Monday 28 September 2009

कैसी संतुष्टि कैसा जुनून, महक उठे सारा वतन और आभारव्यक्ति

कैसी संतुष्टि कैसा जुनून


दैनिक नवज्योति के २४ सितम्बर के अंक में एक समाचार या कहें अजीबोगरीब खबर ने मुझे उसे आप सब के समक्ष अपने मनोभाव के साथ लाने को क्यों मजबूर कर दिया,इसे आप स्वयं पढ़ कर ही बेहतर समझ सकते हैं.......

जोधपुर से कोई ३५ किलोमीटर दूर एक रेलवे स्टेशन है "लूणी".इस स्टेशन के प्लेटफोर्म पर एक वेंडिग ट्राली नंबर २५ है। "इसका" या सम्मान से कहें कि "इसके" वेंडर ५३ वर्षीय माननीय अशोक कुमार भाटी जी है, जो अपनी ट्राली पर नौकर न रख कर सारा काम, मसलन माल बनाने से लेकर बेचने तक, खुद ही करते हैं. जवानी के दिनों में बी. काम. करने के बाद बैंक में डिस्पैच विभाग में नौकरी मिली पर काम पसंद न आने पर कुछ ही दिनों में उसे छोड़ कर पैत्रक व्यवसाय "वेंडिंग" को ही अपना लिया।

इन भाटी जी को अपना धंदा करते हुए भी पढाई करने का जूनून इस हद तक है कि अब तक वे नौ डिग्रियां हासिल कर चुके हैं. ये डिग्रिया हैं...... बी.काम., एम.काम., एम.ए., एल.एल.बी., डिप्लोमा इन लेबर ला एंड प्रेक्टिस, डिप्लोमा इन टैक्शेसन एंड प्रेक्टिस, डिप्लोमा इन टूरिज्म एंड होटल मैनेजमेंट, बैचलर ऑफ़ जर्नलिस्म एंड मास कम्नुकेशन(गोल्ड मैडल), पोस्ट ग्रेजूएट डिप्लोमा इन ह्युमन रिसोर्स मनेजमेंट और अभी भी जूनून बदस्तूर जारी है और अब भी महाशय पी. एच. डी कर रहे हैं।

आपको जानकर प्रसन्नता होगी कि इतनी डिग्रियां हासिल करने के कारण "लिम्का बुक अफ रिकार्ड के राष्ट्रीय पुरस्कार २००९" में भी इनका नाम दर्ज हो चुका है.

तो अब आप ऐसी किसी ग़लतफ़हमी में न रहे, एक मामूली सा काम करने वाला भी इतना पढ़ा-लिखा हो सकता है, ये ज़रूर ध्यान रखें.

भाटी जी का कहना है कि कोई भी काम छोटा नहीं होता और वे दृढ निश्चय के साथ कहते हैं कि उनका डिग्री प्राप्त करने का अभियान तब तक जारी रहेगा, जब तक उन्हें सफलता मिलती रहेगी. वे इसे सतत चलने वाली प्रक्रिया मानते हैं..........

तो कैसी रही भाटी जी की "अपने धन्दे से संतुष्टता और डिग्री पाते रहने की अभिलाषा?" भाटी जी अपने इस गुण के कारण "भारतीय रेल के गौरव" तो ज़रूर हैं पर उन्हें एक ही मलाल है कि भारतीय रेलवे ने कभी भी उनकी इस प्रतिभा का सम्मान करने कि ज़हमत नहीं उठाई...... यदि भाई "ज्ञानदत्त" जी भारतीय रेल में होने के कारण इस दिशा में कुछ कर सके, तो एक पुण्य के भागीदार होंगे...............

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महक उठे सारा वतन

मरा-मरा कह भी "राम-मयी" अब हर कोना ही है
करे जतन कितना भी तु लिखा सृजित होना ही है

तजी न लालच धनवान दीवाने से परवानों ने
सिखा रही अब तकदीर उन्हें विघटन ढोना ही है

सहज-सुलभ को भूल जिया असहज जीवन जिसने
अंत समय बेबस - गात लिए उसको रोना ही है

गिरे कर्मों का व्यापार दिला दौलत तो जाता है
खुले कथा जब भी यार सभी "स्वजन" खोना ही है

लुटा दिया सारा चमन "मुमुक्षु" इतना दिलदार अभी
'महक उठे सारा वतन' जतन ये अब होना ही है

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आभारव्यक्ति

मेरी पिछली पोस्ट (२१ सितम्बर,२००९) पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले निम्न सभी सम्मानीय क्षुदी और शुभचिन्तक पाठक/ पाठिकाओं... या कहें कि स्नेहिल टिप्पणीकारों (क्रम वही, जिस क्रम में टिपण्णी/ प्रतिक्रिया/ आलोचना प्राप्त हुई)....
पी.सी. गोदियाल जी, बबली जी, अपूर्व जी, चंदन कुमार झा जी, मार्क राय जी, विनोद कुमार पांडेय जी, हेम पाण्डेय जी, राज भाटिय़ा जी, अदा जी, अमिताभ (अमिताभ श्रीवास्तव) जी, दर्पण शाह "दर्शन"जी, दिलीप कवठेकर जी, मुकेश कुमार तिवारी जी, ज्ञानदत्त पाण्डेय जी, Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" जी, हर्ष जी, ज्योति सिंह जी, दिगम्बर नासवा जी, नीरज गोस्वामी जी, समीर लाल (उड़न तश्तरी)जी, रंजना (रंजना राठौर) जी, अभिषेक ओझा जी, देवेन्द्र जी, मनु जी, डा. टी एस दराल जी, ब्रज मोहन श्रीवास्तव जी, शमा जी, रंजना [रंजू भाटिया] जी, सर्वत एम. ज़माल जी, सुलभ सतरंगी जी, मुरारी पारीक जी, शरद कोकास जी, योगेश स्वप्न जी, महफूज़ अली जी, शोभना चौरे जी, सुमन जी, प्रसन्न वदन चतुर्वेदी जी, Mrs आशा जोगलेकर जी, डा. संध्या गुप्ता जी, रश्मि प्रभा जी, हिमांशु पाण्डेय जी, निर्मला कपिला जी, योगेन्द्र मौदगिल जी, अल्पना वर्मा जी, स्वतंत्र जी, संगीता जी, राकेश जी, "क्षमा" जी, "सच्चाई" जी, लता 'हया' जी, क्रिएटिव मंच, डा. श्रीमती अजीत गुप्ता जी एवं अनुपम अग्रवाल जी
का विशेषरूप से हार्दिक आभारी हूँ कि आप सभी ने पहले की ही तरह स्नेह बनाये रखते हुए २१ सितम्बर की मेरी पोस्ट पर भी ह्रदय से मेरी हौसला अफजाई कर भविष्य में भी इसी तरह कुछ न कुछ लिखते रहने और पोस्ट करने लायक संबल प्रदान किया है और आशा है कि भविष्य में भी कुछ यूँ ही अपना-अपना स्नेहिल मार्गदर्शन मेरे ब्लाग पर आकर मुझे अनवरत प्रदान करते रहेंगें....
मैं उन गुरुजन से टिप्पणीकारों का भी विशेष आभारी हूँ,जिन्होंने अलग से मेरे मेल ऐड्रेस पर सन्देश लिख मुझे और भी बेहतर लिखने मार्फ़त सुझाव/ टिप्स दिए
और अंत मे, मैं अपने उन सह्रदय, परम आदरणीय टिप्पणीकारों का भी आभार व्यक्त करना चाहता हूँ, जो प्रायः मेरे ब्लाग पर आकर मुझे अपने आशीष वचनों से नवाजते ज़रूर हैं, किन्तु मेरी पिछली पोस्ट पर किसी न किसी खास काम में व्यस्तता के कारण टीका-टिपण्णी करने से चूक गए।

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Monday 21 September 2009

दुर्गा पूजा, ईद, दशहरा, आमरण अनशन, इंसानों कि उलट कथा, मितव्ययिता और आभारव्यक्ति

दुर्गा पूजा, ईद, दशहरा, आमरण अनशन, इंसानों कि उलट कथा, मितव्ययिता और आभारव्यक्ति
दुर्गा पूजा, ईद, दशहरा
कितना अज़ब संयोग है, प्रकृति का इसे अप्रतिम वरदान भी कह सकते हैं कि विभिन्न धर्म सम्प्रदायों को अपने-अपने सर्वप्रिय त्यौहार एक साथ मिलजुल कर मनाने का सुखद और भावभीना अवसर प्राप्त हुआ. सभी के लिए ये त्यौहार ख़ुशी के त्यौहार हैं, बरसात तो कम हुई पर त्योहारों की बारिश देख हर कोई प्रफ्फुल्लित है. रात-दिन सभी तरफ रौनक और खुशहाली का आलम ही भयंकर महंगाई के बावजूद भी दृष्टिगत ही हो रहा है.
"रब" से हमारी करबद्ध प्रार्थना है कि ऐसी सार्वधर्मिक अप्रतिम खुशियों को किसी की भी बुरी नज़र न लगे और सब मिलजुल कर इसे बेहतर ढंग से निर्भीक हो कर पूर्ण आनंद और ख़ुशी से मना सकें. आशा ही नहीं वरन विश्वास भी है की यदि रब ने संयोग बनाया है तो ईमानदार प्रार्थना/इबादत भी सुनेगें ही.........
आप सभी को दुर्गा पूजा, ईद, दशहरा की हार्दिक शुभकामनाएं.
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आमरण अनशन

राजस्थान पत्रिका समाचार पत्र १४ सितम्बर के अंक के सम्पादकीय के माध्यम से यह जानकर असीम दुःख के साथ बेहद प्रसन्नता हुई कि दिल्ली के ९१ वर्षीय स्वाधीनता सेनानी माननीय संबु दत्ता जी ने राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी की पुण्यतिथि के दिन अर्थात् आगामी ३० जनवरी,२०१० से भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जंग का संकल्प लेते हुए "केन्द्रीय सरकार को भ्रष्टाचार के विरुद्ध ठोस कार्यवाही प्रारंभ करने के लिए मजबूर करने निमित्त" "आमरण अनशन" शुरू करने जा रहे हैं.
असीम दुःख कि अनुभूति इसलिए कि सरकार जो स्वयं में सक्षम है,इतनी बड़ी छूत की इस बीमारी (भ्रष्टाचार) के विरुद्ध आज तक कोई भी ठोस कार्यवाही को सच्चे अर्थों में अंजाम न दे सकी और यह बीमारी दिन दुनी रात चौगुनी बढती ही गई...... एक ९१ वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी को आमरण अनशन का संकल्प इसलिए लेना पड़ा कि
* वह सरकार को उसके महत्वपूर्ण कर्तव्य कि याद दिला सके.....
* पढ़े-लिखे उर्जा से भरे युवा भी इसके विरोध में खड़े होने का संकल्प न ही ले सके और न ही आज तक कुछ ठोस कर ही सके, बल्कि ज्यों ज्यों उम्रदराज़ होते गए, उनमें से अधिकांश भ्रष्टाचार में ही लिप्त होते गए... शायद "समय के काले सायों के साथ चलना" ही उनकी नियति बन गयी है........
* सत्तारूढ़ पार्टी का इतना बड़ा कैडर, इतनी बड़ी संख्या में मंत्रियों की फौज, लाखों कि संख्या में जिम्मेदार से कहे जाने वाले बड़े-बड़े अधिकारी पर किसी ने भी इस विषय को आज तक इतनी गंभीरता से न लिया, कुर्सी से चिपकाना पसंद किया पर जनहित, राष्ट्र हित में आमरण अनशन, अहिंसात्मक सरकार-चेतना आन्दोलन भी करने की हिमाकत न कर सके.......

और बेहद प्रसन्नता का अहसास इसलिए कि कोई तो है अभी भी इस देश में जो देश की अभी भी चिंता करता है और इस गंभीर बीमारी के विरुद्ध सरकार को कृतसंकल्पित होने के लिए मजबूर करने निमित्त अपनी जान की बाजी भी लगाने को तैयार है....

यदि हम और कुछ न कर सकें तो कम से कम इतनी प्रार्थना तो कर ही सकते हैं कि ईश्वर मानसिक रूप से स्वस्थ, चुस्त, दुरुस्त इस ९१ वर्षीय स्वाधीनता सेनानी की पवित्र रगों में इतनी शक्ति प्रदान करे कि आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे भ्रष्टाचारियों को उनके वास्तविक मुकाम तक पहुँचा सकने के लिए सरकार को मजबूर करने में सक्षम हो सकें.

दुःख का विषय है कि पूर्व में तत्कालीन सर्वाधिक युवा प्रधानमंत्री ने देश में व्याप्त आकंठ भ्रष्टाचार कि बात को स्वीकार कर ईमानदारी का तो परिचय दिया था किन्तु कोई कारगर कदम उठाने कि हिमाकत न कर ईमानदारी को एक बार फिर हारने देने का अक्षम्य अपराध भी किया. उन्हें शायद सारथी के रूप में कोई "कृष्ण" न मिला जो उन्हें अपने ही भ्रष्ट भाई-बंधुओं के विरुद्ध अंतिम घोर युद्ध लड़ने के लिए प्रेरित करने हेतु "गीता" ज्ञान देता. और ऐसे अस्त्र-शस्त्र डाल देने वाले का भी हम "समरथ को नहि दोष गुसाई" के रूप में महिमा मंडन ही करते आ रहे हैं.

वर्तमान प्रधान मंत्री भी भ्रष्टाचार की बात तो स्वीकारते है,अधिकारियों को भी कारगर कदम उठाने का भाषण तो पिलाते हैं पर महामारी के विरुद्ध जैसे कारगर कदम उठाने चाहिए और उसकी निगरानी, समीक्षा और उचित संरक्षण प्रदान करना चाहिए, हाल-फ़िलहाल तो कहीं दर्शन होता दिखाई नहीं देता है, और इसी कहावत को चातितार्थ करता दिखाई देता है "थोथा चना, बाजै घना"

भविष्य के कहे जाने वाले संभावित सर्वाधिक युवा प्रधानमंत्री भी अपने पिता से भी अधिक सच बयानी करते हुए बढे हुए व्याप्त भ्रष्टाचार कि बात को स्वीकार करने में नहीं हिचकिचाते, पर कर्म द्वारा भ्रष्टाचार के विरुद्ध अभी तक उनका भी कोई युद्ध प्रारंभ न हो सका, अर्थात् यहाँ भी वही "ढाक के वही तीन पात" द्रष्टिगत हो रहे हैं....

अब जबकि सक्षम को भी अहसास है भ्रष्टाचार का, भ्रष्टाचार के कारण होने वाले दुष्प्रभावों का, स्विस बैंक में जमा अकूत काले धन का,तो अब तक की असक्षमताओं की जिम्मेदारी लेते हुए कौन जवाब देगा कि
* आज तक भ्रष्टाचारियों के विरुद्ध कारगर ठोस कार्यवाही क्यों न कि जा सकी
* यदि योजना बनी तो उसे अमल में लाने से किसने रोका
* संभावित हो चुके नुकसानों, दुष्प्रभावों कि वसूली किससे कि जाए
* राष्ट्र-गरिमा को कलंकित करवाते हुए सर्वाधिक भ्रष्ट राष्ट्रों कि श्रेणी में भारत जैसे देश का भी नाम शामिल करवाने के लिए जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध "राष्ट्र-द्रोह"का मुकदमा क्यों नहीं चलाया आदि-आदि...
वैसे भी देश की अदालतों में तो ज़रा-ज़रा से बात के लिए भी तो लाखों की संख्या में मुकदमें चल ही रहे हैं...

एक अदनी सी जनता होने के नाते मैं नेताओं, सत्ताधारियों, जिम्मेदारों से अपील करता हूँ कि वे जनता से "अमल" करने की अपील करने के पहले खुद भ्रष्टाचार पर लगातार ठोस कार्यवाही का पुख्ता सबूत पेश कर ईमानदार आम जनता के समक्ष न केवल आदर्श उपस्थित करें बल्कि वर्षों से टूटा विश्वास तो जगाएं, दुगने उत्साह से ये जनता आपके साथ खड़ी मिलेगी... इसमें कोई दो राय नहीं. कथनी, और अपील से अधिक करनी पर विश्वास कर अधिकारीयों को और ज्यादा कर्मठ, न्यायिक और ईमानदार बनाने की और ज्यादा ध्यान और समय दें, यही वास्तविक जिम्मेदारी है.
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अब जबकि इंसानों की इस वर्तमान दुनिया में ज्यादातर उलटा ही चल रहा सा दिख रहा है और उसी में जीना भी लगातार सीखते जा रहे मानव की,जो प्रकृति की अद्वितीय सर्वश्रेष्ठ कृति कही जाती और प्रकृति की अन्य दूसरी द्वितीयक, तृतीयक....कृतियों की गतिविधियों की तुलना करने का एक अदना सा प्रयास ग़ज़ल के रूप में किया है.......
नज़ारे इनायत है.....

इंसानों की उलट कथा

लगते ही फल पेड़ों की टहनी भी झुक जाती है
इंसानों की उलट कथा "बढ़ हिम्मत इतराती है"

बेलें पा कर तनिक संग आँचल में ढक लेती हैं
इंसानों की उलट कथा "भेद सभी खुलवाती है"

कर किलकारी नदियाँ तो बहती नित नीचे रहती
इंसानों की उलट कथा "गदरा कर मस्ताती हैं"

मटमैली सी भू-माँ का "घास हरी' श्रंगार करे
इंसानों की उलट कथा "रिश्तों से कतराती है"

मुमुक्षु प्रकृति से कुछ भी ले थोडा भी कुहराम नहीं
इंसानों की उलट कथा "कोलाहल मचवाती है"

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मितव्ययिता का उलट गणित
अभी विगत दिनों मितव्ययिता का खासा प्रचार कांग्रेस की अध्यक्षा सोनिया जी और उनके पुत्र राहुल गाँधी ने क्रमशः हवाई जहाज के इकोनोमी क्लास और शताब्दी एक्सप्रेस के एसी चेयर कार में यात्रा करने से हुआ. माननीय थरूर जी ने अपने इन नेताओं को "होली काउज" कहते हुए भविष्य में इन्ही की तरह "कैटल क्लास" में यात्रा करने की बात तक कह दी.
अब जरा यह भी जान लें की यसपीजी सुरक्षा प्राप्त व्यक्ति के लिए क्या करना पड़ता है. हवाई जहाज के इकोनोमी क्लास में इनके लिए आगे की प्रथम चार पंक्तिया खाली रखनी पड़ती है, यही नियम ट्रेन में भी है. आप खुद सोच सकते हैं की यह यात्रा कैसे देश हित में मितव्ययी हुई?
अब यही नहीं दिल्ली-लुधियाना के बीच की ४०० किलोमीटर की दूरी पर ट्रेन के रूट में पड़ने वाले तीन राज्यों में करीब १५००-१६०० जवान तैनात थे,और तो और रस्ते में हुई पथराव की घटना की जाँच जारी है जिस पर और कितना खर्च होगा, भगवान जाने. कहने का आशय यह कि दिखावे कि यह राजनीति देश पर भारी पड़ रही है.दिखावा कर आदर्श प्रस्तुत करने का माद्दा है तो तो सभी सुरक्षा हटा कर गुप्त रूप से आम यात्री बन यात्रा करो, देश की सही तस्वीर परखो, सच और गलत का भेद करना सीखो,अवसरवादियों और जरूरतमंदों की पहचान करना सीखो. शायद यही सबसे अधिक मितव्ययी, सच्चा और भरोसेमंद जनादर्श है और राष्ट्रपिता गाँधी जी का देश के भावी कर्णधारों के लिए सन्देश भी.
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आभारव्यक्ति
मेरी पिछली पोस्ट (१४ सितम्बर,२००९) पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले निम्न सम्मानीय क्षुदी और शुभचिन्तक पाठक/ पाठिकाओं... या कहें कि स्नेहिल टिप्पणीकारों (क्रम वही, जिस क्रम में टिपण्णी/ प्रतिक्रिया/ आलोचना प्राप्त हुई)....
बबली जी, नीरज गोस्वामी जी, सर्वत एम. ज़माल जी, दिगम्बर नासवा जी, निर्मला कपिला जी, विनोद कुमार पांडेय जी, Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" जी, राज भाटिय़ा जी, अभिषेक ओझा जी, ज्ञानदत्त पाण्डेय जी, "क्षमा" जी, लता 'हया' जी, अल्पना वर्मा जी, योगेन्द्र मौदगिल जी, समीर लाल (उड़न तश्तरी)जी, पी.सी. गोदियाल जी, प्रसन्न वदन चतुर्वेदी जी, शरद कोकास जी, दर्पण साह 'दर्शन' जी, शोभना चौरे जी, ज्योति सिंह जी, डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी, सुमन जी, रंजना [रंजू भाटिया] जी, अनुपम अग्रवाल जी, रंजना (रंजना राठौर) जी, सुलभ सतरंगी जी, मुरारी पारीक जी, अमिताभ (अमिताभ श्रीवास्तव) जी, योगेश स्वप्न जी, मार्क राय जी, अलका सर्वत जी, चंदन कुमार झा जी, क्रिएटिव मंच, Mrs. आशा जोगलेकर जी, डा. संध्या गुप्ता जी, अपूर्व जी, मुकेश कुमार तिवारी जी, वंदना अवस्थी दुबे जी, हिमांशु पाण्डेय जी, राजीव (भूतनाथ जी), संजय व्यास जी, प्रेम फर्रुखाबादी जी एवं मनोज भारती जी का विशेषरूप से हार्दिक आभारी हूँ कि आप सभी ने पहले की ही तरह स्नेह बनाये रखते हुए १४ सितम्बर की मेरी पोस्ट पर भी ह्रदय से मेरी हौसला अफजाई कर भविष्य में भी इसी तरह कुछ न कुछ लिखते रहने और पोस्ट करने लायक संबल प्रदान किया है और आशा है कि भविष्य में भी कुछ यूँ ही अपना-अपना स्नेहिल मार्गदर्शन मेरे ब्लाग पर आकर मुझे अनवरत प्रदान करते रहेंगें....

मैं उन गुरुजन से टिप्पणीकारों का भी विशेष रूप से आभारी हूँ, जिन्होंने अलग से मेरे मेल ऐड्रेस पर सन्देश लिख मुझे और भी बेहतर लिखने मार्फ़त सुझाव/टिप्स दिए.

और अंत मे, मैं अपने उन सह्रदय, परम आदरणीय टिप्पणीकारों का भी आभार व्यक्त करना चाहता हूँ, जो प्रायः मेरे ब्लाग पर आकर मुझे अपने आशीष वचनों से नवाजते ज़रूर हैं, किन्तु मेरी पिछली पोस्ट पर किसी न किसी खास काम में व्यस्तता के कारण टीका-टिपण्णी करने से चूक गए.
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Monday 14 September 2009

लत-भंजन, हिंदी दिवस, कंप्यूटर, ओशो, श्रद्धा और आभारव्यक्ति

लत-भंजन, हिंदी दिवस, कंप्यूटर, ओशो, श्रद्धा और आभारव्यक्ति

लत भंजन
भाई समीरलाल जी के "उड़न तस्तरी" नामक सर्वाधिक प्रचिलित ब्लाग की १० सितम्बर की पोस्ट के कुछ अंश साभार यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ...
"सोचता हूँ पहली बार अगर मैने केलक्यूलेटर ईज़ाद किया होता, तो घर में कितनी लत भंजन हुई होती कि खुद से कुछ जोड़ नहीं पाते. गणित का अभ्यास शुन्य और निकले हैं कि मशीन जोड़ देगी.
मानो. मशीन बता भी दे कि १३ सत्ते क्या होता है, जानोगे कैसे कि सही बताया है..जब खुद ही १३ का पहाडा याद नहीं? चलो, सब किनारे रखो और पढ़ाई करो. दो तीन तमाचे तो पड़ ही जाते.
लेकिन आज बिना १३ और १९ का पहाड़ा कंठस्थ किए बच्चों का काम चल ही रहा है.
जो मशीन कहती है, सच मान ही रहे हैं.
समय बदलता है, सोच बदलती है. खुद की सोच तक बदल जाती है. "

हिंदी-दिवस, कंप्यूटर, ओशो
उपरोक्त बात को उद्धृत करने का आज मेरा विशेष मंतव्य है, कारण की आज १४ सितम्बर, जिसे प्रायः "हिंदी-दिवस" के रूप में मनाये जाने की परंपरा रही है. परंपरा है तो मना ही लिया जाता है पर शायद ही लोग दिल से इसे मानते हों और ज़िन्दगी भर इसके लिए श्रद्धा से कर्म या प्रयास करते हों. यह भी एक सच है, समय बदल गया है, सोच भी बदल रही है, हिंदी दिवस मनाते-मनाते "हिंदी पखवाडे" का प्रचलन प्रारंभ कर दिया गया. देखते ही देखते हिंदी अंग्रेजीमय होती जा रही है. बहुत से प्रचलित शब्द अपने अस्तित्व को खो चुके, कुछ खोते जा रहे हैं और बहुत से भविष्य में खोएंगे, यह निश्चित है, क्योंकि समय के साथ सोंच बदल रही है. जिंदगी मशीनी हो रही है. मशीन का ही कहा सच मन कर स्वीकार करना होगा, क्योंकि अपना मौलिक ज्ञान तो बचेगा ही नहीं.....

भाई समीर जी ने कैलकुलेटर इजाद पर ही अपने लत-भंजन की संभावना से इंकार नहीं किया था, पर आज यह बच्चे-बच्चे, दूकानदारों सबका विस्वसनीय बन गया, ज्यादातर लेन-देन इसके कहे अनुसार ही होते हैं, "भूल-चूक लेनी-देनी: के छपे सन्देश के साथ.

पर आज तो "कंप्यूटर" का जादू तो और भी सर चढ़ कर बोल रहा है. संसार ही इसमें समाया सा लगने लगा है. "चौपाल" तो लोग भूलते ही जा रहे हैं, इसी कंप्यूटर पर ही सारी गुटरगूं हो जाती है. क्या बच्चे, क्या यूवा, क्या बूढे, क्या महिलाये, क्या बालाएं, सभी पर इसका जादू सर पर चढ़ कर बोल रहा है.

तभी तो जिसे पहले मेज पर जगह मिलती थी, धीरे-धीरे जांघों पर सवार हो गया है (लैपटाप के रूप में), पहले की मेज से हट कर "पहलु" में समां गया है., इसका संचालन करने के लिए "की बोर्ड" पर अब जोर से प्रहार भी नहीं होता, प्यार से मनुहार होता है, कितना समय बदल गया..... श्रद्धा कहाँ से कहाँ आ पहुंची, इसी पर
दर्शन "मंदिर" का भी कर लो,
भजन देख-सुन लो,
अच्छे-बुरे विषय का ज्ञान अपनी- अपनी समझ से लो,
मदिरालय या और भी बहुत सी अंतरंगी दृश्यों का.......... अवलोकन कर लो, आदि..आदि
पहले कहा जाता था, जहाँ पर मंदिर, वहां पर गलत कर्म का वास नहीं, पाप लगेगा, पर जमाना बदला, , सोंच बदल गई, सब कुछ शुरू हो गया,

और ज़माना बदलते-बदलते सबकुछ एक ही स्थान पर मुहैया, बस साईट ही बदलने की जरूरत रह गई है., ले-दे कर अब रह गई अपनी- अपनी श्रद्धा कि हमें चाहिए क्या, मन जिससे हारे, उस साईट को क्लिक कर तुंरत दर्शन कर लो, शायद वर्तमान के भगवन रजनीश जी "ओशो" ने इसे पहले ही भांप लिया था "........से समाधि तक" द्वारा सन्देश प्रचारित-प्रसारित भी किया. श्रद्धा से उनके अनुयाई बढ़ते ही गए पर अंततः समाधि के ही लिए.......



श्रद्धा की बात आने पर हमारी श्रद्धा की साठवीं कड़ी भी कंप्यूटर और "ओशो" से प्रभावित हो कर ही कुछ बातें कहना चाह रही है..
श्रद्धा

(६०)

बैठे - ठाले "जब जो चाहें" पा लें
"कल्प-वृक्ष" सरीखा इंटरनेट लगता
युवा ही नहीं, बच्चे - बूढों का भी
तन-मन तो है बस इसमें ही रमता

ले बोझिल सिर,नयन, शिथिलाय कंधे
साँझ ढले पर कराह रहे सब बंदे

"श्रद्धा" से हारी, 'माया-जाल' दिखाए"
"भोगों से समाधि" का ही तो रस्ता
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आभारव्यक्ति
अपनी पिछली पोस्ट पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले निम्न सम्मानीय क्षुदी और शुभचिन्तक पाठक/ पाठिकाओं... या कहें कि स्नेहिल टिप्पणीकारों (क्रम वही, जिस क्रम में टिपण्णी/ प्रतिक्रिया/ आलोचना प्राप्त हुई)....
महफूज़ अली जी, दिगम्बर नासवा जी, विनोद कुमार पांडेय जी, डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी, रंजना [रंजू भाटिया] जी, सुमन जी, मार्क राय जी, Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" जी, राज भाटिय़ा जी, अपूर्व जी, हेम पाण्डेय जी, चंदन कुमार झा जी, बबली जी, ज्ञानदत्त पाण्डेय जी, अल्पना वर्मा जी, निर्मला कपिला जी, शरद कोकास जी, क्रिएटिव मंच, विक्रम जी, प्रसन्न वदन चतुर्वेदी जी, रश्मि प्रभा जी, "अदा" जी, समीर लाल जी, अमिताभ श्रीवास्तव जी, प्रेम जी, डा. संध्या गुप्ता जी, "क्षमा" जी, शोभना चौरे जी, Mrs. आशा जोगलेकर जी, सर्वत एम. ज़माल जी, रंजना राठौर जी, सुलभ सतरंगी जी, हर्ष माखन जी एवं लता 'हया' जी, रवि श्रीवास्तव जी, हरी शंकर राढ़ी जी और अनुपम अग्रवाल जी
का विशेषरूप से हार्दिक आभारी हूँ कि आप सभी ने पहले की ही तरह ७ सितम्बर की मेरी पोस्ट पर भी ह्रदय से मेरी हौसला अफजाई कर भविष्य में भी इसी तरह कुछ न कुछ लिखते रहने और पोस्ट करने लायक संबल प्रदान किया है और आशा है कि भविष्य में भी कुछ यूँ ही अपना-अपना स्नेहिल मार्गदर्शन मेरे ब्लाग पर आकर मुझे अनवरत प्रदान करते रहेंगें....

मैं उन गुरुजन से टिप्पणीकारों का भी विशेष रूप से आभारी हूँ, जिन्होंने अलग से मेरे मेल ऐड्रेस पर सन्देश लिख मुझे और भी बेहतर लिखने मार्फ़त सुझाव/टिप्स दिए.

और अंत मे, मैं अपने उन सह्रदय, परम आदरणीय टिप्पणीकारों का भी आभार व्यक्त करना चाहता हूँ, जो प्रायः मेरे ब्लाग पर आकर मुझे अपने आशीष वचनों से नवाजते हैं, किन्तु मेरी पिछली पोस्ट पर किसी न किसी खास काम में व्यस्तता के कारण टीका-टिपण्णी करने से चूक गए.
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Monday 7 September 2009

श्रद्धांजलि, श्रद्धा और आभारव्यक्ति

श्रद्धांजलि

अभी कुछ ही दिनों पहले दिनांक २ सितम्बर,२००९ को आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री Mr.Y.S.R. रेड्डी का आकस्मिक निधन हेलीकाप्टर के दुर्घटनाग्रस्त हो जाने से हो गया। उनके साथ चार अन्य भी गहरी नींद में सो गए। कारणों की जाँच जारी है, रिपोर्ट कब और कैसी आएगी, पिछले इतिहासों को देख कर विश्वास से कुछ कहा नहीं जा सकता। पूरे राष्ट्र के तथाकथित राजनीतिज्ञों ने सहज और नपीतुली राजनितिक प्रतिक्रियाएं दी. टेलीविजन चैनलों के उस दिन के प्रसारण से, अगले दिन के समाचार पत्रों की खबरों से ऐसा अहसास मिला की देश के अन्दर इस घटना के अलावा सब कुछ सहज है, असहज जैसा तो कुछ भी नहीं अर्थात
* न कहीं उठापटक,
* न कोई राजनितिक विसातों पर चाल,
* न कोई उग्रवादियों के उग्रवाद की चर्चा,
* न नक्सलपंथियों पर दोषारोपण.
और तो और जिसे देखो वही "रेड्डी जी" के युवा नेतृत्व की सराहना किये बिना अघा नहीं रहा था. ऐसे मौके पर कहना तो नहीं चाहिए, पर चूँकि मुझे शिद्दत के साथ महसूस हुई इसलिय कहना पड़ रह है कि यदि नेताओं को साठ वर्ष के नेता में युवापन की झलक मिलती है तो संसद में बैठ कर सरकारी कर्मचारियों की रिटायर्मेंट एज भी ५८/६० वर्ष से बढा कर ६५ वर्ष कर देनी चाहिए............... शायद यही युवा रेड्डी जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी.

दूसरी बात, यह हादसा या तो किसी के राजनितिक कौशल का हिस्सा हो सकती या फिर ऊपर वाले का क़हर. यदि राजनितिक कौशल, तो "राज" राज ही रहेगा, महानता, शहादत भुनाई जाती रहेगी और मुझे कुछ कहना भी नहीं, और यदि यह हादसा ऊपर वाले का क़हर तो सोचना पड़ेगा कि हमारे नेता कब, क्यों और कैसे किसे-किसे मरणोपरांत महान बनाते रहेंगे?............. टीवी बाले भी पीछे नहीं रहेंगे, तुरत-फुरत में वृत्तचित्र सा महिमवंदन प्रसारण भी शुरू कर देंगें, कमियां अनदेखी रह जायेंगी..... वैसे भी सोचने और समझने की बात है कि ऊपर वाले की निःशब्द लाठी का वास्तविक हकदार कौन होता है?

सोचना होगा कि मरणोपरांत ही महानता वर्णन क्यों? हमारे "आदर्श पुरुष", ये तथाकथित नेतागण जीते जी अपने कर्मों से क्यों नहीं बनने की कोशिश करते....... संस्कार और आदर्श से परिपूर्ण त्यागमय जीवन क्यों नहीं जीते, कुर्सी के लिए राजनितिक कलाबाजियां खेल कर देश और लोगों के साथ छल कब तक किया जाता रहेगा........

मेरी उपरोक्त बातें दलगत राजनीति से हटकर जनहित में है और इसे इसी परिप्रेक्ष्य में देखा,पढ़ा और समझा जाये. यदि कोई इससे आहत महसूस करता है, तो मैं उससे क्षमाप्रार्थी हूँ.

आज की ताज़ा ख़बर--- समाचार पत्रों में मुख्यमंत्री पद के लिए जारी घमासान की सुर्खियाँ,
ये तो होना ही था....

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बात एक बार पुनः संस्कार और आदर्श की तरफ आ ही गई तो ग़ज़ल और दोहों के बाद श्रद्धा की उन्सठ्वी कड़ी प्रस्तुत कर रहा हूँ,.....................

श्रद्धा
(५९)

हो गए प्रचारित अर्जुन "प्रचंड धनुर्धर"
पा गुरुवर से बूझ -अबूझ शिक्षा सारी
हार उठा कम्पित, भावुक प्रचंड धनुर्धर
पा सम्मुख सेना युद्ध - प्रतीक्षाकारी
संवारनें को अधपका सा अर्जुन - ज्ञान
दे डाला इक सारथि ने "गीता -ज्ञान"

खुले ज्ञान - चक्षु ज्यों ही श्रद्धानत के
करा "कर्म" पूर्ण, हो कर श्रद्धा-कारी

***************************************************************************** आभारव्यक्ति
अपनी पिछली पोस्ट पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले निम्न सम्मानीय क्षुदी और शुभचिन्तक पाठक/ पाठिकाओं... या कहें कि स्नेहिल टिप्पणीकारों (क्रम वही, जिस क्रम में टिपण्णी/ प्रतिक्रिया/ आलोचना प्राप्त हुई)....

पी.सी.गोदियाल जी, नीरज गोस्वामी जी, अल्पना वर्मा जी, अमिताभ श्रीवास्तव जी, रंजना [रंजू भाटिया] जी, ब्रज मोहन श्रीवास्तव जी, Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" जी, निर्मला कपिला जी, राज भाटिय़ा जी, शरद कोकास जी, Mrs. आशा जोगलेकर जी, बबली जी, मुरारी पारीक जी, "सदा" जी, डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी, "क्षमा" जी, लता 'हया' जी, ज्ञानदत्त पाण्डेय जी, मनोज भारती जी, सुमन जी, महफूज़ अली जी, सर्वत एम. ज़माल जी, क्रिएटिव मंच, चंदन कुमार झा जी, Dr.T.S. दराल जी, दर्पण साह "दर्शन" जी, दिगम्बर नासवा जी, शमा जी, रजनीश परिहार जी, दिनेश रोहिल्ला जी, सुलभ सतरंगी जी, विनोद कुमार पांडेय जी, विक्रम जी, मार्क राय जी, प्रसन्न वदन चतुर्वेदी जी, मुकेश कुमार तिवारी जी, वन्दना अवस्थी दुबे, अनुपम अग्रवाल जी एवं "अदा" जी

का विशेषरूप से हार्दिक आभारी हूँ कि आप सभी ने पहले की ही तरह पिछली पोस्ट पर भी ह्रदय से मेरी हौसला अफजाई कर भविष्य में भी इसी तरह कुछ न कुछ लिखते रहने और पोस्ट करने लायक संबल प्रदान किया है और आशा है कि भविष्य में भी कुछ यूँ ही अपना-अपना स्नेहिल मार्गदर्शन मेरे ब्लाग पर आकर मुझे अनवरत प्रदान करते रहेंगें....

मैं उन गुरुजन से टिप्पणीकारों का भी विशेष रूप से आभारी हूँ, जिन्होंने अलग से मेरे मेल ऐड्रेस पर सन्देश लिख मुझे और भी बेहतर दोहे लिखने मार्फ़त सुझाव/टिप्स दिए.

और अंत मे, मैं अपने उन सह्रदय, परम आदरणीय टिप्पणीकारों का भी आभार व्यक्त करना चाहता हूँ, जो प्रायः मेरे ब्लाग पर आकर मुझे अपने आशीष वचनों से नवाजते हैं, किन्तु मेरी पिछली पोस्ट पर किसी न किसी खास काम में व्यस्तता के कारण टीका-टिपण्णी करने से चूक गए.

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