Monday 21 September 2009

दुर्गा पूजा, ईद, दशहरा, आमरण अनशन, इंसानों कि उलट कथा, मितव्ययिता और आभारव्यक्ति

दुर्गा पूजा, ईद, दशहरा, आमरण अनशन, इंसानों कि उलट कथा, मितव्ययिता और आभारव्यक्ति
दुर्गा पूजा, ईद, दशहरा
कितना अज़ब संयोग है, प्रकृति का इसे अप्रतिम वरदान भी कह सकते हैं कि विभिन्न धर्म सम्प्रदायों को अपने-अपने सर्वप्रिय त्यौहार एक साथ मिलजुल कर मनाने का सुखद और भावभीना अवसर प्राप्त हुआ. सभी के लिए ये त्यौहार ख़ुशी के त्यौहार हैं, बरसात तो कम हुई पर त्योहारों की बारिश देख हर कोई प्रफ्फुल्लित है. रात-दिन सभी तरफ रौनक और खुशहाली का आलम ही भयंकर महंगाई के बावजूद भी दृष्टिगत ही हो रहा है.
"रब" से हमारी करबद्ध प्रार्थना है कि ऐसी सार्वधर्मिक अप्रतिम खुशियों को किसी की भी बुरी नज़र न लगे और सब मिलजुल कर इसे बेहतर ढंग से निर्भीक हो कर पूर्ण आनंद और ख़ुशी से मना सकें. आशा ही नहीं वरन विश्वास भी है की यदि रब ने संयोग बनाया है तो ईमानदार प्रार्थना/इबादत भी सुनेगें ही.........
आप सभी को दुर्गा पूजा, ईद, दशहरा की हार्दिक शुभकामनाएं.
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आमरण अनशन

राजस्थान पत्रिका समाचार पत्र १४ सितम्बर के अंक के सम्पादकीय के माध्यम से यह जानकर असीम दुःख के साथ बेहद प्रसन्नता हुई कि दिल्ली के ९१ वर्षीय स्वाधीनता सेनानी माननीय संबु दत्ता जी ने राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी की पुण्यतिथि के दिन अर्थात् आगामी ३० जनवरी,२०१० से भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जंग का संकल्प लेते हुए "केन्द्रीय सरकार को भ्रष्टाचार के विरुद्ध ठोस कार्यवाही प्रारंभ करने के लिए मजबूर करने निमित्त" "आमरण अनशन" शुरू करने जा रहे हैं.
असीम दुःख कि अनुभूति इसलिए कि सरकार जो स्वयं में सक्षम है,इतनी बड़ी छूत की इस बीमारी (भ्रष्टाचार) के विरुद्ध आज तक कोई भी ठोस कार्यवाही को सच्चे अर्थों में अंजाम न दे सकी और यह बीमारी दिन दुनी रात चौगुनी बढती ही गई...... एक ९१ वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी को आमरण अनशन का संकल्प इसलिए लेना पड़ा कि
* वह सरकार को उसके महत्वपूर्ण कर्तव्य कि याद दिला सके.....
* पढ़े-लिखे उर्जा से भरे युवा भी इसके विरोध में खड़े होने का संकल्प न ही ले सके और न ही आज तक कुछ ठोस कर ही सके, बल्कि ज्यों ज्यों उम्रदराज़ होते गए, उनमें से अधिकांश भ्रष्टाचार में ही लिप्त होते गए... शायद "समय के काले सायों के साथ चलना" ही उनकी नियति बन गयी है........
* सत्तारूढ़ पार्टी का इतना बड़ा कैडर, इतनी बड़ी संख्या में मंत्रियों की फौज, लाखों कि संख्या में जिम्मेदार से कहे जाने वाले बड़े-बड़े अधिकारी पर किसी ने भी इस विषय को आज तक इतनी गंभीरता से न लिया, कुर्सी से चिपकाना पसंद किया पर जनहित, राष्ट्र हित में आमरण अनशन, अहिंसात्मक सरकार-चेतना आन्दोलन भी करने की हिमाकत न कर सके.......

और बेहद प्रसन्नता का अहसास इसलिए कि कोई तो है अभी भी इस देश में जो देश की अभी भी चिंता करता है और इस गंभीर बीमारी के विरुद्ध सरकार को कृतसंकल्पित होने के लिए मजबूर करने निमित्त अपनी जान की बाजी भी लगाने को तैयार है....

यदि हम और कुछ न कर सकें तो कम से कम इतनी प्रार्थना तो कर ही सकते हैं कि ईश्वर मानसिक रूप से स्वस्थ, चुस्त, दुरुस्त इस ९१ वर्षीय स्वाधीनता सेनानी की पवित्र रगों में इतनी शक्ति प्रदान करे कि आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे भ्रष्टाचारियों को उनके वास्तविक मुकाम तक पहुँचा सकने के लिए सरकार को मजबूर करने में सक्षम हो सकें.

दुःख का विषय है कि पूर्व में तत्कालीन सर्वाधिक युवा प्रधानमंत्री ने देश में व्याप्त आकंठ भ्रष्टाचार कि बात को स्वीकार कर ईमानदारी का तो परिचय दिया था किन्तु कोई कारगर कदम उठाने कि हिमाकत न कर ईमानदारी को एक बार फिर हारने देने का अक्षम्य अपराध भी किया. उन्हें शायद सारथी के रूप में कोई "कृष्ण" न मिला जो उन्हें अपने ही भ्रष्ट भाई-बंधुओं के विरुद्ध अंतिम घोर युद्ध लड़ने के लिए प्रेरित करने हेतु "गीता" ज्ञान देता. और ऐसे अस्त्र-शस्त्र डाल देने वाले का भी हम "समरथ को नहि दोष गुसाई" के रूप में महिमा मंडन ही करते आ रहे हैं.

वर्तमान प्रधान मंत्री भी भ्रष्टाचार की बात तो स्वीकारते है,अधिकारियों को भी कारगर कदम उठाने का भाषण तो पिलाते हैं पर महामारी के विरुद्ध जैसे कारगर कदम उठाने चाहिए और उसकी निगरानी, समीक्षा और उचित संरक्षण प्रदान करना चाहिए, हाल-फ़िलहाल तो कहीं दर्शन होता दिखाई नहीं देता है, और इसी कहावत को चातितार्थ करता दिखाई देता है "थोथा चना, बाजै घना"

भविष्य के कहे जाने वाले संभावित सर्वाधिक युवा प्रधानमंत्री भी अपने पिता से भी अधिक सच बयानी करते हुए बढे हुए व्याप्त भ्रष्टाचार कि बात को स्वीकार करने में नहीं हिचकिचाते, पर कर्म द्वारा भ्रष्टाचार के विरुद्ध अभी तक उनका भी कोई युद्ध प्रारंभ न हो सका, अर्थात् यहाँ भी वही "ढाक के वही तीन पात" द्रष्टिगत हो रहे हैं....

अब जबकि सक्षम को भी अहसास है भ्रष्टाचार का, भ्रष्टाचार के कारण होने वाले दुष्प्रभावों का, स्विस बैंक में जमा अकूत काले धन का,तो अब तक की असक्षमताओं की जिम्मेदारी लेते हुए कौन जवाब देगा कि
* आज तक भ्रष्टाचारियों के विरुद्ध कारगर ठोस कार्यवाही क्यों न कि जा सकी
* यदि योजना बनी तो उसे अमल में लाने से किसने रोका
* संभावित हो चुके नुकसानों, दुष्प्रभावों कि वसूली किससे कि जाए
* राष्ट्र-गरिमा को कलंकित करवाते हुए सर्वाधिक भ्रष्ट राष्ट्रों कि श्रेणी में भारत जैसे देश का भी नाम शामिल करवाने के लिए जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध "राष्ट्र-द्रोह"का मुकदमा क्यों नहीं चलाया आदि-आदि...
वैसे भी देश की अदालतों में तो ज़रा-ज़रा से बात के लिए भी तो लाखों की संख्या में मुकदमें चल ही रहे हैं...

एक अदनी सी जनता होने के नाते मैं नेताओं, सत्ताधारियों, जिम्मेदारों से अपील करता हूँ कि वे जनता से "अमल" करने की अपील करने के पहले खुद भ्रष्टाचार पर लगातार ठोस कार्यवाही का पुख्ता सबूत पेश कर ईमानदार आम जनता के समक्ष न केवल आदर्श उपस्थित करें बल्कि वर्षों से टूटा विश्वास तो जगाएं, दुगने उत्साह से ये जनता आपके साथ खड़ी मिलेगी... इसमें कोई दो राय नहीं. कथनी, और अपील से अधिक करनी पर विश्वास कर अधिकारीयों को और ज्यादा कर्मठ, न्यायिक और ईमानदार बनाने की और ज्यादा ध्यान और समय दें, यही वास्तविक जिम्मेदारी है.
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अब जबकि इंसानों की इस वर्तमान दुनिया में ज्यादातर उलटा ही चल रहा सा दिख रहा है और उसी में जीना भी लगातार सीखते जा रहे मानव की,जो प्रकृति की अद्वितीय सर्वश्रेष्ठ कृति कही जाती और प्रकृति की अन्य दूसरी द्वितीयक, तृतीयक....कृतियों की गतिविधियों की तुलना करने का एक अदना सा प्रयास ग़ज़ल के रूप में किया है.......
नज़ारे इनायत है.....

इंसानों की उलट कथा

लगते ही फल पेड़ों की टहनी भी झुक जाती है
इंसानों की उलट कथा "बढ़ हिम्मत इतराती है"

बेलें पा कर तनिक संग आँचल में ढक लेती हैं
इंसानों की उलट कथा "भेद सभी खुलवाती है"

कर किलकारी नदियाँ तो बहती नित नीचे रहती
इंसानों की उलट कथा "गदरा कर मस्ताती हैं"

मटमैली सी भू-माँ का "घास हरी' श्रंगार करे
इंसानों की उलट कथा "रिश्तों से कतराती है"

मुमुक्षु प्रकृति से कुछ भी ले थोडा भी कुहराम नहीं
इंसानों की उलट कथा "कोलाहल मचवाती है"

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मितव्ययिता का उलट गणित
अभी विगत दिनों मितव्ययिता का खासा प्रचार कांग्रेस की अध्यक्षा सोनिया जी और उनके पुत्र राहुल गाँधी ने क्रमशः हवाई जहाज के इकोनोमी क्लास और शताब्दी एक्सप्रेस के एसी चेयर कार में यात्रा करने से हुआ. माननीय थरूर जी ने अपने इन नेताओं को "होली काउज" कहते हुए भविष्य में इन्ही की तरह "कैटल क्लास" में यात्रा करने की बात तक कह दी.
अब जरा यह भी जान लें की यसपीजी सुरक्षा प्राप्त व्यक्ति के लिए क्या करना पड़ता है. हवाई जहाज के इकोनोमी क्लास में इनके लिए आगे की प्रथम चार पंक्तिया खाली रखनी पड़ती है, यही नियम ट्रेन में भी है. आप खुद सोच सकते हैं की यह यात्रा कैसे देश हित में मितव्ययी हुई?
अब यही नहीं दिल्ली-लुधियाना के बीच की ४०० किलोमीटर की दूरी पर ट्रेन के रूट में पड़ने वाले तीन राज्यों में करीब १५००-१६०० जवान तैनात थे,और तो और रस्ते में हुई पथराव की घटना की जाँच जारी है जिस पर और कितना खर्च होगा, भगवान जाने. कहने का आशय यह कि दिखावे कि यह राजनीति देश पर भारी पड़ रही है.दिखावा कर आदर्श प्रस्तुत करने का माद्दा है तो तो सभी सुरक्षा हटा कर गुप्त रूप से आम यात्री बन यात्रा करो, देश की सही तस्वीर परखो, सच और गलत का भेद करना सीखो,अवसरवादियों और जरूरतमंदों की पहचान करना सीखो. शायद यही सबसे अधिक मितव्ययी, सच्चा और भरोसेमंद जनादर्श है और राष्ट्रपिता गाँधी जी का देश के भावी कर्णधारों के लिए सन्देश भी.
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आभारव्यक्ति
मेरी पिछली पोस्ट (१४ सितम्बर,२००९) पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले निम्न सम्मानीय क्षुदी और शुभचिन्तक पाठक/ पाठिकाओं... या कहें कि स्नेहिल टिप्पणीकारों (क्रम वही, जिस क्रम में टिपण्णी/ प्रतिक्रिया/ आलोचना प्राप्त हुई)....
बबली जी, नीरज गोस्वामी जी, सर्वत एम. ज़माल जी, दिगम्बर नासवा जी, निर्मला कपिला जी, विनोद कुमार पांडेय जी, Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" जी, राज भाटिय़ा जी, अभिषेक ओझा जी, ज्ञानदत्त पाण्डेय जी, "क्षमा" जी, लता 'हया' जी, अल्पना वर्मा जी, योगेन्द्र मौदगिल जी, समीर लाल (उड़न तश्तरी)जी, पी.सी. गोदियाल जी, प्रसन्न वदन चतुर्वेदी जी, शरद कोकास जी, दर्पण साह 'दर्शन' जी, शोभना चौरे जी, ज्योति सिंह जी, डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी, सुमन जी, रंजना [रंजू भाटिया] जी, अनुपम अग्रवाल जी, रंजना (रंजना राठौर) जी, सुलभ सतरंगी जी, मुरारी पारीक जी, अमिताभ (अमिताभ श्रीवास्तव) जी, योगेश स्वप्न जी, मार्क राय जी, अलका सर्वत जी, चंदन कुमार झा जी, क्रिएटिव मंच, Mrs. आशा जोगलेकर जी, डा. संध्या गुप्ता जी, अपूर्व जी, मुकेश कुमार तिवारी जी, वंदना अवस्थी दुबे जी, हिमांशु पाण्डेय जी, राजीव (भूतनाथ जी), संजय व्यास जी, प्रेम फर्रुखाबादी जी एवं मनोज भारती जी का विशेषरूप से हार्दिक आभारी हूँ कि आप सभी ने पहले की ही तरह स्नेह बनाये रखते हुए १४ सितम्बर की मेरी पोस्ट पर भी ह्रदय से मेरी हौसला अफजाई कर भविष्य में भी इसी तरह कुछ न कुछ लिखते रहने और पोस्ट करने लायक संबल प्रदान किया है और आशा है कि भविष्य में भी कुछ यूँ ही अपना-अपना स्नेहिल मार्गदर्शन मेरे ब्लाग पर आकर मुझे अनवरत प्रदान करते रहेंगें....

मैं उन गुरुजन से टिप्पणीकारों का भी विशेष रूप से आभारी हूँ, जिन्होंने अलग से मेरे मेल ऐड्रेस पर सन्देश लिख मुझे और भी बेहतर लिखने मार्फ़त सुझाव/टिप्स दिए.

और अंत मे, मैं अपने उन सह्रदय, परम आदरणीय टिप्पणीकारों का भी आभार व्यक्त करना चाहता हूँ, जो प्रायः मेरे ब्लाग पर आकर मुझे अपने आशीष वचनों से नवाजते ज़रूर हैं, किन्तु मेरी पिछली पोस्ट पर किसी न किसी खास काम में व्यस्तता के कारण टीका-टिपण्णी करने से चूक गए.
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54 comments:

पी.सी.गोदियाल said...

"दिखावे कि यह राजनीति देश पर भारी पड़ रही है.दिखावा कर आदर्श प्रस्तुत करने का माद्दा है तो तो सभी सुरक्षा हटा कर गुप्त रूप से आम यात्री बन यात्रा करो, देश की सही तस्वीर परखो, सच और गलत का भेद करना सीखो,अवसरवादियों और जरूरतमंदों की पहचान करना सीखो. शायद यही सबसे अधिक मितव्ययी, सच्चा और भरोसेमंद जनादर्श है और राष्ट्रपिता गाँधी जी का देश के भावी कर्णधारों के लिए सन्देश भी."

बहुत सुन्दर, चन्द्र मोहन जी, आपको भी त्योहारों की हार्दिक बधाई !

बुरा न माने तो एक अदा सजेसन देना चाह रहा था, पहला यह कि अगर आप अपने ब्लॉग का नाम हिन्दी में रूपांतरित कर दे दो अच्छा दिखेगा ! दूसरा यह कि आपका जो लेख होता है उसमे मुख्य विषय को सबसे ऊपर रखे और उसे काले अक्षरो में ही लिखे तो अधि प्रभावी दिखेगा! एनी s आम्ग्री को आप कलर फॉण्ट में दिखा सकते है ! कुछ गलत ल्लिख दिया हो तो क्षमा !

Babli said...

चंद्र मोहन जी आपने इतना बढ़िया लिखा है की आपकी तारीफ के लिए अल्फाज़ कम पर गए! रचना बहुत ही शानदार लिखा है आपने ! अभी तो त्योहारों का ही मौसम है! हमारे देश में इतने सारे त्यौहार मनाये जाते हैं और यही समय है की लोग आपस में मिलजुलकर रहे और न कोई भेद भाव हो तभी हमारा देश उन्नति कर सकता है! आपको नवरात्री की हार्दिक शुभकामनायें!

Apoorv said...

चंद्र मोहन जी एक विचारोत्तेजक लेख के लिये आभार..
हमारे स्वर भी अपनी करबद्ध प्रार्थना मे मिला लीजिये..
और भ्रष्टाचार के रथ के हम खुद पहिये हैं सो कितने अकेले चने भाड़ फोड़ पायेंगे..आखिर स्विस बैंको मे विदर्भ के किसानों का पैसा नही जमा है..ना चाँदनी चौक मे खोमचे लगाने वालों का खाता है वहाँ पर..बल्कि यह देश का पैसा देश के कर्णधारों के नाम पर ही जमा है..सो कौन किस पर कार्यवाही करेगा..सब एक नाटक है
..हाँ कविता बड़ी सच बन पड़ी है
एक अनुरोध भी है आपसे कृपया नाम के साथ जी का पृत्यय ना जोड़े..इसके योग्य नही हूँ मैं.
आभार!!

चंदन कुमार झा said...

बहुत सुन्दर लेख । आपको नवरत्रि की शुभकामनायें ।

mark rai said...

kaaphi achcha sir..aaj bhrashtachaar ki bimaari se ladne ke liye....kuchh vishesh prayas karna hi padega..aapko navraatra ki shubhkaamna......

विनोद कुमार पांडेय said...

Sarkaar ki yahi niti hai hamesha chillati rahati hai bhrshtachar khatam karo par kaam ke naam par kuch nahi karati..

badhiya bhav liye hue sundar kavita..

hem pandey said...

आपने भ्रष्टाचार का जिक्र किया है, जिसके विरुद्ध आजतक कोई कारगर कदम नहीं उठा है.नेताओं और अफसरों से तो फिलहाल कोई उम्मीद नहीं की जानी चाहिए,अलबत्ता आम जनता के बीच जागरूक लोग असंगठित रहते हुए भी पहल कर सकते हैं, यदि वे रिश्वत देने के बजाय थोडा बहुत कष्ट झेलने को तैयार हों.

राज भाटिय़ा said...

९१ वर्षीय स्वाधीनता सेनानी माननीय संबु दत्ता जी से मेरा हाथ जोड क निवेदन है कि वो यह अनशन ना करे, क्यो कि इस देश मै भ्रष्टाचार इस कदर बढ गया है कि इसे कत्म करने के लिये अनशन की नही पकड के मारने की जरुरत है, जिसे देखो भ्रष्टाचार मै लिप्त पकड कर मारो.
ओर यह दिखावे की राजनीति क्या है यह भी तो एक भ्रष्टाचार ही है. आप ने लेख बहुत सुंदर लिखा धन्यवाद

'अदा' said...

bahut sundar lekh likha hai aapne..
aapki gazal bhi bahut acchi ban padi hai..
jahan tak brashtachaar ka prashn hai wo to rakt mein racha-basa hai wa kahan jaayega..
mushkil to hai lekin asanbhav nahi..
koshish jaari rahe aaj nahi to 100-200 saalon mein chala jaayega..

अमिताभ श्रीवास्तव said...

gandhiji ke anashan ke baad ab kisi ka bhalaa hotaa he me to nahi jaanta/ anshan khud ko nasht karne ki ek prakriya he, magar jab desh me insaano ki keemat kuchh nahi rahi tab anshan kitana saartha hoga yah kahaa nahi jaa sakat, fir bhi..anshan me apani ek shaqti hoti he, dekhe isaka parinaam kesa nikaltaa he/ kher..
aapki rachna aour aabhaar vyakt karne ki ada sab kuchh neeraalee he, ishvar aapko sadev aage rakhe/
shubhkamnao sahit/
Amitabh

दर्पण साह "दर्शन" said...

jai jai hai "pseudo politics"....

:)

दिलीप कवठेकर said...

आपको त्योहार की बधाई.

मुकेश कुमार तिवारी said...

चन्द्रमोहन जी,

आँखें खोल देने वाला आलेख, चिंता जगाती कविता सभी कुछ किसी परफेक्ट मसाले की तरह।

अच्छा और सजग लेखन।

त्यौहारी शुभकामनाओं के साथ ।

सादर,


मुकेश कुमार तिवारी

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

वाह, लेखन में आज बहुत सुन्दर कोलाज के दर्शन हुये!

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

चन्द्र मोहन जी, बहुत ही बढिया और सजग लगा ये लेख.......
ये तो इस देश के लोकतंत्र और समाज के मुहँ पर तमाचे के समान है कि जहाँ एक 91 वर्षीय वृ्द्ध व्यक्ति को भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे पर आमरण अनशन करना पड रहा है..... बेहद शर्मनाक स्थिति!!

Harsh said...

bahut sundar prastuti ke liye shukria... aapki har post ka besabri se intjaar rahta hai............

ज्योति सिंह said...

maa durga ke is avasar par dhero badhai ,
लगते ही फल पेड़ों की टहनी भी झुक जाती है
इंसानों की उलट कथा "बढ़ हिम्मत इतराती है"
is sundar pankti ke saath .
rajniti ke upar p.c.ne bahut aham baate kahi hai jinse main bhi sahamat hoon .

दिगम्बर नासवा said...

sach mein ye dikhaava aur iska badhta chalan in raajnetaaon ki den hai ... pata nahi is desh ko kahaa le ja rahe hain hamaare karndhaar .....

Kursi aur bas kursi ... iske alaawa kuch dikhaai nahi deta in ko ......

नीरज गोस्वामी said...

गुप्ता जी आपके इस सच्चे और सार्थक लेख के लिए बहुत बहुत बधाई...
नीरज

Udan Tashtari said...

दुर्गा पूजा, ईद, दशहरा की हार्दिक शुभकामनाएं.


९१ वर्ष की आयु में आकर एक बुजुर्ग को जिस देश में आमरण अनशन करना पड़े और युवा सब कुछ अपनी नियति मान बैठे हों, तब क्या कहा जाये.

तीन पोस्टों की सामग्री एक ही पोस्ट में दिखी.

बहुत बधाई एवं शुभकामनाएँ.

रंजना said...

आलेख में जितने भी विषय आपने उठाये,प्रभावी ढंग से उनकी समीक्षा की है...आज हर आम आदमी इस बात ऐसे ही क्षुब्ध है...परन्तु उन महान स्वतंत्रता सेनानी के सम्मुख हमें नतमस्तक होना चाहिए जिन्होंने इसके लिए मर मिटने का संकल्प लिया है...

जागृत करता सार्थक आलेख हेतु आभार.

अभिषेक ओझा said...

असीम दुःख के साथ बेहद प्रसन्नता वाला विरोधाभास तो इंसान के साथ है ही. और अपने देश में तो... है ही.

Devendra said...

बहुत कुछ लिखा है आपने----
पढ़कर अच्छा लगा।

manu said...

bahut sunder lekih...

Dr.T.S. Daral said...

भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाकर आपने एक नेक काम किया है , साथ ही दोहरी राजनीति पर भी कटाक्ष.
किसी भी बुराई को खत्म करने के लिए उसके खिलाफ आवाज़ उठाना बेहद ज़रूरी है. बधाई

BrijmohanShrivastava said...

aapke lekh me mujhe ()()()()()() hee dikh rahee hain yahee to meree samasya hai |ab main soch raha hoon ki aapke lekh ko select karke googl ke translation par le jaaoon to shayad padh sakoon

shama said...

काश हर कोई ऐसा सोचे ...!कुदरत ने कब चाह कि इंसान से इंसान तक़सीम हों ? ये तो हमारे तथा कथित 'रहनुमाओं' का किया कराया है.. , जिस कारण इंसानियत का खून बहता है ..जबतक इंसानियत का खून ख़राबा नही होता , तारीख़ लिखी नही जाती ..इतिहास ने हमेशा यही कीमत माँगी है...और इतिहास इस धरती पे रहनेवाले ही गढ़ते हैं..नारा यह हो,कि,' हम में से कोई होगा गौतम, हम में से कोई होगा गांधी..प्यारकी राह दिखा दुनिया को, रोके जो नफरत की आँधी...'

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रंजना [रंजू भाटिया] said...

अच्छा लगा आपका यह लेख ..बहुत बहुत शुक्रिया जी

सर्वत एम० said...

इतने जानदार लेख के लिए अगर बधाई न दूं तो गुनहगार हो जाऊंगा. रही बात भ्रष्टाचार और उसके खिलाफ अनशन की--------भ्रष्टाचार देश की मुख्यधारा में शामिल हो चुका है, विरोध प्रदर्शन, अनशन आदि से उसका कुछ भी बिगड़ने वाला नहीं. अभी २ रोज़ पहले, ईद के दिन मैं बस से गोरखपुर जा रहा था, एक मुस्लिम परिवार ने टिकट लेते समय अपने लगभग ७-८ वर्षीय बच्चे को ४ वर्ष का बता दिया. २९ दिन रोजे रखने के बाद यह आलम है. ये घुन, नहीं कैंसर हमारे खून में शामिल है. इमर्जेंसी के दौरान जब डंडे की हुकूमत थी, सभी ईमानदार थे. डंडा मजबूत हो जाये तो सब कुछ ठीक हो जायेगा. अब प्रजातंत्र, लोकतंत्र की दुहाई मत दीजियेगा, राष्ट्र को रास्ते पर लाना है तो कड़वी दवा देना होगा. गोस्वामी जी भी कह चुके हैं----बिनु भय होंहि न प्रीत.... आपका क्या ख्याल है?

सुलभ सतरंगी said...

आमतौर पे ऐसे लेखों पर मैं टिपण्णीया करने में मैं स्वयं को अक्षम पाता हूँ.

हाँ भ्रष्टाचार के विरोध में प्रतिदिन (या सप्ताह) में एक पोस्टकार्ड मुख्यालय भेजा जाये तो पहल सार्थक होगी और निश्चित ही फलदायी होगा. इस ब्लॉग के माध्यम से मैं सभी से यही अपील करता हूँ. एकल आमरण अनशन से सफलता मुश्किल है.

सार्थक पोस्ट के लिए आपका शुक्रिया.

Murari Pareek said...

संबु दत्ता जी, ko naman hai,
काश ऐसी लहर पुरे देश में उठे और भ्रष्टाचार मिटाने का कडाई से कदम उठे, रही बात नेताओं की तो उनका क्या कहना नेता और बड़े बड़े बाबाओं की शालीनता अलग ही होती है | नवरात्र, दशहरा और ईद की आपको भी बहुत बहुत बधाई हो| हिन्दू मुस्लिम में जीतनी समानता है किसी भी धर्म में नहीं \ चंद नेताओं ने दुश्मनी के बिज ऐसे बोए हैं की एक दुसरे के लिए दिल खट्टे कर दिए |

शरद कोकास said...

चन्द्र मोहन जी मुझे लगता है मनुष्य का जन्म ही उत्सव मनाने के लिये हुआ है इसलिये उसके पैदा होते ही उत्सव मनाना शुरू हो जाता है जो उसके अंत के बाद भी चलता रहता है । धर्म तो मनुष्यता के आगे गौण वस्तु है । आपने इस पोस्ट मे विस्तार से अपने विचार लिखे है यह सोचकर दिल दहल गया कि दत्ता जी को 91 वर्ष की आयु मे आमरण अनशन करना पड रहा है । क्या इसी लिये देश की आज़ादी मे उन्होने अपना योगदान दिया था इस प्रश्न के साथ यह प्रशन भी उनके मन मे आता होगा कि क्या वे यही दिन देखने के लिये जीवित हैं शरद कोकास

योगेश स्वप्न said...

bahut sahi, samyik, likha hai.

bhrashtachaar par aur likhen taki sarkar tak aapki aur hamaari awaz pahunch sake, shubhkaamnaayen.

महफूज़ अली said...

sabse pehle to aapse muafi chahoonga.......... deri se aane ke liye......... itni achchi post pe main der se aaya........ darasal ghar gaya hua tha...... aaj hi subah aaya hoon........ aapke post pe deri se aane ke liye sharminda hoon..........

aapke is lekh ki jitni tareef ki jaye kam hai....... bhaut itminaan se is post ko padha..... padhne ke baad kaafi chintan manan bh kiya...... yeh ajab sanyog hamesha aaye......... aur hum sab hamesha miljul kar rahen.......बरसात तो कम हुई पर त्योहारों की बारिश देख हर कोई प्रफ्फुल्लित है. yeh line to bahut hi achchi likhi hai aapne........

aur insaanon ki ulat kataha ki to kya kahne.........



bahut hi behtareen........

शोभना चौरे said...

ak vykti ke aamrn anshan se kuch hasil nhi hoga .ye unki mhanta hai jo unhone apne aap ko smrpit karne ka beeda uthaya hai .
ye ak tarh se sare desh ke liye avhahn hai .ki utho desh vasiyo jago aur sab ak hokar is bhrshtachar ke khilaf sarthk kadm uthao .
mai sulbhji ke sujhav se shmat hoo .roj ak card likha jay .aur ab to mail ki bhi suvidha hai .sare blogar bhi agar milkar prytn kre to ak ptta to hil hi sakta hai .
apki gjal bhi bhut sarthak hai .
ak sath itne sare vishay par likhna aap jaise guni hi kar skte hai .badhai

Suman said...

मुमुक्षु प्रकृति से कुछ भी ले थोडा भी कुहराम नहीं
इंसानों की उलट कथा "कोलाहल मचवाती है"nice

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

सारगर्भित लेख......बहुत बहुत बधाई....

Mrs. Asha Joglekar said...

जब सत्ता धारियें मे ही सबसे ज्यादा भ्रष्टाच्री हैं तो कौन किसके खिलाफ कारयवाही करेगा । िनमेसे किसी ेक के खिलाफ भी जनहित याचिका दायर हुई है क्या । आपकी कविता वास्तव को दर्शाती है ।

sandhyagupta said...

Aap apni har post me gagar me sagar bhar late hain.

रश्मि प्रभा... said...

ek sarthak sandesh,.......aapko bhi hamari shubhkamnayen

हिमांशु । Himanshu said...

बहुत कुछ समेट लेते हैं आप अपनी प्रविष्टि में । बहुआयामी लेखन । इंसानों की उलट कथा तो अदभुत है । आभार ।

Nirmla Kapila said...

देर से आयी हूँ सभी बहुत कुछ कह चुके हैं पोस्ट बहुत अच्छी है नवरात्र पर्व की शुभकामनायें

योगेन्द्र मौदगिल said...

Wah..
बेहतरीन प्रस्तुति... स्टाइलिश.. बधाई..

अल्पना वर्मा said...

प्रभावशाली पोस्ट है.
एक और त्योहारों की ख़ुशी है..मंदी के इस दौर में भी सभी अपने हिसाब से पर्व मना ही रहे हैं.
दूसरी तरफ ९१ वर्षीय स्वाधीनता सेनानी के २०१० में किये जाने वाले आमरण अनशन से मन दुखी भी है..क्या आज देश की इतनी दयनीय स्थिति हो गयी है की एक इतना बुजुर्ग अपनी जान दांव पर लगा दे !बेहद दुखद!
भ्रष्टाचार इतनी गहराई तक पहुंचा हुआ है की ऐसे मिटाना इतना आसान नहीं है.
कानून कड़े करने होंगे और व्यवस्था को दुरुस्त.

Swatantra said...

Chandar mohan Gupta jee,

It was unbelievable to read your comments on my blog.. While writing this post i have never thought that a person from the city itself will write such an encouraging comment.. Lets not restrict yourself with only on this post.. I will be glad if you visit again and write on my other posts also..

We had real fun at Jaipur, just loved the city.. will visit again your city!!

Thanks for the comment on my post..

sangeeta said...

aapke lekh padhe...gyanvardhan ke saath jagrookta pradaan karane wale hai...insano ki ulat katha...mann ko chhu gayi...bahut bahut badhai in rachnaon ke liye...

aabhaar ki aapne mere blog par darshan diye.

Rakesh said...

chandramohanji
aapke vichar bahut hi nek hai aur samsamiyk hai..enper amal ker hum wah desh bana sakte hai jiski svatantrata senaniyon ne kabhi ki hogi..hum manav samaj sabse samvedenshil v sabse jyada samajdar v apni budhi ke sahare ek aur viswa ki rachna kerne mein samart hai magar humari niche girte charitra ka uthan kerne mein na jane kyon asmarth hai ..aapke vichoron se shakti mili aur acha laga ki koi hai jo apne star per ek diya jalaye baitha hai avshya hi eski lo se samaj mein andhera chatega ..aapko dhanyawad

kshama said...

बेहतरीन पोस्ट ! सभी के साथ सहमत हूँ ...शमा ने जैसे मेरे मुँह से शब्द ले लिए हों ...! इंसान ही इंसान को तकसीम करते हैं ...ईश्वर नही .'.धूलका फूल 'इस फ़िल्म का बादही समर्पक गीत याद आ रहा है..
" तू हिन्दू बनेगा ना मुसलमान बनेगा,
इंसान की औलाद है,इंसान बनेगा"

तथा

"कुदरत ने तो बक्शी हमें एकही धरती ,
हमने कहीं भारत कहीं ईरान बनाया"

SACCHAI said...

" sarthak mudda accha post ...aapki lekhani ko salam "

----- eksacchai { AAWAZ }

http://eksacchai.blogspot.com

http://hindimasti4u.blogspot.com

लता 'हया' said...

katha to ulat hai lekin sach hai.jo bhi ho lekin aapko ab tyohaaron ki badhai to swikarni hogi.
shrotaaon ke dil ki kafi samajh hai aapko ;aapne sahi kaha ,log agar pyaar karte hain ,daad dete hain to ye meri khushnasibi hai aur ishwar ki kripa hai. sahukria

क्रिएटिव मंच said...

चन्द्र मोहन जी !
आपको भी सभी त्योहारों की हार्दिक बधाई !
विचारोत्तेजक लेख के लिये आभार
सार्थक पोस्ट

Dr. Smt. ajit gupta said...

भ्रष्‍टाचार के लिए आमरण अनशन की खबर को आपने वरीयता दी है। कुछ कार्य सरकार द्वारा नियंत्रित किए जाते है और कुछ कार्य समाज द्वारा। भ्रष्‍टाचार समाज द्वारा नियन्त्रित होना चाहिए। आज प्रत्‍येक सम्‍प्रदाय के अपने समाज हैं उनके गुरु भी हैं। समाज को चलाने के लिए लोग चन्‍दा भी देते हैं लेकिन हम क्‍या उनसे पूछते हैं कि यह चन्‍दा आपने किस आय से दिया है? यदि समाज के गुरु अपने-अपने समाजों को नियन्त्रित करने लगेंगे तब सरकार में भी श्रेष्‍ठ व्‍यक्ति आएंगे और भ्रष्‍टाचार स्‍वत: ही समाप्‍त होगा। आज प्रत्‍येक समाज में केवल पैसे वाले लोग ही प्रतिष्ठित हैं, और सभी जानते हैं कि ये पैसा कैसे आता है और चन्‍दा कैसे दिया जाता है?

अनुपम अग्रवाल said...

बहुत ब्लोग हैं, बहुत है लेखन बहुत सी गज़लें

लेकिन किसी एक पर 53 टिप्पणी सज जाती हैं

संजय भास्कर said...

बेहतरीन पोस्ट ! सभी के साथ सहमत हूँ ...शमा ने जैसे मेरे मुँह से शब्द ले लिए हों ...! इंसान ही इंसान को तकसीम करते हैं ...ईश्वर नही |


बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

SANJAY KUMAR
HARYANA
http://sanjaybhaskar.blogspot.com