Monday 31 August 2009

आभारव्यक्ति और विज्ञापन

आभारव्यक्ति
ब्लाग जगत में अपनी प्रथम ग़ज़ल पोस्ट करते हुए मैं जितना सशंकित था और अन्दर ही अन्दर डर रहा था,उसके ठीक विपरीत जिस अपनेपन के भावों के साथ इतनी बड़ी संख्या में आकर आप क्षुधी और शुभचिंतक पाठक/पाठिकाओं नें चमकते सूर्य की मानिंद हौसला अफजाई की है,उससे टूटी-फूटी सी ग़ज़ल भी अन्धेरें में चाँद सरीखी प्रकाशमान सी लगने लगी है, भले ही दूज के चाँद की तरह ही सही.

इस पोस्ट में मैं अपनी पिछली पोस्ट के निम्न स्नेहिल टिपण्णीकारों (क्रम वही,जिस क्रम में टिपण्णी मिली).......
वन्दना अवस्थी दुबे जी, योगेन्द्र मौदगिल ji , अल्पना वर्मा जी, विक्रम जी, कैटरीना जी, सर्वत जी, रश्मि प्रभा जी, क्षमा जी, विनोद कुमार पांडेय जी, डॉ.टी.एस. दराल जी, संजीव गौतम जी, Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" जी, हरकीरत हकीर जी, ज्योति सिंह जी, शिवम् मिश्रा जी, क्रिएटिव मंच, गर्दूं-गाफिल जी, बबली जी, निर्मल कपिला जी, संध्या गुप्ता जी, भूतनाथ जी, योगेश स्वप्न जी, परमजीत बाली जी, श्याम सखा 'श्याम' जी, मुफलिस जी, रवि श्रीवास्तव जी, मुकेश कुमार तिवारी जी, डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी, महफूज़ अली जी, अनुपम अग्रवाल जी, गौरव जी, सुमन जी, प्रेम जी, शरद कोकास ji , मार्क राय जी, दिगम्बर नासवा जी एवं लता 'हया' जी
का विशेष आभारी हूँ कि आप सभी ने ह्रदय से मेरी हौसला अफजाई कर भविष्य में भी ग़ज़ल लिखने और पोस्ट करने लायक संबल प्रदान किया है।

मैं उन गुरुजन से टिप्पणीकारों का भी विशेष रूप से आभारी हूँ,जिन्होंने अलग से मेरे मेल ऐड्रेस पर सन्देश लिख मुझे और भी बेहतर ग़ज़ल लिखने मार्फ़त सुझाव/टिप्स दिए.

मैं अपने उन सह्रदय, परम आदरणीय टिप्पणीकारों का भी आभार व्यक्त करना चाहता हूँ, जो प्रायः मेरे ब्लाग पर आकर मुझे अपने आशीष वचनों से नवाजते हैं,किन्तु मेरी इस पोस्ट पर किसी न किसी खास काम में व्यस्तता के कारण टिपण्णी करने से चूक गए.
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ये तो रहीं बाते पिछली पोस्ट से सम्बंधित, जो मैनें आपकी टिप्पणियों में बहुत शिद्दत से महसूस की हैं। अब आज की पोस्ट के विषय में चर्चा करना चाहता हूँ, और हाँ , यह विषय और किसी पर नहीं बल्कि टी. वी. के विज्ञापनों पर है
********************************************************************************* आजकल "टाटा टी" का एक विज्ञापन बहुत जोर-शोर से दिखाया जा रहा है कि अपने हिंदुस्तान में छोटे लेवल पर (बड़े लेवल पर कैसे? नहीं दिखाया....) हर कहीं "रिश्वत" किस प्रकार खिलाई जा रही है, विज्ञापन के अंत में बड़ी संजीदगी से ये भी बताया जाता है कि आखिर लोग खाते क्यों हैं (ऐसा लगता है कि खाने वाले इतने बुरे भी नहीं हैं....)
कारण के रूप में उत्तर मिलता है "क्योंकि हम खिलाते हैं"साथ ही रिश्वत खाने वालों को टाटा टी की एक प्याली आफर करते हुए खिलाने वालों से गर्व से वादा लिया जाता है "अब हम खिलाएंगे नहीं, पिलायेंगे।" मतलब........................
खाने-खिलाने, पीने-पिलाने के किस्से आप लोगों ने भी खूब सुने ही होंगे,......... इसीलिए उसकी तह में मैं जाना नहीं चाहता, समझदारों को तो इशारा ही काफी होता है.......

इतनी भूमिका के जद्दोज़हद के बाद मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं कि आज की पोस्ट "विज्ञापन" विषय से हट कर और किसी पर हो ही नहीं सकती...........

सो, विज्ञापन से सम्बंधित कुछ दोहे मैं इस पोस्ट में पेश करने की जुर्रत कर रहा हूँ...........


लिखे-पढों का नियंत्रण

विज्ञापन में पुँछ रहे, "ठण्डा" मतलब बूझ
गली-गली शीतल पेय, "मटका" भया अबूझ

कहना हर विज्ञापन में, ब्रांड यही श्रेष्ठ
लिखे-पढों का नियंत्रण, रहा कहाँ यथेष्ठ

विज्ञापन में सदाचार, खोज सके तो खोज
काम,क्रोध,लोभ पोषित,मुफ्त मिले"पिल"रोज़

चिंताहरण रामबाण, "ठण्डा-ठण्डा कूल
"चेहरे पर ले झुर्रियां, बेचन में मशगूल

कर"मुफ्त-मुफ्त" का शोर,लोगन लिया बुलाय
एकै में सब साध लिया, मुफ्त चार पकडाए

कह-कह "ब्रांडेड" माल, लूटा कितना यार
आज वही बेचन लगे, एक संग क्यों चार

रखे विज्ञापन- प्रीति जो, धोखा हरदम खाय
बन ग्राहक इक जागरूक, ठोंक-बजाकर लाय

Monday 24 August 2009

शर्मों-हया चलता नहीं

बहुत दिनों से तमन्ना थी कि और लोगों की तरह यदि कोई मुकम्मल ग़ज़ल न भी लिख सकूं, तो कम से कम एक टूटी-फूटी ग़ज़ल तो लिखने का प्रयास करुँ।
बहुत कोशिशें की, देखने, सुनने, पढने की, पर जब भी लिखने बैठा तो कभी मतले ने अटका दिया तो कभी बहर ने। जितनी सावधानी बरतो, मूल भाव पर से ध्यान हट जाता। मुकम्मल ग़ज़ल की कौन कहे, टूटी - फूटी ग़ज़ल भी मुकम्मल न हो पाती। बहुत पन्ने फाड़े, बहुत वक्त जाया किया, इस हूनर को पकड़ने का, पर ज्यादातर प्रयासों में मुहकी ही खानी पड़ी.
खैर..... ऊपर वाले की मेहरबानी से एक टूटी-फूटी सी ग़ज़ल लिखने में अपनी निगाह में ( "निज कवित्त केहि लागि न नीका" इस्टाइल में) कामयाब तो हो गया, और इसे अपने ब्लॉग पर (क्योंकि और कोई तो इसे स्थान देगा नहीं) ठेलने की कोशिश कर रहा हूँ, कृपया इसे झेलने का कष्ट कर अनुग्रहित करें...

शर्मों-हया चलता नहीं

इंसानियत का अब कहीं एतबार भी दिखता नहीं
मासूमियत भी तो दिखे, हालात यूँ बनता नहीं

दावें करें वे चाह कर कितना यहाँ आकर अभी
विश्वास तो खंडित यहाँ, मंडित अभी लगता नहीं

दौलत मिले ये बात ही तो अब ज़हन में मचलती
"कितना गिरे" अहसास तो अब कहीं जगता नहीं

इतना बढा कर पाँव को, चादर किया छोटा जभी
टूटी सभी वे हसरतें, परिवार भी पलता नहीं

सारे ज़तन वे कर चुके, दीवानगी हारी नहीं
पाकर ज़रा सा साथ भी, ये रास्ता थमता नहीं

दौलत हुई पहचान अब, इसका 'मुमुक्षु' को भास है
नव-पीढियाँ सिखला रही, 'शर्मों-हया' चलता नहीं

Friday 14 August 2009

श्रद्धा

आज जन्माष्टमी का पावन पर्व है, एक बार फिर से आज रात बारह बजे कान्हा का जन्म-दिन मनाया जायेगा, पर केक काट कर नहीं, श्रद्धा से उपवास रख कर, पर पूर्ण हर्षोल्लास के साथ।
नहीं समझ पाता कि हमारी यह संस्कारित संस्कृति उस वक्त कहाँ गुम हो जाती है जब हम अपना या अपने बच्चों का जन्म-दिन बिना उपवास रखे, केक काटकर, गिफ्ट लेकर और रिटर्न गिफ्ट देकर मनाते हैं, कहीं यह आज के युग का लेन-देन का व्यापार तो नहीं ?

और तो और आज ही अर्थात १४ अगस्त की रात बारह बजे ही स्वतंत्र भारत का भी जन्म-दिन है। रात बीतते ही गुलामी की जंजीरों से बासठ वर्ष पूर्व मुक्त हुए भारत का तिरसठवाँ जन्म-दिन मनाने की तैयारियों में भी पूरा भारत हर्सोल्लास से भरा दिखाई देगा।

प्रधानमंत्री जी लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहरा कर और एक और ऐतिहासिक भाषण देकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेंगें। पर महंगाई की भयंकर मार झेल रही जनता की "मनोव्यथा-दर" और आर्थिक जगत की ऋणात्मक "महंगाई दर" की गुत्थी पर शायद ही कोई कार्य-योजना दिखाई दे।

आज न कहीं गाँधी के सपनों का भारत दिखता है, न सुभाष के। अगर आजाद और भगत सिंह की बात करें तो उनका त्याग, विश्वास और बलिदान सब व्यर्थ सा लगता है। नहीं समझ में आता कि आज़ादी बाद समस्यायें कम हुई हैं. गौर से विश्लेषण करें तो समस्याएं बढ़ी हुई ही दिखेंगी.

गुलाम भारत के आज़ादी के दीवाने प्रेम के परवानों की तरह ही बेखौफ थे। सिर पर कफ़न बांध कर देश के लिए काम करते थे, पर आज स्वतंत्र भारत के कर्ता-धर्ता अपनी ही सुरक्षा के प्रति कुछ ज्यादा ही सचेत दिखते हैं। देश के लिए कुर्बान होने का ज़ज्बा कहीं दिखता ही नहीं.

स्वतंत्रता के बासठ वर्षों बाद तत्कालीन स्वतंत्रता सेनानियों की तीसरी पीढी के लिए स्वतंत्र भारत के आदर्शों के रूप में खिलाडी, कलाकारों के आलावा और कोई सामने दिखता ही नहीं. नेता नाम तो गाली जैसा महसूस करने लायक सा हो गया सा लगता है. कब समझेंगे हम श्रद्धामयी उन जोशीली, गरिमायी, भावुक पंक्तियों का अर्थ........... "माँ मोरा रंग दे बसंती चोला" ................

खैर जब बात श्रद्धा पर पहुँच ही गयी तो जन्माष्टमी के इस शुभ अवसर पर श्रद्धा की अठावनवीं कड़ी आप सभी को समर्पित है ........................

श्रद्धा
(५८)
पैसों के दीवनों ने देखो अब तक
ढायीं कितनी बूझ-अबूझ विपदाएं
सब्ज-बाग खुशहाली का दिखला
धंदे अपने ही तो नित चमकाएं

आजादी या प्रेम दीवानों ने तो बस
दूजो के सुख हेतु सहे दुःख बरबस

मीरा, राधा, आजाद भगत ही तो
मिसाल-ए-श्रद्धा बन हरदम भाए
स्वतंत्रता-दिवस की भी हार्दिक शुभकामनाएं............

Saturday 1 August 2009

श्रद्धा

आप लोगों के लगातार मिल रहे उत्तरोत्तर स्वास्थ्य-लाभ के शुभकामनाओं सन्देश का ही यह प्रतिफल है कि मेरे हाथ की पट्टियाँ कल खोल दी गई, और यह बताया गया की अगले दस-एक दिन में हाथ लगभग ९८% ठीक हो जायेगा. घाव तो लगभग भर गए हैं, किन्तु नए चर्म कि कोमलता अभी कुछ और समय चाहेगी विशेष सावधानी का. दवाओं से सराबोर हाथ कुछ विशेष करने ही नहीं देता...............
आषाढ़ बीत चुका, सावन भी जाने को आ रहा है, पर देश के अधिकांश हिस्सों में "प्रकृति" का बारिश के रूप में प्रकट न होना कहीं उसके रुष्ट होने का संकेत तो नहीं..........

इन्ही भावों से प्रेरित हो कर श्रद्धा की अगली कड़ी प्रभु के आशीर्वाद से कुछ ये रूप ले पाई है................

श्रद्धा
(५७)
गदराए मेघों नें कर शंखनाद
तांडव बिजली का भी दिखलाया
पवन - वेग के झोकों ने देखो
पल में कैसे इनको छितराया
"कितने बदल गए इन इंसानों" को
दिखला रही प्रकृति चंद नमूनों को

"श्रद्धा-भक्तों" ने,लेकिन परहित का
"जन-हित"ही में परचम लहराया