Sunday, 6 April, 2008

श्रद्धा

श्रद्धा

(३५)

गहन विचारों में है जाता कौंन

सतही बातें ही होती रहती है

गैरों के दर्दों को है किसने समझा

अपनी तो जान निकलती रहती है

थोड़े पल को तो करो मुक्त, खो

जाने को, गैरों के अहसासों में

श्रद्धा स्वयं अवतरित होगी मन में

'मानवता' नहीं अनजानी रहती है

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