Sunday 17 October 2010

नवरात्र उपासना, भुनाना, मूल्य , मूल्य निर्धारण, पारदर्शिता

नवरात्र उपासना उपवास द्वारा
* नवरात्र महापर्व में व्रत रखने का विशेष महत्त्व है
* अपेक्षा यह रहती है कि हम अपने अंतर्मन में रचे-बसे विकारों को दूर कर अच्छाई की ओर प्रवृत्त हों
* ध्यान रहे व्रत का आशय उपवास रखने भर से ही नहीं है, बल्कि संयमित उपवास से है
* संयमित उपवास में उपवास या फलाहार जहाँ हमारी काया शुद्ध करते हैं, वहीँ संयम अर्थात उपवास में लिए गए हमारे सच्चे संकल्प हमारे ही मन को निर्मल भी बनाते हैं
* तन-मन की यही पवित्रता ही हमारी उपासना को सफल बना सकती है

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नवरात्र, उपवास/ फलाहार को भुनाना
* नवरात्र के प्रारंभ में ही एक हिंदी समाचार पत्र में पूर्ण प्रष्ठ का विज्ञापन "अंकल चिप्स" का दिखा
* इसमें "अंकल चिप्स- सेंधा नमक" को "नवरात्र स्पेशल" के रूप में अत्यंत आकर्षक ढंग से पेश किया गया था.
* साथ में नीचे लिख था ' बोले मेरे लिप्स, आई लव अंकल चिप्स"
* ध्यान दें कि उपवास में फलाहार "माँ" के चढ़ावे के बाद प्रसाद स्वरुप ही होता है,
प्रसाद में भक्त के नहीं,
"माँ" की मर्ज़ी, पसंद चलती है,
आस्था का विषय जो ठहरा............
* समझ से बाहर है कि कब से "माँ" के लिप्स कहने लगे "आई लव अंकल चिप्स".........
* यह तो रही व्यवसायिकता की मौका भुनाने की बात....
* पर ध्यान से गौर करे कि वह भी किस कीमत पर.....
* दाम मात्र ३० रुपये प्रति ११५ ग्राम अर्थात २६० रुपये प्रति किलोग्राम
* क्या यह भक्तो के प्रति श्रद्धा से प्रस्तुति है /अर्पण है, या उनकी भावनाओं को गुमराह कर लूटने का एक व्यवसायिक और बीभत्स खेल......
* शुद्ध रूप आलू चिप्स है, न कि अंकल चिप्स, जिससे लगे कि यह अंकल को काट- काट कर चिप्स बनाई गयी है...... नवरात्र महापर्व के लिए स्पेशल रूप से .......

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मूल्य , मूल्य निर्धारण, पारदर्शिता

* सफल व्यवसायिकता का मूल उद्देश्य है पारिवारिक जीवकोपार्जन हेतु लाभ कमाना........
* हमारे राष्ट्र-पिता गांधीजी का कहना था कि व्यापारी को नफा, दाल में नमक के बराबर रख कर ही व्यापार करना चाहिए.....
* उपरोक्त के मद्देनज़र यदि अंकल चिप्स के मूल्य या फिर ऐसे ही बाज़ार में भरे हुए अन्य तमाम सामान / उत्पाद पर नज़र डालें तो लगता है कि अधिकांश में मूल्य निर्धारण किसी भी तरह न्यायोचित नहीं हैं......
* प्रश्न उठता है कि जब उत्पाद की गुणवत्ता का मानक बनाया जा सकता है, तो मूल्य निर्धारण का कोई मानक क्यों नहीं बनाया जा सकता........
गुणवत्ता निर्धारित ,
मूल्य निर्धारित ......
फिर प्रतियोगिता में जनता को उच्च गुणवत्ता का माल उचित मूल्य पर स्वतः मिलना प्रारंभ हो ही जायेगा.........
* पारदर्शिता के लिए प्रत्येक उत्पाद पर गुणवत्ता की तरह मूल्य निर्धारण के भी सभी अवयवों का जिक्र किया जाना अनिवार्य किया जाना चाहिए....
* यदि ऐसा हो पाया तो फिर रहेगा गुणवत्तायुक्त माल का न्यायोचित मूल्य........
* फिर तो कोई नहीं कहेगा ......
'मंहगा रोये एक बार, सस्ता रोये बार-बार"
* सस्ते-मद्दे का चक्कर ही ख़त्म.....
* अपने -अपने माल / उत्पाद को ब्रांडेड बनाने की होड़ का होगा आगाज़.......

(यह लेख मैनें लिख तो लिया था, नवरात्र महापर्व के ही दौरान, किन्तु विवशताओं के तहत या कहें कि समय अनकूल न होने के कारण इसे समय से पोस्ट न कर पाया, जिसका मुझे खेद है...... फिर भी देर से ही सही,पेश करने का दुस्साहस कर रहा हूँ .....
आप सभी को नवरात्र की हार्दिक शुभकामनाएं
और साथ ही समयानुकूल विजय दशमी की भी हार्दिक शुभकामनाएं .........)




Friday 1 October 2010

कोई कड़ी 'विश्वास" की , टूट गहरी चुभी होगी

दे न सके सम्मान तुम, बात कुछ तो रही होगी
कोई कड़ी 'विश्वास" की , टूट गहरी चुभी होगी

"तीर" बहुत "शब्दों" के, "शब्दवेधी" सा कौशल ना
कौन करे अभ्यास अब, "वक्त" की ही कमी होगी

"शतरंजिया " चालों कि वो बादशाहत-अदाएं भी
आज कुंद-सी हो गई, "बात" कुछ तो खली होगी

"रार' ठनी मन में जब , "काल" समझो बुरा तय है
ईश-शरण में रमने पर, मानसिक तुष्टि मिली होगी

ठाठ "मुमुक्षु" के पास भी, बेखटक सो रहा वह तो
गहन निंद्रा जी-भर मिली, "पाक-मन" से लुभी होगी