Sunday 16 March 2008

श्रद्धा

श्रद्धा


(१३)



अपना कर मानव - मन इच्छाएं

अमृत-मय जीवन में विष भरता है

"हो पूरित कैसे इच्छाएं ज़ल्दी से"

ये चिंता - अंकुर नित और उभरता


हो मृग-त्रष्नी भटक - भटक कर

व्यर्थ ही है यूँ क्यों रहता मरता


संतोष - श्रद्धा में यदि तू रमता
तो, तेरा यह जीवन बहुत संवरता

No comments: