Wednesday 20 May 2009

श्रद्धा

श्रद्धा
(५४)
पाता सागर कैसे इतना जल
हिमशिखर यूँ अगर नहीं पिघलता
मेरुशिखर पर कैसे हिम जुटता
बन वाष्प समुद्र जल यदि न उड़ता
दे रही प्रकृति संदेश यथेष्ट
इक-दूजे के सब पूरक श्रेष्ठ
श्रद्धा - भावों में रमने वाला
वाद-विवाद में न कभी उलझता

Monday 11 May 2009

बुनियाद गज़ब शोरों पर है

बुनियाद गज़ब शोरों पर है

असहाय पड़ा इस भू पर
रह-रह चीखें गूँज रही हैं
सुनी,अनसुनी करती दुनिया
'ग्लैमरस' ही पूज रही है

बन उठा 'ग्लैमर' देव आज
चर्चा उसकी ही जोरों पर है
पल-पल बदले रूप दिखाए
बुनियाद गज़ब शोरों पर है

होकर मानव ग्लैमरमयी
बन जाता तन-मन से अँधा
धंधे वाले जान इसे ही
चरचों से चमकाते धंधा


बढ़ते शोरों में रम-रम कर
सुन रहा मानव कुछ ऊंचा है
अंधे-बहरे मानव का अब
बिखरा सम्बन्ध समूचा है

Monday 4 May 2009

श्रद्धा

श्रद्धा

(५३)

लुका- छिपी का है खेल निराला
बच्चों से बुड्ढों तक नें खेला
रहे बदलते पर मंतव्य सदा
निश्छल निःस्वार्थ हुआ मटमैला

भोले -से मन पर चढ़ स्वार्थ रंग
कर देता मन को विकृत - बदरंग

रंगनें पर 'श्रद्धा' के रंगों में
विकृत भावों का नहीं झमेला