Monday 2 October 2017

वस्तुतः पहुंचे हुए गुरुओं को योग्य शिष्य की जरुरत होती है
और
उन्हें योग्य शिष्य अक्सर नहीं मिलते
इसीलिए उनके पास शिष्यों के नाम पर जमवाड़ा नहीं लगता और वह अपना जीवन गुमनामी में ही गुजार देना बेहतर समझता है
प्रसिद्धि के भूखे, धनलोलुप और भोगविलास के अभिलाषी गुरुओं को कैसे भी उन शिष्यों की आवश्यकता होती है जो उनकी फीस/माँग निरंतर पूरी करते रहे

विद्यार्थियों को तो पढ़ाई बोझ महसूस होती है, पढाईकाल में-----सो उन्हें उन्ही गुरुओं की तलाश रहती है, जो उन्हें मौज-मस्ती करते रहने की इजाजत देता रहे
और परीक्षाकाल के लिए प्रश्नपत्र आउट करवाने में ज्यादा सहायक बने

सरकार ने भी ऐसे नियम बना रखे हैं कि
* नौकरी करने को यथायोग्य डिग्री/डिप्लोमा चाहिए ही, किन्तु नौकरी देनेवाले मालिक की योग्यता का कोई तय मापदंड नहीं
* नौकरी पाने के बाद किसी के ज्ञान का समय-समय पर परीक्षण करने की व्यवस्था ही नहीं, जिसे देखो दूसरे से पूछ-पूछ कर ता-जिंदगी काम करता पाया जाता है
*  हद तो तब हो जाती है, जब तथाकथित सक्षम सरकार ही अपने को जनता के जवाब देने में असमर्थ पाती है, तो जांच आयोग या किसी कमिटी का गठन कर देती है-----रिपोर्ट देने के लिए
अब आप सरकार को गुरु कहेगें या कुछ और----------
यह आप पर निर्भर नहीं है, मज़बूरी है उसे सरकार कहना ही पड़ेगा, जब तक सरकार है
सरकार विदेशी हो देशी, सरकार ही रहती है
सरकार के कार्य के ढर्रे में किसी को कोई अंतर प्रतीत होता है क्या
पहले विदेशी सरकार भारत का धन भारत से बाहर ले गयीं अब देशी सरकार के कार्यकाल में भी तो देश का धन विदेश जा ही रहा है काले धन के रूप में
तब भी प्लान्ड रूप से था अब भी पुरे प्लांड रूप से यह बाहर जाता है और देश का कानून उसे जाने से रोक ही नहीं पाता

फिर भी व्यवस्थाएं अपने-अपने ढंग से ही सही निरंतर चलती रहती है, गंगा मैली हो रही है तो होती रहे, उसे साफ़ करने की भी व्यवस्था का भी ताम-झाम तो खड़ा किया ही जा सकता है हल्ला मचने वालों का मुंह बंद करने के लिए

कभी-कभी सोचता हूँ कि परीक्षाकाल में जब प्रश्नपत्र सामने होता है
तो
जिन प्रश्नों का उत्तर पता होता है, उसे तो पलक झपकते ही हल लिख दिया जाता है, किन्तु कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं, जिनका उत्तर गहन मंथन कर मिलता है और कुछ प्रश्न ऐसे भी होते हैं, जिनका उत्तर किसी भी तरह नहीं मिलता, ऐसे हालात में कितना भी सिर खुजलाया जाय, दिमाग दौड़ाया जाए, हल नहीं मिलता है, समय जाय होता है, सो अलग

अब सोचिये
* सरकारी कामों में समय जाया क्यों होता है
* कुछ काम फटाफट, पलक झपकते क्यों हो जाते हैं
* कुछ काम लाख कोशिश करने के बाद भी क्यों नहीं होते

लालच / स्वार्थ / भाई-भतीजावाद/ बड़ी एसी युक्त गाडी/शानदार मकान-----जैसे ज्ञान अब ज्यादा अहम् हो गए हैं
* "स्वस्थ कैसे रहे", इससे इन्हें कोई सरोकार नहीं-----बहुत पैसा है इन लोगों के पास डाक्टरों को देते रहने के लिए
* "क्या खाया-पिया जाए और क्यों" , इससे इन्हें कोई सरोकार नहीं-----बहुत स्वाद लग गया है इन लोगों की जीभ को
* "अनुशासन" स्वयं के लिए क्या होना चाहिये पता नहीं और अक्सर क्रोधित होने वाले भुक्तभोगियों/ परेशान जनता को ये अनुशासन का पाठ पढ़ाते नजर आ जायेगें और ज्यादा मामला बढ़ने पर "सरकारी कामकाज में बाधा पहुँचाने" के आरोप लगा कर उन्हें गिरफ्तार करवाने से भी नहीं चूकते
* "परोपकार" कैसे किया जाए पता नहीं, किन्तु अपने पर कृपा दृष्टि के लिए सबकुछ करने को तैयार मिल सकते हैं ज्यादातर
* "ज्ञान" क्या है पता नहीं डिग्री दिखाते फिरते हैं और अपने बच्चों के  मनोनुकूल डिग्री की व्यवस्था किसी भी कीमत पर करने को अक्सर आमादा मिलते हैं
* समस्या का समाधान जब वर्तमान कानून के अन्तर्गत समझ नहीं आता तो एक और नया कानून बनाना इन्हें ज्यादा सुहाता है
-----पूज्य गंगा पहले भी बह रही थी, अभी भी बह रही है और अनंत काल तक बहती रहेगी पूज्य ही बन कर
------स्वयं सिद्ध माननीय व्यवस्थाएं पहले भी थी, आज भी है और आगे भी रहेगीं स्वयं सिद्ध माननीय ही बन कर
------जाहिल/मजबूर/बटी हुई  सी दिखती जनता पहले भी थी, आज भी है और आगे भी रहेगीं जाहिल/मजबूर सी दिखती हुई
समग्र रूप से कुछ भी न बदला था, न बदला है और न बदलेगा
कबीर/वाल्मीक/ एकलव्य/ गांधी/विवेकानंद/शास्त्री/कलाम अदि-आदि चुनिन्दा अपवाद थे, हैं और आगे भी रहेगें चुनिन्दा ही
गीता, कुरआन, बाइबिल, गुरुग्रंथ भी थे, है और रहेगी भी किन्तु नहीं मिलते इनके सही अर्थों में इनके अनुसरणकर्ता
समझ अपनी-अपनी, ज्ञान अपना-अपना
गुरु-शिष्य परम्परा को भी तार-तार होते हुए देखा था, देखा है और देखते रहेगें
"गुरु गुड़ और चेला शक्कर" ऐसे तो नहीं हो गए
तमाम गुणों युक्त भद्दे से दिखने वाले गुड़ के बाद सुन्दर-श्वेत शक्कर की भी उत्पत्ति भी तो आखिर की ही गयी है न बंधु
लेकिन ऐसा नहीं है कि गुड़ का अस्तित्व ही नहीं है अब, उसके गुण के जानकार आज भी है और आगे भी रहेगें

Friday 28 July 2017

"करम का लेख" विशेषण रहित है, अर्थात भेद-भाव से परे……………यह बहुतों को बुझाता नहीं और प्रमाण के लिए वैज्ञानिक तथ्य की गुहार करने लगता है और अन्ततः तभी बुझाती है जब ऊपर वाले की लाठी उस पर बरसती है अनायास और कह बैठता है....."हे भगवन, मैंने ऐसा क्या किया, जिसकी सजा मुझे दे रहे हो"................
खैर हर वह, जो  
समझे न समझे
पर गा भी देता है
"………………जैसा करम करेगा, वैसा फल देगा भगवान"
"जैसा" और "वैसा" भी भेद-भाव से परे वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित ध्वनि और प्रतिध्वनि सदृश्य ही तो हैं बस महसूस होने में बीच में कुछ "काल या कहें पल" का अंतर
'काल और पल" की गणना का भी अपना प्राचीनतम विज्ञान है, जिसे समझना और तदनुसार उद्घोषणा करना हर किसी के बूते की बात नहीं
फिर भी तमाम ज्योतिष शास्त्र विरोधी लोग भी अपने हर काम हेतु शुभ लग्न की तलाश में दिखते हैं और नारियल फोड़ने-फ़ुड़वाने से भी नहीं चूकते
गजब की सहमति असहमति वालों में भी अक्सर दिख ही जाती है हर शुभ समझे जाने वाले अवसर पर

Monday 17 July 2017

अयोध्या में रामलला का बहु प्रतीक्षित भव्य मंदिर कब बनेगा.....ये तो किसी को भी पता नही
किन्तु
भव्य रायसीना में
"राम"
२५ जुलाई को जरूर प्रतिस्थापित होंगे....
इस पर अब शायद ही किसी को संन्देह हो
......डरात्मा/फालोवरात्मा तो अंतरात्मा पर आसीन हो यही कह रही है
और
"मीरा" तमाम गुणवत्ता से लबरेज होने के बावजूद इतिहास ही दोहराती पायी जायेंगी.....
गुण के गाहक सहस नर......
शायद राजनीति में उपयुक्त नहीं बैठता है.....अक्सर

Sunday 16 July 2017

मुझे नहीं लगता कि
अपने देश में अब किसी भी विधा के जानकारों मसलन
* डाक्टर/नर्स
* इन्जीनियर
* CA/इकोनामिस्ट
* अध्यापक
* अधिकारी
* नेता
* साहित्यकार
* नाटककार
* कलाकार
* पत्रकार
* वकील
* धन्धेवाले
आदि की कोई कमी है, और उनके चलते इस देश मे समस्यायें तो अब कम ही होनी चाहिये, ऐसा माना जाना चाहिये
किन्तु निरंन्तर बढ़ती समस्यायों के चलते ऐसा महसूस होता है कि इन पढे-लिखे, समझदार और जिम्मेदार लोगों में से काफी लोग पथभ्रष्ट हो गये हैं, कारण
* स्वार्थ भी हो सकता है
* भ्रष्टाचार भी हो सकता है
* जल्दी ज्यादा पैसा कमाने की चाहत भी हो सकती है
* किसी का दबाव भी हो सकता है
* कोई मजबूरी भी हो सकती है
आदि-आदि
कारण चाहे कुछ भी हो, किन्तु कोई भी कारण इन्हें यदि पथभ्रष्ट कर देश में समस्याएं बढ़ा रहा है,
तो
ऐसे लोगों को सच्चा देशभक्त तो कदापि नहीं माना जा सकता है न

कबीरदास जी बहुत पहले ही बता गये हैं......
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोय
जो  देखा  मन आपनो, मुझसे  बुरा न कोय

Sunday 2 July 2017

GST

अगर आप उपभोक्ता हो
तो
GST के पचड़े में न पड़ो, तो स्वस्थ रहोगे
नोटबन्दी की तरह GST लागू हो चुका है, ये एक हकीकत है
अत: ज़रूरत ज्यादा यह है कि
* सामान खरीदते वक्त बस दुकान से पक्का बिल लेना मत भूलो अब
* अपना दिमाग GST के चलते बढ़े हुये सर्विस टैक्स से घर के बढ़े खर्च को कैसे ऐडजस्ट किया जाये, उस पर लगया जाये तो शायद घर और देश के लिये ज्यादा मुफीद होगा
.......बाकी आप तो ज्यादा समझदार हैं ही......
कि
GST का सारा
* हिसाब-किताब,
* नियम- कानून,
* इनपुट  क्रेडिट
उत्पादक/वितरक/दुकानदार के लिये ही है
ये उनका हेडेक है.......हमारा नहीं
मतलब
एक देश- एक टैक्स भले हो
पर
हम तो अनेक हैं एक देश में, अलग- अलग राज्यों में
मसलन
* नौकरी-पेशा वाले
* मजदुरी वाले
* खेती वाले
* गरीब/BPL
* BC/OBC/SC/ST/
* अल्पसंख्यक
* विभिन्न धर्म वाले
* विभिन्न जाति वाले
* उत्तर/दक्षिण/पूर्वी/पश्चिमी/मध्य भारतीय
* अति उच्च/उच्च/मिडिल/लोवर क्लास लोग
* उद्योग/दुकान वाले
* ठेले-खुमचे वाले
* दलाली वाले
* नेतागिरी वाले
* कोचिंग क्लासेस वाले
* ढ़ाबे/रेस्टोरेंट/ होटल वाले
* हास्पिटल वाले डाक्टर/नर्स और सपोर्टींगस्टाफ
* गृहणियां
* छात्र-छात्रायें
* सेना वाले
* देशभक्त और देश द्रोही
* पक्ष- विपक्ष
और भी न जाने क्या- क्या अनेकतायें विद्यमान कर दी गयी है हम सब में......ताकि लोकतंत्र में हम अर्थात जनता कभी भी श्रेष्ठ न हो सके और राजनीतिज्ञों की मनमानी लगातार चलती रहे.....
G reat
S trategic
T actics
अर्थात GST से हम सब नियंत्रित रहे हैं, हैं और होते भी  रहेगें, इसमे किसी को कोइ शक नहीं होना चाहिये
अपनी इच्छाओं की पूर्ति की अभिलाषा में निरन्तर दौड़ने वालों
चाहो, न चाहो,
पर
रुकना तो पड़ेगा ही
* स्वस्थ रहने पर सुकून भरे भोजन, बाल-बच्चों के प्यार और बिन्दास शयन के लिये....घर मे
* अस्वस्थ होने पर इलाज कराने और मेडीक्लेम भुनाने को......हास्पिटल में
* हलकी-फुलकी अस्वस्थता में आराम और प्यारी देखभाल के लिये.... घर पर
* अपने मातहत से समय से और सही काम करवाने को......अपने-अपने आफिस/दुकान/संस्थान में
अपनी इच्छाओं की पूर्ति की अभिलाषा में निरन्तर दौड़ने वालों
चाहो, न चाहो,
पर
रुकना तो पड़ेगा ही
* स्वस्थ रहने पर सुकून भरे भोजन, बाल-बच्चों के प्यार और बिन्दास शयन के लिये....घर मे
* अस्वस्थ होने पर इलाज कराने और मेडीक्लेम भुनाने को......हास्पिटल में
* हलकी-फुलकी अस्वस्थता में आराम और प्यारी देखभाल के लिये.... घर पर
* अपने मातहत से समय से और सही काम करवाने को......अपने-अपने आफिस/दुकान/संस्थान में