Saturday 31 October 2009

मजबूरियाँ, गिले-शिकवे और प्रगति पर प्रकृति की मार

मजबूरियाँ

दिल, निंदिया, स्ट्रेस, भय के बाद इन्सान को सबसे ज्यादा जो चीज़ कष्ट दे रही है, वो शायद उसकी "मजबूरियाँ" ही हैं.
मुझे ऐसा लगता है कि मज़बूरी उस चिडिया का नाम है जो उसे अपने शुरुवात में दिली/प्राकृतिक/ संस्कारिक चाहत के विपरीत करना पड़ता है पर शनेः-शनेः यह उसकी आदत में शुमार हो जाता है, जैसे यही उसकी नियमित कार्यविधि है.
शुरुवात

* बचपन के पहले से हो जाती है, या कहें दुनिया में आने से पहले से "लिंग परीक्षण" के तौर पर, मनोवांक्षित न होने पर "भ्रूण हत्या' से भी न कतराना मज़बूरी ही तो कही जायेगी........
* बचपन का बिंदास खेलना-कूदना अति कम उम्र में स्कूलों की पढाई की भेंट चढ़ जाना भी तो मज़बूरी ही तो है......
* सहज पढाई को सहज ज्ञानार्जन से प्रतियोग्नात्मक रूप में परिवर्तन और वह भी अंकों के आधार पर, आखिर किस मष्तिष्क की उपज है, जबकि सब जानते हैं अधिकांश खोजें, नियम, सिद्धांतों की उतपत्ति कम पड़े-लिखों पर ज्यादा समझदार से विश्वकर्माओं ने ही की है... वैसे भी अंक प्राप्त करना एक विशेष कला है जो कोचिंग संस्थानों में मोटी फीस लेकर सिखाई जाती है, और अब ये कोचिंग संस्थान भी बच्चों के उज्जवल भविष्य की कमाना में हर संरक्षकों की मज़बूरी हो गई है.......

नौकरी करते हुए कुछ ईमानदार लोगों को छोड़कर बाकियों द्वारा अपनी- अपनी सामर्थ्यानुसार गलत काम करना या अन्य धन्दों में लिप्त होना मसलन

* टीचर, लेक्चरर, प्रोफेसर हैं तो कोचिंग करना
* डाक्टर है तो प्राइवेट प्रेक्टिस करना और उस पर विशेष ध्यान देना,
* इंजीनियर हैं तो सप्लाई या ठेके जैसे काम में संलिप्त होना
* अधिकारी हैं तो उच्चाधिकारियों, मंत्रियों, नेताओं की अलिखित मनोवांक्षित आदेशों की अनुपालना में किसी भी हद तक जाना, नौकरी दिलाने के नाम पर, नाजायज़ और ठगी के धंधों में संलिप्तता
* सी ए, लेखाधिकारी हैं तो टैक्स चोरी या अन्य लेखा अनियमितताओं को करने, येन -केन- प्रकारेण करवाने का अधिकांश दंश झेलना ही होता है
* चपरासी हैं तो गुप्त फाइलों के राज़ उजागर करना........फाइलों को गायब करना ...........आदि- आदि भी तो कहीं न कहीं किसी न किसी मज़बूरी से ही तो जुड़े मिलेगें यदि आत्मा की आवाज़ ईमानदारी से कही-सुनी जाये तो.......
अपने चारों और व्याप्त चकाचौंध से प्रभावित हो हम प्रायः स्वीकारते हैं कि
➲ हमने प्रगति की,
➲ विशाल अट्टालिकाएं खड़ी की,
➲ सुबिधाये बढाई,
➲ रहन-सहन का उच्च स्तर प्राप्त किया
पर किन कीमतों पर...

आज

* न मानवता दिखती है,
* न ईमानदारी के दर्शन होते हैं,
* संस्कार किस चिडिया को कहते हैं सोचना पड़ता है,
* स्व-अनुशाशन किसी को पता ही नहीं सब पशुओं की तरह डंडे से हांके जाने के आदी हो गए,
* पवित्र सदाबहार पारिवारिक संबंधों की प्रासंगिकता पर प्रश्न चिन्ह उठने लगे है
* समलिंगी सम्बन्ध स्वीकृत हो रहे हैं
* भ्रष्टाचार भी शिष्टाचार की श्रेणी में शामिल हो चूका है
* झूंठ ही सच माना जाने लगा है, सच को अपना सच सिद्ध करना पड़ रहा है...
* विश्वास विखण्डित हो चुका है
* मतलब साधना ही एक मात्र उद्धेश्य है..... या कहें कि जीवन के व्यापार का मूल मन्त्र हो गया है
अपने कबीर जी भी तो इंसानी मजबूरियों को ही भांप कर कह गए.........
साँचे कोई न पतीजई, झूठें जग पतियाये
गली-गली गोरस फिरे, मदिरा बैठि बिकाय

साँच कहूँ तो मारि है, झूठें जग पतियाये
यह जग काली कूतरी, जो छेड़े तेहि खाए

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एक छोटी रचना

गिले-शिकवे


खड़े हुए बन अवरोध क्या
नाराज़गी या मजबूरियाँ
वे गिले - शिकवे भी क्या
रह अनकहे, बढाते दूरियाँ
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और अंत में ......
प्रगति पर प्रकृति की मार ...........
* जयपुर में २९ अक्टूबर, २००९ को भूकंप का "धीरे का झटका" (रिक्टर स्केल पर तीव्रता २.३) ७ बज कर ३६ मिनट पर सायंकाल
* ७ बज कर ३७ मिनट पर सायंकाल यंहा के सीतापुरा औद्योगिक क्षेत्र में स्थित इंडियन आयल के टर्मिनल पर ११ डीज़ल, पेट्रोल के टैंक जोर के धमाके के साथ एक के बाद एक उड़ गए, लगी आग और विस्फोट के धमाकों के "जोर के झटके" से पूराशहर दहल गया..
* तेरह मरे (पर सरकारी पुष्टि नहीं), १५० से ज्यादा घायल, मृतकों की संख्या बढ़ भी सकती है
* ६०० करोड़ का तेल जला और
* अरबों के नुकसान की आशंका
* बाकी सरकारी भाषा में ....................
++ सहायता कार्य जारी है,
++ मृतकों, घायलों को मुवाबजे की घोषणा,
++ लीकेज से आग लगाने की संभावना जताई गई,
++ बेकाबू आग पर काबू ईश्वर के भरोसे,
++ दुर्घटना के कारणों की जाँच होगी............
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Friday 30 October 2009

आभारव्यक्ति

मेरी पिछली पोस्ट "भय, महत्त्व / महत्वहीन....." (२४ अक्टूबर ) पर
प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले निम्न सभी सम्मानीय क्षुदी और शुभचिन्तक
पाठक/ पाठिकाओं... या कहें कि स्नेहिल टिप्पणीकारों (क्रम वही, जिस
क्रम में टिपण्णी/ प्रतिक्रिया/ आलोचना/ समालोचना प्राप्त हुई)....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी, प्रमोद ताम्बत जी, निर्मला कपिला जी,
सुमन जी, विनोद कुमार पांडेय जी, रश्मि प्रभा जी, राजे शा जी,
अमिताभ श्रीवास्तव जी, संगीता जी, राज भाटिया जी, रंजना
[रंजू भाटिया] जी, ज्योति सिंह जी, पी. सी. गोदियाल जी, परमजीत
बाली जी, महफूज़ अली जी, एम्. वर्मा जी, क्रियेटिव मंच, Pt.डी.के.
शर्मा"वत्स" जी, लता हया जी, शरद कोकस जी, योगेन्द्र मौदगिल जी,
अल्पना वर्मा जी, सर्वत एम० ज़माल जी, मनोज भारती जी, ज्ञान दत्त
पाण्डेय जी, अलका सर्वत जी, दिगंबर नसावा जी, श्रद्धा जैन जी,
तुलसियान पटेल "सच्चाई" जी, के.के. यादव जी, आकांक्षा जी, दर्पण
साह "दर्शन" जी, संजय भाष्कर जी, डा. टी एस दराल जी, श्याम कोरी
"उदय" जी, अपूर्व जी, स्मार्ट इंडियन, रंजना जी एवं रोशनी जी का
विशेष रूप से हार्दिक आभारी हूँ कि आप सभी ने पहले की ही तरह स्नेह
बनाये रखते हुए २४ अक्टूबर की मेरी पोस्ट पर भी ह्रदय से मेरी हौसला
अफजाई कर भविष्य में भी इसी तरह कुछ न कुछ लिखते रहने और पोस्ट
करने लायक संबल प्रदान किया है और आशा है कि भविष्य में भी कुछ यूँ ही
अपना-अपना स्नेहिल मार्गदर्शन मेरे ब्लाग पर आकर मुझे अनवरत प्रदान
करते रहेंगें....

मैं उन गुरुजन से टिप्पणीकारों का भी विशेष आभारी हूँ, जिन्होंने अलग से मेरे
मेल ऐड्रेस पर सन्देश लिख मुझे और भी बेहतर लिखने मार्फ़त सुझाव/ टिप्स
दिए.

और अंत मे, मैं अपने उन सह्रदय, परम आदरणीय टिप्पणीकारों का भी आभार
व्यक्त करना चाहता हूँ, जो प्रायः मेरे ब्लाग पर आकर मुझे अपने आशीष वचनों
से नवाजते ज़रूर हैं, किन्तु मेरी पिछली पोस्ट पर किसी न किसी खास काम में
व्यस्तता के कारण टीका-टिपण्णी करने से चूक गए।

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अनुरोध

आप सब से विनम्र अनुरोध है कि कृपया इस "पोस्ट" पर टिपण्णी न करे, यह
विशुद्ध रूप से सिर्फ और सिर्फ आप जैसे अपने सभी स्नेहिल टिप्पणीकारों के
प्रति सम्मानपूर्वक आभारव्यक्ति के लिए है. इस पोस्ट से सम्बंधित किसी भी
तरह की टिपण्णी आप मेरी अगली पोस्ट, जो ३१ अक्तूबर को "मजबूरियाँ,
गिले-शिकवे और प्रगति........" के नाम से पोस्ट होगी, में कर सकते हैं.
आशा है आप सभी अपना पूर्वत स्नेह बनाये रखेंगें..........

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Saturday 24 October 2009

भय, महत्त्व / महत्वहीन......

भय

दिल, निंदिया, स्ट्रेस के बाद "भय" , जी हाँ, आज हम इसी पर कुछ बकबकाना
चाहते हैं. इस आर्थिक युग में बड़े लोगों ने कुछ सबूतों को सामने लाकर और
फिर सोचीं समझी साजिश के तहत धुंआदार प्रचार कर आम जन में इतना
भय व्याप्त कर देते हैं कि बेचारा उस वस्तु विशेष से नफ़रत तक करने लग
जाता है और फिर उनके द्वारा उतारी हुई वस्तु का हाथों हाथ स्वागत होता है.....

ऐसा ही पूर्व में
* भारत में सर्वाधिक प्रचलित सरसों के तेल के साथ हो चुका है, सोयाबीन,
पाम, सूरजमुखी का तेल का प्रचलन इसी की उपज है..........
* सार्वजानिक नलों में आने वाले पानी में अशुद्धता के नाम पर हो चुका
है, वाटर प्योरीफायर, मिनरल वाटर उदाहरण हैं,
* गाँधी का बनाया नमक, आयोडीन युक्त नमक का विज्ञापन सरकारी खर्च
पर आज भी लगातार हो ही रहा है
* देशी खाद के साथ हो ही चुका, यूरिया आदि उदहारण मौजूद हैं ही.......
आदि-आदि.........

और अब एक बार फिर......
उस देश में जहाँ पर कभी घी-दूध की नदियाँ बहती रही हों, आज भी जहाँ
प्रचुर मात्र में दूध मौजूद हैं, वंहा चन्द स्वार्थियों ने मिलावट के नाम पर
पैसा बनाने कि ठानी, और फिर देखते ही देखते लोभियों, मौकापरस्तों द्वारा
विज्ञापन भी धुआधार शुरू हो गया,
मिलावटी मावे, भारतीय मिठाइयों के विरुद्ध.............
ऐन त्यौहार के मौके आने तक आम जन में भय व्याप्त हो चुका था,
ड्राई फ्रूट, और टाफियों कि ज़बरदस्त विक्री हुई............

कभी सोचा है लाखो-करोडों ईमानदार भारतियों की रोज़ी-रोटी जो दूध
के सहारे है, उनका क्या होगा
इन चन्द लाभ के सौदागरों के चलते........
सरकार की अकर्मण्यता के चलते.........

शरम आती है यह देख कर की इन मिलावटी मौत के सौदागरों को सरकार
बर्दाश्त आखिर कैसे कर लेती है.
कानून का भय जिन्हें होना चाहिए वे तो ठाट से घूमते हैं, आमजन
मौत के भय से जूझता मिलता है,

कुछ भी हो यह आर्थिक युग है, पैसे वालों के, सत्ता वालों के हर
जुल्मों-सितम जन-हित स्वास्थ्य के बैनर तले आम जन को स्वीकार
करना ही होगा, यही नियति है, सरकारी मूक सहमति है, शायद अब,
क्योंकि,

* ईमानदारी पर धीरे-धीरे बेईमानी भारी हो गई और वह "स्मार्टनेस" के
नाम से सबको स्वीकार हो गई है
* कर्तव्य पर धीरे-धीरे भ्रष्टाचार छा गया और उसे लोग "शिष्टाचार" के
नाम से स्वीकारने लगे.......
* विद्यालयों की पढाई पर बुराई आई तो ट्यूशन की पौबारह, अब जो ट्यूशन
न पढ़े, उसे हेय दृष्टि से देखा जाने लगा है
* थोडा टैक्स न भरने वाले अपराधी, और स्विस बैंक में असीमित धन
रखने वाले पूज्य...... माई-बाप,.......
* दुराचार के विरुद्ध आवाज उठाने वाले को तरह-तरह की ठोकरे खानी पड़ती
है और दुराचारी "एम् एल ए"," एम् पी" तक बन जाते है.... आदि-आदि

और सबसे मज़ेदार बात यह कि ये ज़नता है, सब जानती है, फिर भी कुछ
नहीं कर सकती क्योंकि इस भय भरे वातावरण में सब कुछ उसने स्वीकार
कर लिया है.......... "जय हो जनता जनार्दन की".............

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छोटी सी रचना

महत्त्व / महत्वहीन

देना न महत्त्व कभी उनको जो
हैं हिंसा फैलाने को अकुलाते
हो महत्वहीन ये अतिवादीगण
किस भांति रहेगें तब इठलाते

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और अंत में .....

* दिया गया मरीज की मदद को दान
पाए पूरा जरूरतमंद ही, नहीं आसान

* हरने पर थी लंका जली, हो गया महाभारत हँसने पर
हरना - हँसना इक संग दिखे , लोकतंत्र उजड़ने पर

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आभारव्यक्ति

मेरी १९ अक्टूबर की पोस्ट पर प्राप्त आप सब की बहुमूल्यवान,
सारगर्भित, प्रेणादायक, हौसला अफजाई परक या
आलोचनात्मक टिप्पणियों पर मैं अपनी आभारव्यक्ति अपनी
24 अक्तूबर की पोस्ट "अभारव्यक्ति" में ही सादर व्यक्त कर चुका हूँ.

हार्दिक आभार।
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१९ अक्टूबर की पोस्ट पर आपकी टिप्पणियों पर आभारव्यक्ति

आभारव्यक्ति
मेरी पिछली पोस्ट "स्ट्रेस भविष्य और अंत में अभारव्यक्ति" (१९ अक्टूबर ) पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले निम्न सभी सम्मानीय क्षुदी और शुभचिन्तक पाठक/ पाठिकाओं... या कहें कि स्नेहिल टिप्पणीकारों (क्रम वही, जिस क्रम में टिपण्णी/ प्रतिक्रिया/ आलोचना/ समालोचना प्राप्त हुई)....

बबली जी, सर्वत एम० ज़माल जी, नीरज गोस्वामी जी, श्याम सखा "श्याम" जी, प्रेम फर्रुखाबादी जी, श्याम सखा "श्याम" जी, सुलभ जायसवाल सतरंगी जी, पि. सी. गोदियाल जी, वंदना अवस्थी दुबे जी, निर्मला कपिला जी, राज भाटिय़ा जी, अमिताभ श्रीवास्तव जी, मनोज भारती जी, दिगंबर नसावा जी, डा. टी एस दराल जी, मार्क राय जी, हरकीरत हकीर जी, विनोद कुमार पांडेय जी, अभिषेक ओझा जी, Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" जी, महफूज़ अली जी, राजे शा जी, सदा जी, योगेन्द्र मौदगिल जी, क्रियेटिव मंच, शरद कोकस जी, सुमन जी, वरुण आनंद जी, ज्योति सिंह जी, श्याम कोरी "उदय" जी, मनु जी, मुरारी पारीक जी, देवेन्द्र जी, तुलसियान पटेल "सच्चाई" जी एवं लता हया जी का विशेष रूप से हार्दिक आभारी हूँ कि आप सभी ने पहले की ही तरह स्नेह बनाये रखते हुए १९ अक्टूबर की मेरी पोस्ट पर भी ह्रदय से मेरी हौसला अफजाई कर भविष्य में भी इसी तरह कुछ न कुछ लिखते रहने और पोस्ट करने लायक संबल प्रदान किया है और आशा है कि भविष्य में भी कुछ यूँ ही अपना-अपना स्नेहिल मार्गदर्शन मेरे ब्लाग पर आकर मुझे अनवरत प्रदान करते रहेंगें....

मैं उन गुरुजन से टिप्पणीकारों का भी विशेष आभारी हूँ, जिन्होंने अलग से मेरे मेल ऐड्रेस पर सन्देश लिख मुझे और भी बेहतर लिखने मार्फ़त सुझाव/ टिप्स दिए.

और अंत मे, मैं अपने उन सह्रदय, परम आदरणीय टिप्पणीकारों का भी आभार व्यक्त करना चाहता हूँ, जो प्रायः मेरे ब्लाग पर आकर मुझे अपने आशीष वचनों से नवाजते ज़रूर हैं, किन्तु मेरी पिछली पोस्ट पर किसी न किसी खास काम में व्यस्तता के कारण टीका-टिपण्णी करने से चूक गए।

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अनुरोध

आप सब से विनम्र अनुरोध है कि कृपया इस "पोस्ट" पर टिपण्णी न करे, यह विशुद्ध रूप से सिर्फ और सिर्फ अपने सभी स्नेहिल टिप्पणीकारों के प्रति सम्मानपूर्वक आभारव्यक्ति के लिए है. इस पोस्ट से सम्बंधित किसी भी तरह की टिपण्णी आप मेरी अगली पोस्ट, जो २४ अक्तूबर को "भय, महत्त्व / महत्वहीन ........" के नाम से पोस्ट होगी, में कर सकते हैं. आशा है आप सभी अपना पूर्वत स्नेह बनाये रखेंगें..........

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Monday 19 October 2009

स्ट्रेस भविष्य और अंत में अभारव्यक्ति

स्ट्रेस (तनाव)
दिल, निंदिया के बाद यदि वर्तमान समय में मनुष्य मस्तिष्क में लगातार बढ़ते "तनाव" (stress) की बात न की जाये तो शायद ठीक न होगा..........
वर्तमान समय में इसे (स्ट्रेस को) एक गंभीर बीमारी के रूप में देखा जा रहा है, तभी तो "स्ट्रेस" से मुक्ति दिलाने, उसके प्रभाव को कम महसूस करने जैसी न जाने कितने विकल्पों की रोजाना दुकाने खुलती जा रही है, "स्ट्रेस मैनेजमेंट", "स्ट्रेस फ्री" जैसे नुस्खे एक "नए उद्योग" के रूप में विकसित हो रहे है, आय के नए स्त्रोत बन रहे हैं. हो सकता है सरकार के लिए ख़ुशी कि बात हो कि चलो रोज़गार के नए क्षेत्र का सृजन हो रहा है तो बेरोज़गारी का तो दबाव काम होगा, पर शायद ये समाज के लिए उसी कोढ़ रूपी त्रासदी की तरह है, जैसे सिगरेट, शराब बिकवा कर सरकार द्वारा टैक्स के रूप में आय प्राप्त करना.

यह सर्व विदित है कि स्ट्रेस (तनाव) के मुख्य कारण निम्न हैं :

* काम का प्रेशर (दबाव)
* निर्धारित टारगेट
* मीटिंग कि डेडलाइन्स
* मीटिंग के सवाल-जवाब
* प्रतिस्पर्धा (कम्पटीशन)
* संबंधों को बनाये रखना (रिलेशन मेन्टेन करना)
* समय पर पहुंचना
* अपेक्षित सहयोग न प्राप्त होना
* अपमानित करने का दूसरों का व्यव्हार
* बच्चों का अपेक्षित परीक्षाफल न लाना आदि-आदि न जाने कितने कारण हैं..............

प्रश्न यह उठता है हम पढ़े लिखे हैं, समझदार हैं, अनपढ़ कबीर का लिखा

धीरे - धीरे रे मना , धीरे सब कुछ होए
माली सींचे सौ घडा, ऋतू आये फल होए

कबीर धीरज के धरे, हाथी मन भर खाए
टूक एक के कारने , स्वान घरे घर जाये

फिकर सभी को खा गई,फ़िकरहि सबका पीर
फ़िकरि का फाका करै , ताका नाम कबीर

चिंता ऐसी डाकिनी , काटि करेजा खाए
बैद बिचारा क्या करै, कहँ तक दवा लगाये

पढ़ा भी है, फिर

* इस मानव जनित बीमारी को लगातार बढ़ने क्यों दे रहे हैं...
* तनाव जैसे कार्यों की अनुमति क्यों दी जाती है?
* सहज हो कर जीना क्यों भूलते जा रहे हैं....
* इसके अस्तित्व को सहज ही क्यों स्वीकारते जा रहे हैं
* निदान के उपायों को क्यों अंगीकार कर रहे हैं आदि-आदि.........

जैसा कि प्रायः होता है हर नयी चीज़ अपने फायदों के लिए लालच देकर थोपी जाती है, फिर वो एक ट्रेंड बन जाता है, और सब जगह वैसा ऐसे ही प्रचलन में आ जाता है, जैसे कुछ भी गलत नहीं.

जब तक प्रभाव सामने आता है, हम सब आदी हो चुके होते हैं, व्यवस्थाओं को बदलने में असहाय स्वयं को महसूस करते हैं, क्योंक विरोध किया तो अपनी कमाऊ नौकरी जायेगी या प्रोफिट कम होगा, दुसरे बाज़ी मार ले जायेगें, और मजबूरन हमें अलहदा-अलहदा खुद को तथाथित प्रचलित हो रहे तथाकथित इलाजों के हवाले करना ही पड़ता है.......

वर्तमान में ज्यादातर इस तरह के उपाय प्रचलन में हैं,......

* योग- मेडिटेशन सेंटर
* प्राणिक हीलिंग सेंटर
* हेल्थ रिसॉर्ट द्वारा स्पेशल रिचार्ज पैकज
* कलर थेरेपी * क्रिस्टल और जेम थेरेपी
* एक्युप्रेशर गैजेट्स * मसाज गैजेट्स
* प्रोडक्ट्स के रूप में खुशबु दार तकिये, फेइगशुई आइटम्स,
* अरोमा थेरेपी और स्पा आदि आदि.......

पर क्या लोग इन उपायों का प्रयोग कर पूर्णतया स्ट्रेस फ्री हो पाते हैं??????????

जब तक हम
* मुठ्ठी भर स्ट्रेस क्रिएट करने वालों को नियंत्रित नहीं करेगें,
* अपने स्वार्थ को छोड़ कर सामान्य रहन-सहन नहीं अपनाएगें,
* मिलजुल कर रहना और दूसरों के लिए जीना नहीं सीखेगें
तब तक शायद ही कोई उपाए, कितना भी पैसा खर्च कर अपना लो, पुर्णतः कारगर नहीं ही होगा,ऐसा ही प्रतीत होता है .

कभी- कभी ऐसा लगता है, हम पढ़-लिख कर भी स्ट्रेस के एक ऐसे मकड़जाल में और भी बुरी तरह उलझते ही जा रहे हैं, जहाँ से निकलना न केवल न-मुमकिन हो गया है, बल्कि असंभव सा भी हो गया है.

इस "स्ट्रेस" रूपी जिन्न को लोगों ने स्वार्थ में बोतल से बहार निकालकर अपने आर्थिक स्तर को भले ही सुदृढ कर लिया हो, पर उसके "भस्मासुर" रूपी रूप को देख समझ कर भी उस जिन्न को वापस बोतल में बंद करने का गुण शायद सीखा ही नहीं था, इसका अहसास भी अब दिखने लगा है. अब तो ये जिन्न सर्वव्यापी से हो गए है. बाहर ही नहीं अब तो घरों में भी प्रवेश कर गए है.....

बच सको तो बचो...........
वर्ना अधेडावस्था में ही मेहनत की सारी कमाई तो ढीली करनी ही पड़ेगी...............

शायद अनुभवी पर अनपढ़ रहे कबीर दास जी की निम्न सीख़

चाह गयी चिंता मिटी , मनुवा बे परवाह
जिनको कछु न चाहिए, सो साहन पति साह

को नज़रन्दाज़ करने की हम पढ़े-लिखे लोगों के लिए यह एक सजा ही तो है..............

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छोटी सी रचना

भविष्य

देखा करते हैं नित ही हम
भविष्य हमारा सुन्दर होगा
करते- करते बस ऐसा ही
जीवन सारा निकला होगा.

"सोचों न भविष्य, कर्म करो"
ऐसा कहना है "गीता" का
वक़्त नहीं होगा किंचित शेष
मीठे फल को तब चखने का

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और अंत में

दीपावली के पर्व पर विभिन्न विशेषज्ञों की राय......

नेत्र रोग विशेषज्ञ द्वारा...

समस्या : पटाखों का धुआं कार्निया पर अटैक कर घाव बना देता है
हिदायत : इससे बचने के लिए सादा चश्मा पहने, ज़लन होने, चोट लगाने पर साफ पानी से धोकर चिकत्सक से संपर्क करना चाहिए.

ह्रदय रोग विशेषज्ञ द्वारा...

समस्या : पटाखे की तेज़ आवाज़ से हार्ट अटैक हो सकता है. पटाखों के धुएं से हवा में आक्सीज़न कम होने से दिल के रोगी की धड़कन भी अनियमित हो सकती है.
हिदायत : कानों में रुई लगा कर रखें, पटाखे छोड़ते समय दूर रहना चाहिए, जहाँ तक संभव हो धुएं से दूर रहे या मास्क पहने

ब्लाग विशेषज्ञ द्वारा :

समस्या : इस अवसर पर लगी पोस्ट पर बेहतर रिस्पोंस नहीं मिलता रचना बेअसर लगती है.
हिदायत : पोस्ट के साथ "दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं" ज़रूर जोडें यह आक्सीज़न का काम करेगी.

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आभारव्यक्ति

मेरी ११ एवं १२ अक्टूबर की पोस्ट पर प्राप्त आप सब की बहुमूल्यवान, सारगर्भित, प्रेणादायक, हौसलाअफजाई परक या आलोचनात्मक टिप्पणियों पर मैं अपनीआभारव्यक्ति अपनी १८ अक्तूबर की पोस्ट "अभारव्यक्ति" में ही सादर व्यक्त कर चुका हूँ.
आपसे विनम्र निवेदन है कि आभारव्यक्ति को पूर्णतः (डिटेल) में देखने के लिए
मेरी १८ अक्तूबर की पिछली पोस्ट भी ज़रूर देखे.
हार्दिक आभार।
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