-बस हूँ , बस इतना ही जानूं मैं
पुस्तक छपवाने की बात तुम्हारी
परिचित ख़ुद को करवाने सा है
रख श्रद्धा , सेवा में तल्लीन रहूँगा
पाऊँगा खुशियाँ बस यह जानूं मैं

श्रद्धा

श्रद्धा
(१७)
पहुंचूंगा मैं कैसे मंजिल कि छत
करू विश्राम जो पा छाया-पथ
डरा रहा हार-दुःख इतना कि है
वर्तमान भी अश्रुस्वेद से लथपथ
भागो, भागो...है यह एक अग्निपथ
खाओगे ठोकर , गिरोगे यत्र - तत्र
करते यदि श्रद्धा से मानव -सेवा
खुश रहता मन शत - प्रतिशत

श्रद्धा

श्रद्धा
(१६)
दिखी दूर ... बहुत एक ज्वाला
जिज्ञासा में चल पड़ा मतवाला
पहुँच निकट कहीं कुछ न पाया
भ्रम ने था विचलित कर डाला
नाहक समय गवायाँ आने-जाने में
सब कुछ खो डाला अनजाने में
सुख - शान्ति से असीमित दौलत
पाया बस संतोषी श्रद्धा ही वाला

Sunday, 16 March, 2008

श्रद्धा

श्रद्धा
(१५)
कठपुतली की तरह नाचना
किसे भला हुआ है स्वीकार
फिर भी है नाच रहा वही
हो कहीं विरोधित, कर इंकार
झूंठी अपनी सब हस्ती है
कहीं न कहीं झुकी है यार
होते नत मानवता में श्रद्धा से
पाते सर्वत्र सदा जय- जयकार

श्रद्धा

श्रद्धा
(१४)
हुआ नियंत्रित पुरुषार्थ जब
इच्छाओं के कच्चे धागों से
होता जाता है नित ही विकृत
तब ह्रदय धधकती आगों से
हो अमानवीय, हर जन को तब
लगते हो तुम विष-धारी नागों से
छोड़ इसे, अपना मानवता श्रद्धा से
पुरुषार्थ तुम्हारा गूंजेगा रागों से

श्रद्धा

श्रद्धा


(१३)



अपना कर मानव - मन इच्छाएं

अमृत-मय जीवन में विष भरता है

"हो पूरित कैसे इच्छाएं ज़ल्दी से"

ये चिंता - अंकुर नित और उभरता


हो मृग-त्रष्नी भटक - भटक कर

व्यर्थ ही है यूँ क्यों रहता मरता


संतोष - श्रद्धा में यदि तू रमता
तो, तेरा यह जीवन बहुत संवरता

श्रद्धा

श्रद्धा
(१२)
बज्जी - संघ ने था उसे बनाया
कानूनन "नगर - वधु वैशाली"
"धिकृत है यह क़ानून" कह गयी
भर विद्वेष , ह्रदय में आम्रपाली
वही बनी फिर विम्बसार-सम्मुख
श्रद्धा से ही अवनत होने वाली
अनभिग्य विम्बसार - पुत्र भगिनी
हुयी विम्बसार - पुत्र जनने वाली

श्रद्धा

श्रद्धा
(११)
धूं - धूं कर जल रहा ह्रदय
विखंडित प्रेम - ज्वाला से
नित ही भुला रहे इसकी पीड़ा
पी - पी कर विषमय हाला से
क्षण को विस्मृत भले करे , पर
फिर उभरेगी, ज्यों उतरेगी ये हाला
प्यार तराशा होता यदि श्रद्धा में
हर हाल बचाती पीड़ा - ज्वाला से

श्रद्धा

श्रद्धा
(१०)
जीवन-दुःख को भले भुला दो
कुछ क्षण को पीकर ये हाला
उतरेगी जब , तो विस्मृत दुःख
खूब सताएगी, बन कर ज्वाला
एक रमा ले मन में श्रद्धा
जग में कहलायेगा मतवाला
तन-मन पर क्या कर पायेगी
तब दुःख,द्वेष क्लेश की ज्वाला

श्रद्धा

श्रद्धा
(९)
मेरे देवालय , तेरे मस्जिद
उनके चर्च , गुरद्वारे भी यहाँ
अपनों में ये श्रद्धा भी कैसी
रहते नत-मस्तक सभी यहाँ
कर,विस्तृत कर, स्व-श्रद्धा और
भेद-भाव से तब लेगा मुंह मोड़
भुला सभी धर्मों का उपहास
जोड़े मानव से मानव यही यहाँ

Saturday, 15 March, 2008

श्रद्धा


(८)



खंडित ख्वाबों के कण - कण में

दिखी न तनिक व्याकुल रेखाएं

पर दुखित मानव मन इतना की

द्रग से झर - झर बह आंसूं आए

मैं, मेरा के भावों से हो ग्रस्त

हुवे आज हम विपदाओं से त्रस्त

भूल अहम् - भावों को तू अब

रम कर श्रद्धा में मस्त हो जाय

श्रद्धा

श्रद्धा
(७)
दिन हुए पूर्ण जब सत्यवान के
आए यमदूत ले जाने की ठान के
कस ली कमर सावित्री ने तत्क्षण
भगे यमदूत निष्फल प्रयास जान के
हार से आह़त हुआ यम का अहम्
स्त्री से युद्ध को चल पड़ा बे-रहम
श्रद्धा-कवच तो रहे अभेद्य सती के
पर हुए तार - तार यम - मान के

श्रद्धा

श्रद्धा
(६)
प्यार लुटाने को हो प्रस्तुत
नहीं छिपा रखने की है वस्तु
डुबाओ प्रियतम को इसमें इतना
रहे आशक्ति - मदिरा में सुप्त
भ्रमित नहीं तब हो पायेगा
समस्त अहम् उड़न छू हो जाएगा
श्रद्धा प्रेम -भावों की अपनाकर
नरकीय - जीवन पायेगा लुप्त

श्रद्धा

श्रद्धा

(५)

मन आज हो रहा क्यों अस्थिर
अपने, क्यों लग रहे अचिर
मत भरो आज हिंसक हुन्कारें
हो स्थिर, सोंचों फिर - फिर

होते हैं खंडित सम्बन्ध अहम् से
निकलेंगे सारे विद्वेष ज़हन से

खोकर श्रद्धा - भावों में ही तू
रहो अछूते दंभ-दहन से, फिर

श्रद्धा

श्रद्धा

(४)

गुरु द्रोणाचार्य भले ही हों, पर

शिष्य एकलब्य ही पूज्य अहो

ठुकरा दे गुरु कितना भी, पर

श्रद्धा भाव न त्याज्य कहो

मानव से पत्थर-मूर्ति भली

श्रद्धा गई न कभी छली

तोड़ मर्यादा,गुरु मांगें अंगूठा भी

तत्क्षण देना ही श्रद्धा-अंदाज अहो

श्रद्धा

श्रद्धा

(३)

सागर बीच फंसी है नैया
ब्याकुल नहीं तनिक खेवैया
श्रद्धा पूर्ण बसी है पालों में
ये पार करा देगी रहिया

रोने से बेहतर, विश्वास भरो
जीवित रहने का अहसास करो

श्रद्धा एक रमा कर मन में
पायेगा बस खुशियाँ ही खुशियाँ

Friday, 14 March, 2008

श्रद्धा

(२)

जन कर श्रद्धा मन में

भरती है स्फूर्ति बदन में

झंकृत कर तन- मन को

है प्यार दिखाती कण- कण में

पत्थर भी हैं देव उसी से

झुकते शीश जहाँ खुशी से

बीतेगा जीवन हँसी- खुशी से

बस श्रद्धा एक रमा ले मन में

श्रद्धा

श्रद्धा
( १ )
प्रिय हो तुम, प्रियवर हो तुम
ईष्ट - देव सद्रश्य हो
औरों हेतु भले ही न हो
पर, मेरे लिए अवश्य हो
करना अलग हमें, तो सब चांहें
पर मैं तो बस इतना ही जानूं
डूबोगे श्रद्धा- सागर में जितना
सानिध्य उतना ही सद्रश्य हो