Monday 28 September 2009

कैसी संतुष्टि कैसा जुनून, महक उठे सारा वतन और आभारव्यक्ति

कैसी संतुष्टि कैसा जुनून


दैनिक नवज्योति के २४ सितम्बर के अंक में एक समाचार या कहें अजीबोगरीब खबर ने मुझे उसे आप सब के समक्ष अपने मनोभाव के साथ लाने को क्यों मजबूर कर दिया,इसे आप स्वयं पढ़ कर ही बेहतर समझ सकते हैं.......

जोधपुर से कोई ३५ किलोमीटर दूर एक रेलवे स्टेशन है "लूणी".इस स्टेशन के प्लेटफोर्म पर एक वेंडिग ट्राली नंबर २५ है। "इसका" या सम्मान से कहें कि "इसके" वेंडर ५३ वर्षीय माननीय अशोक कुमार भाटी जी है, जो अपनी ट्राली पर नौकर न रख कर सारा काम, मसलन माल बनाने से लेकर बेचने तक, खुद ही करते हैं. जवानी के दिनों में बी. काम. करने के बाद बैंक में डिस्पैच विभाग में नौकरी मिली पर काम पसंद न आने पर कुछ ही दिनों में उसे छोड़ कर पैत्रक व्यवसाय "वेंडिंग" को ही अपना लिया।

इन भाटी जी को अपना धंदा करते हुए भी पढाई करने का जूनून इस हद तक है कि अब तक वे नौ डिग्रियां हासिल कर चुके हैं. ये डिग्रिया हैं...... बी.काम., एम.काम., एम.ए., एल.एल.बी., डिप्लोमा इन लेबर ला एंड प्रेक्टिस, डिप्लोमा इन टैक्शेसन एंड प्रेक्टिस, डिप्लोमा इन टूरिज्म एंड होटल मैनेजमेंट, बैचलर ऑफ़ जर्नलिस्म एंड मास कम्नुकेशन(गोल्ड मैडल), पोस्ट ग्रेजूएट डिप्लोमा इन ह्युमन रिसोर्स मनेजमेंट और अभी भी जूनून बदस्तूर जारी है और अब भी महाशय पी. एच. डी कर रहे हैं।

आपको जानकर प्रसन्नता होगी कि इतनी डिग्रियां हासिल करने के कारण "लिम्का बुक अफ रिकार्ड के राष्ट्रीय पुरस्कार २००९" में भी इनका नाम दर्ज हो चुका है.

तो अब आप ऐसी किसी ग़लतफ़हमी में न रहे, एक मामूली सा काम करने वाला भी इतना पढ़ा-लिखा हो सकता है, ये ज़रूर ध्यान रखें.

भाटी जी का कहना है कि कोई भी काम छोटा नहीं होता और वे दृढ निश्चय के साथ कहते हैं कि उनका डिग्री प्राप्त करने का अभियान तब तक जारी रहेगा, जब तक उन्हें सफलता मिलती रहेगी. वे इसे सतत चलने वाली प्रक्रिया मानते हैं..........

तो कैसी रही भाटी जी की "अपने धन्दे से संतुष्टता और डिग्री पाते रहने की अभिलाषा?" भाटी जी अपने इस गुण के कारण "भारतीय रेल के गौरव" तो ज़रूर हैं पर उन्हें एक ही मलाल है कि भारतीय रेलवे ने कभी भी उनकी इस प्रतिभा का सम्मान करने कि ज़हमत नहीं उठाई...... यदि भाई "ज्ञानदत्त" जी भारतीय रेल में होने के कारण इस दिशा में कुछ कर सके, तो एक पुण्य के भागीदार होंगे...............

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महक उठे सारा वतन

मरा-मरा कह भी "राम-मयी" अब हर कोना ही है
करे जतन कितना भी तु लिखा सृजित होना ही है

तजी न लालच धनवान दीवाने से परवानों ने
सिखा रही अब तकदीर उन्हें विघटन ढोना ही है

सहज-सुलभ को भूल जिया असहज जीवन जिसने
अंत समय बेबस - गात लिए उसको रोना ही है

गिरे कर्मों का व्यापार दिला दौलत तो जाता है
खुले कथा जब भी यार सभी "स्वजन" खोना ही है

लुटा दिया सारा चमन "मुमुक्षु" इतना दिलदार अभी
'महक उठे सारा वतन' जतन ये अब होना ही है

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आभारव्यक्ति

मेरी पिछली पोस्ट (२१ सितम्बर,२००९) पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले निम्न सभी सम्मानीय क्षुदी और शुभचिन्तक पाठक/ पाठिकाओं... या कहें कि स्नेहिल टिप्पणीकारों (क्रम वही, जिस क्रम में टिपण्णी/ प्रतिक्रिया/ आलोचना प्राप्त हुई)....
पी.सी. गोदियाल जी, बबली जी, अपूर्व जी, चंदन कुमार झा जी, मार्क राय जी, विनोद कुमार पांडेय जी, हेम पाण्डेय जी, राज भाटिय़ा जी, अदा जी, अमिताभ (अमिताभ श्रीवास्तव) जी, दर्पण शाह "दर्शन"जी, दिलीप कवठेकर जी, मुकेश कुमार तिवारी जी, ज्ञानदत्त पाण्डेय जी, Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" जी, हर्ष जी, ज्योति सिंह जी, दिगम्बर नासवा जी, नीरज गोस्वामी जी, समीर लाल (उड़न तश्तरी)जी, रंजना (रंजना राठौर) जी, अभिषेक ओझा जी, देवेन्द्र जी, मनु जी, डा. टी एस दराल जी, ब्रज मोहन श्रीवास्तव जी, शमा जी, रंजना [रंजू भाटिया] जी, सर्वत एम. ज़माल जी, सुलभ सतरंगी जी, मुरारी पारीक जी, शरद कोकास जी, योगेश स्वप्न जी, महफूज़ अली जी, शोभना चौरे जी, सुमन जी, प्रसन्न वदन चतुर्वेदी जी, Mrs आशा जोगलेकर जी, डा. संध्या गुप्ता जी, रश्मि प्रभा जी, हिमांशु पाण्डेय जी, निर्मला कपिला जी, योगेन्द्र मौदगिल जी, अल्पना वर्मा जी, स्वतंत्र जी, संगीता जी, राकेश जी, "क्षमा" जी, "सच्चाई" जी, लता 'हया' जी, क्रिएटिव मंच, डा. श्रीमती अजीत गुप्ता जी एवं अनुपम अग्रवाल जी
का विशेषरूप से हार्दिक आभारी हूँ कि आप सभी ने पहले की ही तरह स्नेह बनाये रखते हुए २१ सितम्बर की मेरी पोस्ट पर भी ह्रदय से मेरी हौसला अफजाई कर भविष्य में भी इसी तरह कुछ न कुछ लिखते रहने और पोस्ट करने लायक संबल प्रदान किया है और आशा है कि भविष्य में भी कुछ यूँ ही अपना-अपना स्नेहिल मार्गदर्शन मेरे ब्लाग पर आकर मुझे अनवरत प्रदान करते रहेंगें....
मैं उन गुरुजन से टिप्पणीकारों का भी विशेष आभारी हूँ,जिन्होंने अलग से मेरे मेल ऐड्रेस पर सन्देश लिख मुझे और भी बेहतर लिखने मार्फ़त सुझाव/ टिप्स दिए
और अंत मे, मैं अपने उन सह्रदय, परम आदरणीय टिप्पणीकारों का भी आभार व्यक्त करना चाहता हूँ, जो प्रायः मेरे ब्लाग पर आकर मुझे अपने आशीष वचनों से नवाजते ज़रूर हैं, किन्तु मेरी पिछली पोस्ट पर किसी न किसी खास काम में व्यस्तता के कारण टीका-टिपण्णी करने से चूक गए।

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52 comments:

Babli said...

बहुत ही ख़ूबसूरत और शानदार लिखा है आपने! आपका हर एक पोस्ट एक से बढ़कर एक होता है और इतने सुंदर रूप से आप उसे प्रस्तुत करते हैं की पढने में और ज़्यादा अच्छा लगता है! विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनायें!

संजीव गौतम said...

बहुत बहुत धन्यवाद भाटी साहब से परिचय कराने का. कभी लूनी गये तो अवश्य दर्शन करेंगे.

शरद कोकास said...

आदमी की जीत उसके मन की जीत से होती है भाटी जी ने अपने मन को जीत लिया है लेकिन अपने देश में किसी भी संस्थान को अपने कर्मचारियों की उपलब्धियों से कोई मतलब नहीं है । ऐसे कई लोग है जो अपनी नौकरी के साथ साथ बहुत कुछ उल्लेखनीय कर रहे है लेकिन उसे कभी रेखांकित नहीं किया जाता । ऐसे एक शख्स को प्रकाश में लाकर आपने महत्वपूर्ण कार्य किया है । आभार ।

kshama said...

आज सभी देश वासियों को यही कामना ...ख़ुद भी सोचें और बच्चों को सिखाएँ... ,

" तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा ,
इंसान की औलाद है इनसान बनेगा.."

"भगवान ने हम को इंसान बनाया
हमने उसे हिन्दू या मुसलमान बनाया,
क़ुदरत ने तो बक्षी थी,
हमें एकही धरती,
हम ने कहीँ भारत कहीँ ईरान बनाया,
जो तोड़ दे हर बंध वो तूफ़ान बनेगा"

"नागरिकत्व के कर्तव्य निभाएँ, दूसरों ने क्या किया ये ना सोचें, हम क्या कर सकते हैं, बस इतना सोचें"

संजीव तिवारी said...

भाटी जी के संबंध में जानकर खुशी हुई. आभार आपका.

डॉ टी एस दराल said...

अद्भुत. भाटी जी का ज्ञान उपार्जन देखकर हम तो दंग रह गए. ये सच है की कितने ही ऐसे प्रतिभाशाली लोग में जो गुमनामी के अँधेरे में रहकर खो जाते हैं. आपने उनके बारे में लिखकर एक नेक काम किया है. दशहरे की हार्दिक शुभकामनाएं.

राज भाटिय़ा said...

दुनिया मै कोई भी काम मामुली नही होता, छोटा नही होता, जिस दिन यह बात हमारे दिमाग मै बेठ जायेगी वो दिन हमारी तरक्की का पहला दिन होगा, जहां मै रहता हुं इस देश मै वकील, डाकटर भी टेकसी, चलाते है, मजदुरी करते है, लेकिन हेरा फ़ेरी , गलत काम नही करते.
भाटी जी के बारे पढ कर बहुत अच्छा लगा,उन को देखे बिना ही उन के लिये मान सम्मन पेदा हो गया.
धन्यवाद
आप को ओर आप के परिवार को विजयादशमी की शुभकामनांए.

हिमांशु । Himanshu said...

भाटी जी ने तो उदाहरण प्रस्तुत कर दिया है अनेकों लोगों के लिये, और हम सबके लिये प्रबोध का एक सबब भी । आभार ।

Manoj Bharti said...

अशोक कुमार भाटी जी जैसे व्यक्तित्व से परिचित करवाने के लिए धन्यवाद ।

आपका जानकारी देने का अंदाज पसंद आया ।

http://gunjanugunj.blogspot.com

सर्वत एम० said...

यह होती है रचना! चन्द्रमोहन जी, इस रचना के लिए आप की जितनी भी तारीफ की जाए, कम है. यार गिने-चुने ही ऐसे कर्मयोगी इस देश में हैं. हुकूमत चलाने वाले सियासी लोगों की तो नहीं लेकिन अगर हम, आमजन में कुछ लोग भी इनकी हिम्मत, हौसले और जोश की सराहना (केवल शब्दों से नहीं) करें तो शायद इससे प्रेरणा लेकर दूसरे भी उठ खड़े हों और यह देश अपनी सही दिशा और गति प्राप्त कर सके.
एक बात जरूर कहना चाहूँगा, ऐसे लेखों के साथ कविता न जोड़ा करें. यकीन करें, आपको बुरा लगेगा, लेकिन सच्चे मन से स्वीकार कर रहा हूँ कि लेख के साथ कविता देखकर, पहली बार क्रोध और झुंझलाहट का एहसास हुआ. एक बार मैं ने एक निवेदन और किया था, कमेन्ट देने वालों के नाम देकर आभार व्यक्त करने वाली परम्परा बंद कर दें. लगता है, चंदा देने वालों के नामों का एलान किया जा रहा है.
ब्लॉग आपका है, पोस्टिंग भी आपकी है और शायद प्रार्थी अकेला जीव है जो इस तरह की फरमाइश रखता है. लोकतंत्र में मतगणना के आधार पर ही फैसला होता है और मुझे लगता है मैं हार जाऊँगा.

shama said...

Is chaman ke liye kayee baagbaan shaheed hue hain...ye hamesha mahkega!

http://shamasansmaran.blogspot.com

http://aajtakyahantak-thelightbyalonelypath.blogspot.com

http://kavitasbyshama.blogspot.com

रंजना [रंजू भाटिया] said...

काम करने और आगे बढ़ने की ललक हो तो कोई नहीं रोक सकता है ..भाटी जी से परिचय करवाने के लिए आपका शुक्रिया ...ऐसे लोग प्रेरणा देते हैं जीवन में आगे बढ़ने के लिए ...

सहज-सुलभ को भूल जिया असहज जीवन जिसने अंत समय बेबस - गात लिए उसको रोना ही है

बहुत सही सुन्दर लगी यह पंक्तियाँ ..शुक्रिया आपका

hem pandey said...

भाटी जी का हौसला अनुकरणीय है.

BrijmohanShrivastava said...

भाटी जी के वारे मे भी जाना और आपकी सुन्दर रचना भी ,महक उठे वतन यह जतन होना ही चाहिये tiipniyan padhlee lekin aapka lekh aur kavita copy kar google par le jakar padhna padee

SACCHAI said...

" chandr mohan ji ye post ki tarif ke liye hum alfaz khan se laye , ye samj nahi aa raha ...bahut hi umda ....kalam aapki chali na jaane kitani sikh de gayi hume ...bahut hi badhiya .."

----- eksacchai { AAWAZ }

http://eksacchai.blogspot.com

http://hindimasti4u.blogspot.com

"maafi chahta hu ....aur sharminda hu ki itani acchi post per der se aaya ...dar asal mai out of city tha abhi aaya hu ."

लता 'हया' said...

sukria,

bahut accha laga Mr.Bhati ke bare mein padh kar aur haan main
sarwat saheb se itifaaq rakhti hoon.

विनोद कुमार पांडेय said...

Bahut achchi jaankari se awgat karaya aapne..main bhati ji ko unake dhaiyr aur vidhya ke prati yah bhavana ke liye dhanywaad deta hoon...aapki rachana bhi janab bahut achchi lagi..chand laayine hai ,agar dil jeet leti hai..

bahut bahut badhayi..

रश्मि प्रभा... said...

bhati ji ke bare me jankar bahut khushi hui....

ज्योति सिंह said...

तजी न लालच धनवान दीवाने से परवानों ने
सिखा रही अब तकदीर उन्हें विघटन ढोना ही है

सहज-सुलभ को भूल जिया असहज जीवन जिसने
अंत समय बेबस - गात लिए उसको रोना ही है.
bahut hi sundar lekh aur rachana .ye hamara saubhagya hai hame achchhi rachnaye padhne ko milati hai .ulta hum aabhari hai .har manzil mil kar tai ho to safar suhana banta hai .saath dene ki seema nahi hoti .bhati ji ki yogyta dekh dang rah gayi such kahan kaam se gyan ko aankna bhool hai .umda .happy dashhara .

Nirmla Kapila said...

भाटी जी से परिचय बहुत अच्छा लगा
लुटा दिया सारा चमन "मुमुक्षु" इतना दिलदार अभी
'महक उठे सारा वतन' जतन ये अब होना ही है
लाजवाब अभिव्यक्ति है आभार

मुकेश कुमार तिवारी said...

चन्द्रमोहन जी,

श्री भाटी के प्रेरणास्पद जीवनवृत्त के बारे में विस्तार से बताते हुये आपने भी एक पुण्य का कार्य किया है। हम देखते हैं कि ना जाने कितने लोग अपने भाग्य को कोसते हुये पुरूषार्थ से कोसों दूर भागते हैं। कोई कार्य छोटा नही होता, यही सिद्ध कर दिया श्री भाटी ने, उन्हें आगामी उपलब्धियों के लिये अग्रिम बधाईयाँ और आपका उनसे परिचय कराने हेतु आभार।

सादर,


मुकेश कुमार तिवारी

Prem Farrukhabadi said...

post badi hi rochak lagi. badhai!!

अभिषेक ओझा said...

भाटी जी के बारे में कहीं और भी पढ़ा था. हम भी कोशिश कर रहे हैं डिग्रियां बटोरने की, अगर सफल हुए तो :)

चंदन कुमार झा said...

भाटी जी के इस दृढ़ इच्छाशक्ति को सादर नमन । सुन्दर पोस्ट के लिये धन्यवाद । आभार

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

किसी ने सच ही कहा है कि इन्सान यदि चाहे तो क्या कुछ नहीं संभव है...बस जरूरत है तो सिर्फ दृ्ड इच्छाशक्ति की। भाटी जी जैसे ज्ञानपिपासु विरले ही देखने को मिलते हैं...इस विषय में आप भी धन्यवाद के पात्र हैं,जिन्होने ऎसे व्यक्ति को सामने लाने का बहुत बढिया कार्य किया है....हो सकता है कि शायद कुछ लोगों को इनसे प्रेरणा मिल सके।।
पोस्ट बहुत ही बेहतरीन बन पडी है!!!!!

शोभना चौरे said...

bhatiji ki uplbdhiyo ke bare me jankari dekaraapne bhut achha kam kiya hai.badhai
सहज-सुलभ को भूल जिया असहज जीवन जिसने अंत समय बेबस - गात लिए उसको रोना ही है

bhut ghri bat bat khi hai.
abhar

अमिताभ श्रीवास्तव said...

aap har hamesh kuchh nayaa karne ka pryog karte he, yahi rachnadharmita he/ bhati saheb ke baare me janane ka mouka mila/ aour bhi bahut kuchh aapki post se hame padhhne ko mil jata he/ dhnyavad

सुलभ सतरंगी said...

संग्रहनीय प्रसंग ! युवाओं के लिए अनुकरणीय.
बहुत धन्यवाद आपका.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

इस प्रेरणा देने वाली पोस्ट के लिए बधाई!
श्री अशोक कुमार भाटी जी का
चित्र भी लगा देते तो अच्छा रहता।

Murari Pareek said...

अशोक कुमार भाटी जी, जैसी हस्ती से अवगत करवा कर आपने सच मच एक नयी स्फूर्ति दी है, की इंसान चाहे तो क्या नहीं कर सकता " आदमी सोच तो उसका इरादा क्या है " बहुत ज़बरदस्त रचना के आपको बहुत बधाई !!

दिगम्बर नासवा said...

भाटी जी की अभिलाषा पर नतमस्तक हैं हम .......... आपकी लाजवाब रचना की भी कायल हैं हम...... बहुत खूबसूरत पोस्ट ही

Apoorv said...

वाह कितनी सुखद और आश्चर्यजनक बात बताई आपने..भा्टी जी कि यह लगन, मेहनत और शिक्षा के प्रति अनुराग आदर्श और अनुकरणीय है हमारी पूरी पीढी के लिये..और ऐसे व्यक्तित्व को किसी सरकारी सम्मान से तौला भी नही जा सकता..और एक विचारपूर्ण कविता के लिये बधाई

Apoorv said...

हाँ और पोस्ट के साथ टिप्पणियों का आभार प्रकटीकरण न तो आवश्यक लगता है और न समीचीन..शायद मुझे ही ऐसा लगता हो..

Mrs. Asha Joglekar said...

Bhatee jee ka abhinandan aur anek shubh kamanaen aapka bhee bahut dhanywad jo aapne ye sunder jankaree hame dee.

Suman said...

लुटा दिया सारा चमन "मुमुक्षु" इतना दिलदार अभी 'महक उठे सारा वतन' जतन ये अब होना ही है
nice

Suman said...

लुटा दिया सारा चमन "मुमुक्षु" इतना दिलदार अभी 'महक उठे सारा वतन' जतन ये अब होना ही है
nice

दर्पण साह "दर्शन" said...

भाई "ज्ञानदत्त" जी ji agar kuch karna bhi chahein to kya bahti ji jaise log aisa karne deinge...
mujhe to wo bade hi swalambi lage....

...bhati ji jaise vyaktitva se avgat karane ke liye dhanyavaad.

Aproov ji ki 2nd tippani meri bhi maani jaive:
(lekin kewal meri hi maani jaive, kisi aur ke baare main main kuch nahi keh sakta):
"पोस्ट के साथ टिप्पणियों का आभार प्रकटीकरण न तो आवश्यक लगता है और न समीचीन.."

महफूज़ अली said...

aapka bahut bahut dhanyawaad Bhati sahab ke baare mein batane ke liye.........

aise hi GK badhate rahiuye........


bahut hi achcchcha lekh hai.........


तो क्यूँ ना माँगूं आसमाँ यहाँ??
\
dekhiyega...

रंजना said...

भाटी जी का जीवन सचमुच अत्यंत प्रेरणादायक है...जिस व्यक्ति ने अपने कर्मो से यह सिद्ध कर दिया कि फल से लदा वृक्ष हमेशा झुका होता है,वस्तुतः उसीने सच्चे अर्थों में जीवन को जिया और लीक से अलग हटकर एक नया रास्ता बनाया...

बहुत बहुत आभार आपका इनके बारे में बताने के लिए...
आपकी कविता बहुत सुन्दर है...

sandhya said...

bahut achhi rachana...

पी.सी.गोदियाल said...

एकदम सही बात उठाई आपने ! इज्जत का काम कोई भी छोटा-बड़ा नहीं होता चाहे इंसान कितना ही पढा लिखा क्यों न हो !

Udan Tashtari said...

भाटी जी और उनकी लगन के बारे में जानकर अच्छा लगा. ज्ञानार्जन की ऐसी ही इच्छाशक्ति होना चाहिये. अच्छा आलेख.

Devendra said...

ग्यानार्जन तो अच्छा है मगर डिग्री अर्जन तो मात्र एक जुनून ही कहलाएगा।

sanjay vyas said...

bhati ji ke baare men sun chuka hun kabhi zaroor milne kee koshish karoonga.dilchasp hai ye shouk.aapka aabhar.

Harsh said...

bahut achcha likhte hai aap khastaur se aapki kavita bahut prabhav shaali hoti hai.....bas likhte rahhiye.....

singhsdm said...

It was good to know about Bhati Ji....really there is no end of enthuasism....GOD WISHES on VIJAY DASHMI

गिरिजेश राव said...

भाटी जी से परिचय कराने के लिए धन्यवाद।
लगन और जुनून से बहुत कुछ सम्भव है।
....
आप तो बड़े 'रंगीन मिजाज' हैं!
लेख में इतने रंगों के प्रयोग देख कर कह रहा हूँ और कोई बात नहीं है ;)

वन्दना अवस्थी दुबे said...

भाटी जी को सामने लाकर आपने पुनीत कार्य किया है. बधाई.

Prem said...

भाटीजी जैसे भी लोग होते हैं ---आश्चर्य हुआ ,आपकी कविता बहुत अच्छी लगी ,समय मिलते ही आपकी पुरानीपोस्ट्स पदूगी,स्थान परिवर्तन हो तो समय लग जाता है लाइन पर आते आते ,अभिनन्दन

योगेश स्वप्न said...

meri badhai pahunchaayen bhati ji ko.
aapka aabhaar.

mark rai said...

बहुत बहुत धन्यवाद भाटी साहब से परिचय कराने का......गुमनामी के अँधेरे में रहकर खो जाते हैं. आपने उनके बारे में लिखकर एक नेक काम किया है.
धन्यवाद .....

अनुपम अग्रवाल said...

गिरे कर्मों का व्यापार दिला दौलत तो जाता है
खुले कथा जब भी यार सभी "स्वजन" खोना ही है

माना कि ये व्यापार दिला दौलत तो जाता है

मगर इस महंगाई में इस दौलत में क्या आता है

महक फैल जाये आपके लिखे की जग में

फिर दिल खो जाये तो ये तो होना ही है