Tuesday 18 March 2008

श्रद्धा

श्रद्धा
(२०)
हुए हादसे , उबले जन - आक्रोश
लाचार - प्रशासन के उड़े होश
रुके हिंषा-प्रतिहिंषा कैसे, हम जो
देते रहे एक - दूजे को ही दोष
भड़कीले वक्तव्यों ने जोश जगाये
जाति-धर्म में क्यों संतोष समाये
अरे अपनाओ मानवता श्रद्धा से
शान्ति - दूत सद्रश्य हरे सब रोष

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