Monday 7 September 2009

श्रद्धांजलि, श्रद्धा और आभारव्यक्ति

श्रद्धांजलि

अभी कुछ ही दिनों पहले दिनांक २ सितम्बर,२००९ को आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री Mr.Y.S.R. रेड्डी का आकस्मिक निधन हेलीकाप्टर के दुर्घटनाग्रस्त हो जाने से हो गया। उनके साथ चार अन्य भी गहरी नींद में सो गए। कारणों की जाँच जारी है, रिपोर्ट कब और कैसी आएगी, पिछले इतिहासों को देख कर विश्वास से कुछ कहा नहीं जा सकता। पूरे राष्ट्र के तथाकथित राजनीतिज्ञों ने सहज और नपीतुली राजनितिक प्रतिक्रियाएं दी. टेलीविजन चैनलों के उस दिन के प्रसारण से, अगले दिन के समाचार पत्रों की खबरों से ऐसा अहसास मिला की देश के अन्दर इस घटना के अलावा सब कुछ सहज है, असहज जैसा तो कुछ भी नहीं अर्थात
* न कहीं उठापटक,
* न कोई राजनितिक विसातों पर चाल,
* न कोई उग्रवादियों के उग्रवाद की चर्चा,
* न नक्सलपंथियों पर दोषारोपण.
और तो और जिसे देखो वही "रेड्डी जी" के युवा नेतृत्व की सराहना किये बिना अघा नहीं रहा था. ऐसे मौके पर कहना तो नहीं चाहिए, पर चूँकि मुझे शिद्दत के साथ महसूस हुई इसलिय कहना पड़ रह है कि यदि नेताओं को साठ वर्ष के नेता में युवापन की झलक मिलती है तो संसद में बैठ कर सरकारी कर्मचारियों की रिटायर्मेंट एज भी ५८/६० वर्ष से बढा कर ६५ वर्ष कर देनी चाहिए............... शायद यही युवा रेड्डी जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी.

दूसरी बात, यह हादसा या तो किसी के राजनितिक कौशल का हिस्सा हो सकती या फिर ऊपर वाले का क़हर. यदि राजनितिक कौशल, तो "राज" राज ही रहेगा, महानता, शहादत भुनाई जाती रहेगी और मुझे कुछ कहना भी नहीं, और यदि यह हादसा ऊपर वाले का क़हर तो सोचना पड़ेगा कि हमारे नेता कब, क्यों और कैसे किसे-किसे मरणोपरांत महान बनाते रहेंगे?............. टीवी बाले भी पीछे नहीं रहेंगे, तुरत-फुरत में वृत्तचित्र सा महिमवंदन प्रसारण भी शुरू कर देंगें, कमियां अनदेखी रह जायेंगी..... वैसे भी सोचने और समझने की बात है कि ऊपर वाले की निःशब्द लाठी का वास्तविक हकदार कौन होता है?

सोचना होगा कि मरणोपरांत ही महानता वर्णन क्यों? हमारे "आदर्श पुरुष", ये तथाकथित नेतागण जीते जी अपने कर्मों से क्यों नहीं बनने की कोशिश करते....... संस्कार और आदर्श से परिपूर्ण त्यागमय जीवन क्यों नहीं जीते, कुर्सी के लिए राजनितिक कलाबाजियां खेल कर देश और लोगों के साथ छल कब तक किया जाता रहेगा........

मेरी उपरोक्त बातें दलगत राजनीति से हटकर जनहित में है और इसे इसी परिप्रेक्ष्य में देखा,पढ़ा और समझा जाये. यदि कोई इससे आहत महसूस करता है, तो मैं उससे क्षमाप्रार्थी हूँ.

आज की ताज़ा ख़बर--- समाचार पत्रों में मुख्यमंत्री पद के लिए जारी घमासान की सुर्खियाँ,
ये तो होना ही था....

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बात एक बार पुनः संस्कार और आदर्श की तरफ आ ही गई तो ग़ज़ल और दोहों के बाद श्रद्धा की उन्सठ्वी कड़ी प्रस्तुत कर रहा हूँ,.....................

श्रद्धा
(५९)

हो गए प्रचारित अर्जुन "प्रचंड धनुर्धर"
पा गुरुवर से बूझ -अबूझ शिक्षा सारी
हार उठा कम्पित, भावुक प्रचंड धनुर्धर
पा सम्मुख सेना युद्ध - प्रतीक्षाकारी
संवारनें को अधपका सा अर्जुन - ज्ञान
दे डाला इक सारथि ने "गीता -ज्ञान"

खुले ज्ञान - चक्षु ज्यों ही श्रद्धानत के
करा "कर्म" पूर्ण, हो कर श्रद्धा-कारी

***************************************************************************** आभारव्यक्ति
अपनी पिछली पोस्ट पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले निम्न सम्मानीय क्षुदी और शुभचिन्तक पाठक/ पाठिकाओं... या कहें कि स्नेहिल टिप्पणीकारों (क्रम वही, जिस क्रम में टिपण्णी/ प्रतिक्रिया/ आलोचना प्राप्त हुई)....

पी.सी.गोदियाल जी, नीरज गोस्वामी जी, अल्पना वर्मा जी, अमिताभ श्रीवास्तव जी, रंजना [रंजू भाटिया] जी, ब्रज मोहन श्रीवास्तव जी, Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" जी, निर्मला कपिला जी, राज भाटिय़ा जी, शरद कोकास जी, Mrs. आशा जोगलेकर जी, बबली जी, मुरारी पारीक जी, "सदा" जी, डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी, "क्षमा" जी, लता 'हया' जी, ज्ञानदत्त पाण्डेय जी, मनोज भारती जी, सुमन जी, महफूज़ अली जी, सर्वत एम. ज़माल जी, क्रिएटिव मंच, चंदन कुमार झा जी, Dr.T.S. दराल जी, दर्पण साह "दर्शन" जी, दिगम्बर नासवा जी, शमा जी, रजनीश परिहार जी, दिनेश रोहिल्ला जी, सुलभ सतरंगी जी, विनोद कुमार पांडेय जी, विक्रम जी, मार्क राय जी, प्रसन्न वदन चतुर्वेदी जी, मुकेश कुमार तिवारी जी, वन्दना अवस्थी दुबे, अनुपम अग्रवाल जी एवं "अदा" जी

का विशेषरूप से हार्दिक आभारी हूँ कि आप सभी ने पहले की ही तरह पिछली पोस्ट पर भी ह्रदय से मेरी हौसला अफजाई कर भविष्य में भी इसी तरह कुछ न कुछ लिखते रहने और पोस्ट करने लायक संबल प्रदान किया है और आशा है कि भविष्य में भी कुछ यूँ ही अपना-अपना स्नेहिल मार्गदर्शन मेरे ब्लाग पर आकर मुझे अनवरत प्रदान करते रहेंगें....

मैं उन गुरुजन से टिप्पणीकारों का भी विशेष रूप से आभारी हूँ, जिन्होंने अलग से मेरे मेल ऐड्रेस पर सन्देश लिख मुझे और भी बेहतर दोहे लिखने मार्फ़त सुझाव/टिप्स दिए.

और अंत मे, मैं अपने उन सह्रदय, परम आदरणीय टिप्पणीकारों का भी आभार व्यक्त करना चाहता हूँ, जो प्रायः मेरे ब्लाग पर आकर मुझे अपने आशीष वचनों से नवाजते हैं, किन्तु मेरी पिछली पोस्ट पर किसी न किसी खास काम में व्यस्तता के कारण टीका-टिपण्णी करने से चूक गए.

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37 comments:

महफूज़ अली said...

संसद में बैठ कर सरकारी कर्मचारियों की रिटायर्मेंट एज भी ५८/६० वर्ष से बढा कर ६५ वर्ष कर देनी चाहिए............... शायद यही युवा रेड्डी जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी.

bahut hi sahi baat kahi hai aapne jo ki notice karne yogya hai....


खुले ज्ञान - चक्षु ज्यों ही श्रद्धानत के करा "कर्म" पूर्ण, हो कर श्रद्धा-कारी

bahut hi khoobsoorat tareeke se aapne shradhdhanjali dee hai aapne.....

aur aabhar vyakt karne ke liye shukriya....... aap achcha likhte hain..... to tareef to hogi hi........

aapke lekhan mei kraantikaari vichaardhar ...... appeal karti hai....

दिगम्बर नासवा said...

AAPKA LEKH SAAMYIK AUR UPYUKT HAI .... HAMAARA MEDIA BAS APNI TRP KI CHINTA KARTA HAI .... KUCH DIN BEEN BAJAATA AI FIR BHOOL JATA HAI ....

विनोद कुमार पांडेय said...

Bade hi karmath aur prtibhashali purush the..rajeshwar ji..

shardha suman arpit..sadar shrdanjali...

aur haan ek baat aur aap abhar vyakt na kiya kare chandrmohan ji aapki likhate hi achcha hai ..

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

"सोचना होगा कि मरणोपरांत ही महानता वर्णन क्यों? हमारे "आदर्श पुरुष", ये तथाकथित नेतागण जीते जी अपने कर्मों से क्यों नहीं बनने की कोशिश करते....... संस्कार और आदर्श से परिपूर्ण त्यागमय जीवन क्यों नहीं जीते, कुर्सी के लिए राजनितिक कलाबाजियां खेल कर देश और लोगों के साथ छल कब तक किया जाता रहेगा........

मेरी उपरोक्त बातें दलगत राजनीति से हटकर जनहित में है और इसे इसी परिप्रेक्ष्य में देखा,पढ़ा और समझा जाये. यदि कोई इससे आहत महसूस करता है, तो मैं उससे क्षमाप्रार्थी हूँ."

जी मान्यवर,
आपको क्षमा माँगने की जरूरत नही है। आपने तो निष्पक्षरूप से अपनी बात कही है।

रंजना [रंजू भाटिया] said...

राजनीति में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं हैं ..पर आपके लेख की कई बाते बहुत सही लगी जैसे मरणोपरांत ही महानता वर्णन क्यों? हमारे "आदर्श पुरुष", ये तथाकथित नेतागण जीते जी अपने कर्मों से क्यों नहीं बनने की कोशिश करते....... संस्कार और आदर्श से परिपूर्ण त्यागमय जीवन क्यों नहीं जीते, कुर्सी के लिए राजनितिक कलाबाजियां खेल कर देश और लोगों के साथ छल कब तक किया जाता रहेगा........

Suman said...

nice

mark rai said...

सरकारी कर्मचारियों की रिटायर्मेंट एज भी ५८/६० वर्ष से बढा कर ६५ वर्ष कर देनी चाहिए............... शायद यही युवा रेड्डी जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी.
mai aapki baaton se hundred persent agree karta hoon....ye ghadiyalu aansoo hi hai.....

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

हम भी आपके इस कथन से पूर्णत: सहमत है कि मृ्त्युपराँत ही महानता वर्णन क्यों! अब यदि कोई नेता इतना ही महान है तो उसके जीवित रहते उसकी महानता समाज के सामने क्यूं नहीं आ पाती?
वास्तव में ये सब नेताओं द्वारा अपने भविष्य को देखते हुए रची जा रही एक साजिश है....क्यों कि इन लोगों को पता है कि उनके अपने कर्म इस लायक नहीं है कि उनके मरने के पश्चात दुनिया उन्हे याद रख सके...इसलिए आज यदि हम अपने भाई बन्धुओं को महान बताएंगे तो कल को हमारे मरने पर भी यशोगान किया जाएगा.....
"खुले ज्ञान-चक्षु ज्यों ही श्रद्धानत के करा "कर्म" पूर्ण, हो कर श्रद्धा-कारी"

"श्रद्धा" की ये कडी भी बेहद सुन्दर है!!

राज भाटिय़ा said...

मृ्त्युपराँत ही महानता वर्णन क्यों! ?? क्योकि उन्हे जीते जी तो लोग गालिया ही निकालते है, मरने के बाद लोग सोचते है अब एक मरे हुये के बारे आशुभ नही बोलना चाहिये, जो कि गलत है, जिस ने जिनद्गी मै जो किया उसे जीते जी ओर मरने के बाद उन्ही शव्दो से पुकराना चाहिये.
ओर बाबा यह ६५ साल ... तो नोजावान क्या करेगे?? अरे ५८, या ६० साअल ठीक है सारि उमर काम कर के कुछ पल आराम से भी तो कटे, हमारे यहां ६५ साल रिटायर मेंट की उम्र है.. सभी दुखी है... क्योकि जिन्दगी को कब जिये??? सिर्फ़ पेसा कमाना ही जिन्दगी नही.
धन्यवाद

Apoorv said...

तमाम चैनल्स और अख्बारों के दफ़्तरों मे बैठ कर अहो रूपम्‌ अहो ध्वनि का वृन्दगान करने वाले तथाकथित एक्स्पर्ट्स की भीड़ के बीच आपकी आवाज बहुत विश्चास जगाने वाली महसूस होती है..उस समाज मे जहाँ किसी के योगदान का भावुक मूल्यांकन करने के लिये उसके मरने की प्रतीक्षा की जाती है..वहाँ आप जैसी सोच वाले लोगों की बहुत जरूरत है..आभार

hem pandey said...

रेड्डी जी मौत के सदमे में ६० से अधिक लोगों ने जान गंवाई - समाचार पत्रों में छपी यह खबर सही है, तो मानना चाहिए कि रेड्डी में कुछ बात थी.

चंदन कुमार झा said...

बहुत ही पते की बात कही आपने। बिल्कुल सही ।

Babli said...

बहुत ही सुंदर ढंग से आपने श्रधांजलि अर्पित की है! आपने बहुत बढ़िया प्रस्तुत किया है और मैं आपके हर एक बात से सहमत हूँ ! रेड्डी जी के बारे में मैं इतना जानती हूँ कि वो बहुत ही अच्छे इंसान थे और लोगों के दुःख दर्द को समझते थे और ख़ुद गाव गाव में जाकर लोगों की पीडा को महसूस करते थे! पर जब वो जीवित थे तब उन्हें लेकर ज़्यादा बात नहीं होती अब जब उनकी मौत हो गई तो करीब साठ लोग इस हादसे को सह नहीं सके और अपनी जान गवा बैठे यहाँ तक की लोग खुदखुशी भी किए जिसे सुनकर बड़ा ताज्जुब लगा! पर रेड्डी जी में ज़रूर कोई खास बात थी जिसके कारण लोग इतना बड़ा कदम उठाये! अगर retirement age बढ़ा दी जाए तो रेड्डी जी के प्रति सच्ची श्रधांजलि होगी! आपकी लेखनी को सलाम!

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

कुछ लोग महान पैदा होते हैं, कुछ कर्म से महान बनते हैं, कुछ को महान बनने को मरना पड़ता है!

अल्पना वर्मा said...

bahut sahi likha hai...aaj ki taaza khabar sahi likhi hai..
24 ghante bhi nahin bitey...poster ..protest sab shuru...khinchataani---yah POLITICS hai!

sraddha ki 19vin kadi bhi pasand aayi...
magar aaj ke kursi ke mahabharat mein ..krishn abhi tak aaye nahin...

Nirmla Kapila said...

आपकी हर बात से सहमत हूँ मगर एक बात अच्छी नहीं लगी----
ऊपर वाले की निःशब्द लाठी का वास्तविक हकदार कौन होता है?
ये कुछ नहीं पता कई बार अच्छे काम करने वाले दुखी देखे हैं और बुरे काम करने वले कश्ट पाते हैं फिर तो ये लाठी सब नेताओं पर ही बरसनी चाहिये
सब नेता एक जैसे होते हैं | बाकी आपकी बातें बिलकुल सही हैं।ेआभार्

शरद कोकास said...

चन्द्र मोहन जी आपका यह विचार विचारों की इस भीड़ मे एक अलग स्थान रखता है। हमारे यहाँ मृतु पर भी राजनीति करने की परम्परा है राजतंत्र की इस प्रथा का जनतंत्र मे विस्तार ही हुआ है । इसे हम अपना दुर्भाग्य न कहे तो क्या कहें । अच्छा लिख रहे हैं -शुभकामनायें-शरद कोकास दुर्ग.छ.ग.

क्रिएटिव मंच said...

बहुत विचारोत्तेजक पोस्ट है !
रिटायर्मेंट एज वाली बात पर मैं असहमति दर्ज कराना चाहूंगा ! जिस देश में युवा बेरोजगारों की इतनी बड़ी संख्या हो ...वहां यह सही प्रतीत नहीं होता !

ज्ञानदत्त पाण्डेय जी ने बहुत सटीक बात कही है !

आभार

vikram7 said...

मरणोपरांत ही महानता वर्णन क्यो?
सही कहा आपने

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

आप की बात सही है ,श्रद्धा की उन्सठ्वी कड़ी अच्छी लगी ...
आप के अनुरोध पर ‘संजीदगी से गाओ ये गीत दर्द का है’ग़ज़ल में ३ और शेर प्रस्तुत किया है।आप देखें तो मेहनत सार्थक हो.....

रश्मि प्रभा... said...

shradhasuman arpit kiya hai....

'अदा' said...

आपकी सच्ची श्रधांजलि है यह...

Udan Tashtari said...

इस कथन से पूर्णत: सहमत है कि मृ्त्युपराँत ही महानता वर्णन क्यों!

बहुत उम्दा आलेख..सोचने को विवशा करता है.

अमिताभ श्रीवास्तव said...

kuchh esa hi ho, jesa ki aapne likha/ darasal hamari raajniti kisi budhhijivi ke vicharo se nahi chalai jaati balki ghaagh logo se sanchalit hoti he/ chanakya ka jamana beet gayaa/ ab to jaychand jeso ka raaj he/ ese me kab kya hota rahe, koun kise mahaan banata rahe, koun kab zameen par aa gire kuchh nahu kahaa jaa sakata/ fir bhi aapka lekh vartmaan rajnitikdhara ko spasht kartaa he aour sochne par mazboor kartaa he/

Prem said...

जिस देश का नागरिक अपने देश की कमियों के प्रति जागरूक है ,उस देश के विकास को कोई नेता क्या रोकेगें । यह राजनीती भी अवश्य बदलेगी एक दिन । आपकी लिखने की स्टाइल अच्ही है .शुभकामनायें ।

sandhyagupta said...

Aapki baat sochne ko majboor karti hai.

kshama said...

I have been a regular visitor on your blog! Its great..am even a follower...
Mujhe apnee tippanee bhee dikh rahee hai...gaur se padhtee hun...

शोभना चौरे said...

sabhi logo ne itna kuch aur sargrbhit kha hai mai bhi sabke sath hoo .
ye sare prshn hme ye sab sochne ko prerit krte hai .
sundar doho ke liye badhai

Mrs. Asha Joglekar said...

lekin helicopter ke dhahane ka koee karan koee janch huee ya nahee . Adhiktar helicopter bina janch ke hee kyun upyog me laye jate hain. Aur aage Kya Neta aur kya unaki mahanata (Ya mahaneta?) jitana kum bolen achcha hai.

सर्वत एम० said...

क्षमा चाहूँगा चन्द्रमोहन जी, दरअसल ७ की शाम गोरखपुर एरिया के लिए निकल गया कल दोपहर बाद वापसी हुई और आपके ब्लॉग तक जाकर लौट आया. यह अनजाने में हुआ और मैं इस मुगालते में रहा कि आप से सम्पर्क हो गया.
एक सच्ची बात कहूं, मुझे आपका लेख ज्यादा मजबूत दिखाई देता है, इसे स्ट्रोंग करें, मेरी शुभकामनायें हमेशा आपके साथ हैं.

रंजना said...

जहाँ दस हजार करोड़ तक के घपले कर चुके नेतागण महान बने फिरते हैं अपने देश में, वहां मात्र ढाई हजार करोड़ पचाए नेता तो महान नहीं होंगे तो और कौन होंगे.....

जब नेता अस्सी पचासी नब्बे साल तक युवा नेत्रित्व प्रदान कर सकते हैं तो सरकारी अमले को भी मृत्युपर्यंत सेवा में रहने का अधिकार होना चाहिए...केवल पैसठ ही क्यों....

आपके आलेख की मैं भूरी भूरी प्रशंशा करती हूँ...आभार स्वीकारें.

सुलभ सतरंगी said...

शोभना चौरे एवं Mrs. Asha Joglekar ji की बातों पर अवश्य ध्यान देना चाहिए.

ऐसे मुद्दे उठाने के लिए आपका धन्यवाद!

Harsh said...

nice post... keep it up

लता 'हया' said...

chandra ji
namaste
jisaa ki aap jante hain hindi diwas aaraha hai,kavi sammelon ka silsila shuru ho chuka hai isliye jawab dena mushkil hota hai halanki mai koshish karti hoon ke roz blog dekh sakun, padh sakun .
aapne latest shradhaanjali mein jo kucch kaha hai mere khayaal se har hindustani yahi sochta hai kyonki ye public hai sab jaanti hai.i think quite so,thanx.

Ravi Srivastava said...

बहुत ही कड़वा सच कह दिया है आपने अपने इस आलेख में. ऐसा करने की हिम्मत तो वो लोग भी नहीं कर पाते हैं जिन्हें देश ने कुछ करने के लिए पावर दिया है. आप के प्रयास प्रशंसनीय हैं.

Hari Shanker Rarhi said...

Is daur mein kisi bhi tarah desh ka kalyan ho to chamatkar hi hoga aur wah bhi netaon se ! aapke udgar ki mai prashansa karata hoon.

अनुपम अग्रवाल said...

भारतीय संस्कार हैं कि किसी को बाद में बुरा नहीं कहते .और यह भी तो बतायें कि अगर वास्तव में अच्छा आदमी हो तो उसके लिये क्या करना चाहिये?