Sunday, 18 October 2009
आभारव्यक्ति एवं शुभकामनाएं
Monday, 12 October 2009
निंदिया का न आना, विद्रोह और अंत में अभारव्यक्ति
निंदिया का न आना
अपनी ५ अक्टूबर की पिछली पोस्ट मैंने एक प्रश्नवाचक अधूरा चुटकला लिखा था और उसे पूरा करने के लिए अनुरोध आप सभी से किया था. बहुत से लोगों ने मसलन हरकीरत जी, वंदना अवस्थी दुबे जी, समीर (उड़न तश्तरी) जी, अल्पना जी आदि ने चुटकले अनुरूप उचित उत्तर दिया. अतः पूर्ण चुटकला कुछ इस प्रकार है........
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पहले का प्रश्न: यार कमरे में सभी खिड़की, दरवाजे और रोशनदान वगैरह अच्छी तरह बंद कर एसी चालू रख निंदिया के बिस्तर में आने की प्रतीक्षा की, फिर भी ससुरी निंदिया आई ही नहीं, आखिर क्यों.....?
"दूसरे" का उत्तर: जब आने के सब रास्ते बंद कर रखा है तो ससुरी निंदिया आएगी किस रास्ते से भाई.........
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उपरोक्त चुटकला सुनकर हम हंस भले लें पर क्या कभी गहराई से सोंचा है कि
* ज्यादातर वे लोग जो खुले गगन के तले सोने वाले हैं,
* मेहनत मशक्कत कर जीने वाले जहा पड़ गए वहीँ पर,
* रिक्शे वालों को रिक्शे पर कैसे भी पड़े-पड़े,
* दारू पीकर गटर में या सड़क पर पड़े- पड़े भी
* पढ़ने की इच्छा न होने पर क्लास में बैठे- बैठे ,आदि-आदि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी
निश्चिंत, बढ़िया और ताजगी भरी नींद कैसे पा लेते हैं. वहीँ दूसरी ओर मुलायम गद्दे पर भी, एसी के वातावरण में भी, बिस्तर पर लेट कर कोशिश करने पर भी, नींद की गोलियों के आदियों को नींद की गोलियां एक-आध कम खाने पर भी नींद क्यों नहीं आती?
इस पर ही नहीं बल्कि कबीर ने तो और भी बहुत कुछ समेटते हुए अपने काफी विस्तृत सपाट उदगार दोहे के रूप में सिर्फ २८ मात्राओं में ही कुछ इस प्रकार व्यक्त कर दिया हैं .....
कामी लज्जा न करै , मन माही अहलाद
नींद न माँगें साथरा, भूँख न माँगें स्वाद.
कबीर जी ने तो नींद से ज्यादा प्यार करने वालों और सपने लेकर सोने वालों को भी नहीं छोडा और बस कह ही दिया.....
जागो लोगों मत सुवो, ना करू नींद से प्यार
जैसा सपना रैन का , ऐसा यह संसार
सपने सोया मानवा , खोलि जो देखै नैन
जिव परा बहु लूट में, ना कछु लेन न देन
और तो और कबीर जी निश्चिंत सोने वालों के लिए भी कह गए....,,,
कबीर गाफिल क्यों फिरे, क्या सोता घनघोर
तेरे सिराने जम खडा , ज्यूँ अंधियारे चोर
मैं कबीर की तुलना में एक तिनका भी ज्ञानी तो नहीं पर मानवीय फितरत से बाज़ नहीं आता सो अपनी राय तो देनी ही पड़ेगी.....
मेरे हिसाब से कुल मिला कर इसका सम्बन्ध शरीर की मानसिक और शारीरिक शिथिलता से है. माहौल और मानसिक स्थिति जितनी जल्दी शरीर में शिथिलता ले आती है, विपरीत परिस्थितियों (बिना आरामदायक परिस्थितियों) में भी नींद कहीं बेहतर आती है......
* तभी तो सड़क पर सो रहे लोग बेखबर ही रह जाते हैं और गाडियां उनकर ऊपर से निकल जाती हैं, बाद में पत्रकार टी. वी. वाले समाचार को कैसा भी सनसनीखेज बनाते रहे.
* रेल गाड़ी के जनरल डिब्बे में भूसे की तरह भरे होने पर भी लोग-बाग़ मस्त नींद निकाल ही लेते हैं, वहीँ रिजर्वेशन वाले सारी रात करवटें ही बदलते रहते हैं.
कुछ ऐसी ही सार्थक युक्ति मनोज भारती जी ने अपने उत्तर में कुछ इस प्रकार दी है....
"यूं तो आपने निंदिया लाने के सारे बाह्य उपाय किए हैं, पर निंदिया रानी को लाने के लिए बाहर के उपायों से ज्यादा अंदर के उपायों की जरुरत होती है ; कोशिश से वह कभी नहीं आती !!! सब कोशिश छोड़ दीजिए और निश्चेष्ट होकर लेट जाइए और स्थिति को स्वीकार कर लीजिए"
नींद एक प्राकृतिक प्रक्रिया है और प्राकृतिक रूप से ही इसे पुनर्शक्ति के लिए प्राप्त किया जा सकता है.
एक अच्छी नींद शरीर में पौ फटते ही शरीर में असीम शक्ति का संचार कर देती है. फिर से दिन भर की सकून भरी मशक्कत, दौड़-भाग के लिए..
प्रकृति के सभी प्राणी स्वाभाविक नींद प्राप्त करते हैं, फिर प्रकृति के सर्वश्रेष्ठ कहे जाने वाले प्राणी को स्वाभाविक नींद पाने के लिय इतनी जद्दोज़हद क्यों, कहीं न कहीं उसने गलती की है, प्रकृति को नकारा है, तभी तो...... बेचारा कैसे भी कर्मों से असीम धन- दौलत पाकर भी परेशान है इक सकून भरी नींद पाने को......
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एक छोटी रचना
विद्रोह
होती नहीं मार की पीडा
बात की धार से गहरी
गूंज उठे क्यूँ न गगन में
"विद्रोह" की स्वर-लहरी.
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और अंत में ......
* पहला समाचार
"ओबामा" को "नोबेल शांति पुरुस्कार"
* दूसरा समाचार
"ओबामा" ने खुद को "नोबेल शांति पुरुस्कार" से नवाजे जाने पर हैरत जताई.
* तीसरा समाचार
नोबेल समित की सफाई " ओबामा जैसी शख्शियत वाले बहुत लम लोग होते हैं, जो दुनिया का ध्यान अपनी और आकृष्ट कर के लोगों में सुखद भविष्य की आस जागते हैं"
* चौथा समाचार
चाँद पर अमेरिका का रॉकेट से धमाका
* पांचवा समाचार
अभी तो चाँद पर बस्ती बसनी भी शुरू नहीं हुई और नोबेल शांति पुरुस्कार से नवाजे गए बराक ओबामा की अगुवाई में अमेरिका का चाँद पर भी शांति के नाम पर अभियान शुरू भी हो गया.
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आभारव्यक्ति
मेरी ५ अक्टूबर की पोस्ट पर प्राप्त आप सब की बहुमूल्यवान, सारगर्भित, प्रेणादायक, हौसलाअफजाई परक या आलोचनात्मक टिप्पणियों पर मैं अपनी आभारव्यक्ति अपनी ११ अक्तूबर की पोस्ट "अभारव्यक्ति" में ही सादर व्यक्त कर चुका हूँ. आपसे विनम्र निवेदन है कि आभारव्यक्ति को पूर्णतः (डिटेल) में देखने के लिए मेरी ११ अक्तूबर की पिछली पोस्ट देखे.
हार्दिक आभार।
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Sunday, 11 October 2009
आभारव्यक्ति
Monday, 5 October 2009
दिल की पाती.... , "विद्रोही", अंत में, आभारव्यक्ति
हे मेरे आवरण रूपी शरीर, मैं तेरे ही अन्दर बैठा तेरे हर कृत्यों का सहज अनुभव अनवरत आत्मसात करता रहता हूँ, मुझसे तेरा जाने- अनजाने किया कुछ भी नहीं छिपा है. तेरे दिखाने के और खाने के दाँतों से भलीभांति परिचित हूँ. तेरे हास्य में रुदन और रुदन में हास्य को भी भली भांति पढ़ लेता हूँ. मैं छोटा-सा ज़रूर हूँ, पर तेरे इस शरीर के लिए बहुत ज़रूरी हूँ. मेरे से ही तू और तेरा अहम् है, मैं नहीं तो कुछ भी नहीं....
तू आज इतना पढ़ लिख कर भी जितना कष्ट मुझे दे रहा है, उतना तो गुज़रे ज़माने के तुम्हारे अनपढ़ से पुरखों ने भी मुझे न दिया. बहुत तरक्की कर ली तूने, चाँद में भी पानी खोज लिया, पर तूने अपने उस पानी का क्या किया जिसके लिए रहीम ने कुछ यूँ कहा था........
रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून
तू तरक्की करता हुआ खुद को दिखाता है, प्रचारित करता है, अपने पैसे के दम से खुद को शक्तिशाली और वैभवशाली दिखाता है, पर क्या तू जानता है कि तेरा कोई इन्सान कुछ बिगाड़ पाए या न पाए पर तेरी
* तथाकथित उन्नत हरकते,
* तेरे तथाकथित उन्नत रहन-सहन,
* तेरी तथाकथित उन्नत सोंच
तेरे अन्दर बसे इस महत्वपूर्ण छोटे से, मासूम से, नाज़ुक से, प्यारे से, दिल पर क्या कहर ढा रहीं हैं.....
क्या तू जानता है कि लोग तो पहले दिल दिया करते थे, लेने की अभिलाषा तो थी ही नहीं, पर जैसे-जैसे तेरे विकास कि यात्रा प्रारंभ होती गयी, उम्रदराज लोगों के दिल पर "अटैक" (हार्ट अटैक) होने लगे, प्रगति और बढ़ी इसने अपने असर युवाओं पर भी दिखाने शुरू कर दिए, प्रगति और बढती गयी, अब छोटे बच्चे भी इसके कहर से अछूते नहीं रहे, उनकी इस बीमारी को शायद आपके डाक्टर मित्र लोग "रयुमेटिक हार्ट डिजीज" कहते हैं.
तूने परेशान व्यथित हो पैसे के दम पर अपने डाक्टर मित्रों से इस कमज़ोर होती मेरी काया के बारे में जानने का यत्न किया तो उन्हों ने भी जैसा किताबों में पढ़ा, समझा, वैसे कारण बता दिए। यथा... १. स्पीडी लाइफ में अक्सर कालेस्ट्राल युक्त भोजन का सेवन करना,
में उपरोक्त "पाती" बहुत संकोच से लिख रहा हूँ, क्योंकि जानता हूँ कि तुम्हारा अहम् इसे स्वीकार न करेगा, क्योंकि
* तुम्हें डाक्टर की फीस चुकाना मंजूर है,
* मंहगी दवाएं खाना मंजूर है,
* बाई पास सर्जरी कारवां मंज़ूर है
* अपना स्टैण्डर्ड दिखाना पसंद है
पर हरक़त से बाज़ आना मंजूर नहीं......"जियो और जीने दो", "पसीने की कमाई का मोल", कब आखिर कब समझ में आएगा?
अंततः मैं तो यही कहूँगा कि समझ-समझ के भी जो न समझे............... और वो मुझे दिन- दूनी रात चौगनी गति से कमज़ोर और असहाय होता ही पायेगा...........थोडा लिखा, बहुत समझना.........
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"विद्रोही"
दिए गयें हैं विद्रोही को
आज के लिए एक प्रश्नवाचक अधूरा चुटकला जो पूरा तब बनेगा जब अगले अंक में उसका उत्तर आएगा, तब तक आप इसे पढ़ कर अपने उत्तर से अवगत कराएं, हो सकता है आपका उत्तर ही चुटकले में उत्तर के रूप में हो....
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पहले का प्रश्न: यार कमरे में सभी खिड़की, दरवाजे और रोशनदान वगैरह अच्छी तरह बंद कर एसी चालू रख निंदिया के बिस्तर में आने की प्रतीक्षा की, फिर भी ससुरी निंदिया आई ही नहीं, आखिर क्यों.....?
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अभी तो आपका उत्तर..................प्रतीक्षित है.
"दूसरे" का उत्तर अगली पोस्ट में.......
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आभारव्यक्ति
आपसे विनम्र निवेदन है कि आभारव्यक्ति को पूर्णतः (डिटेल) में देखने के लिए मेरी ४ अक्तूबर की पिछली पोस्ट भी ज़रूर देखे.
हार्दिक आभार।
Sunday, 4 October 2009
आभारव्यक्ति
पिछली कई पोस्ट पर हमारे कुछ सम्माननीय समालोचक हमसे विनम्र निवेदन करते आ रहे हैं कि ब्लॉग पोस्ट में टिप्पणी देने वालों के प्रति आभारव्यक्ति न करें।
तार्किक विवादों का मैं घुर विरोधी रहा हूँ. सत्य को, संस्कारों को अपने तर्कों द्वारा ढहाना मुझे कभी पसंद न रहा, पर चूँकि ब्लाग मैं अपनी पसंद का उतना महत्त्व नहीं अतः विचार कर मैनें यह निर्णय लिया कि अब से अपनी नयी पोस्ट के साथ पिछली पोस्ट में समालोचकों के प्रति आभारव्यक्ति का प्रचलन तो कम से कम बंद ही कर दूँ......
लेकिन, जैसा कि मैंने ऊपर कहा है, इस परंपरा का निर्वहन भी करना चाहता हूँ, अतः अब से मैं पोस्ट प्रकाशित करने से पूर्व पहले की पोस्ट में समालोचकों की आभारव्यक्ति के लिए एक और पोस्ट "आभारव्यक्ति" के नाम से प्रकाशित करूंगा. आप सब से विनम्र अनुरोध है की इस "आभारव्यक्ति" पोस्ट पर किसी भी प्रकार की टिपण्णी न दें, क्योंकि यह विशुद्ध सम्मानित आभारव्यक्ति के लिए है और मैं अपनी इस सांस्कारिक परंपरा का निर्वहन स्वान्तः सुखाय करना ही चाहता हूँ...........
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आभारव्यक्ति
बबली जी, संजीव गौतम जी, शरद कोकास जी, "क्षमा" जी, संजीव तिवारी जी, डा. टी एस दराल जी, राज भाटिय़ा जी, हिमांशु पाण्डेय जी, मनोज भारती जी, सर्वत एम. ज़माल जी, शमा जी, रंजना [रंजू भाटिया] जी, हेम पाण्डेय जी, ब्रज मोहन श्रीवास्तव जी, "सच्चाई" जी, लता 'हया' जी, विनोद कुमार पांडेय जी, रश्मि प्रभा जी, ज्योति सिंह जी, निर्मला कपिला जी, मुकेश कुमार तिवारी जी, प्रेम फरुख्खाबादी जी, अभिषेक ओझा जी, चंदन कुमार झा जी, Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" जी, शोभना चौरे जी, अमिताभ (अमिताभ श्रीवास्तव) जी, सुलभ सतरंगी जी, डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी, मुरारी पारीक जी, दिगम्बर नासवा जी, अपूर्व जी, Mrs आशा जोगलेकर जी, सुमन जी, दर्पण साह "दर्शन"जी, महफूज़ अली जी, रंजना (रंजना राठौर) जी, संध्या जी, पी.सी. गोदियाल जी, समीर लाल (उड़न तश्तरी)जी, देवेन्द्र जी, संजय व्यास जी, हर्ष जी, singhsdm ji, गिरिजेश राव जी, वंदना अवस्थी दुबे जी, प्रेम जी, योगेश स्वप्न जी, मार्क राय एवं अनुपम अगरवाल जी का विशेष रूप से हार्दिक आभारी हूँ कि आप सभी ने पहले की ही तरह स्नेह बनाये रखते हुए २८ सितम्बर की मेरी पोस्ट पर भी ह्रदय से मेरी हौसला अफजाई कर भविष्य में भी इसी तरह कुछ न कुछ लिखते रहने और पोस्ट करने लायक संबल प्रदान किया है और आशा है कि भविष्य में भी कुछ यूँ ही अपना-अपना स्नेहिल मार्गदर्शन मेरे ब्लाग पर आकर मुझे अनवरत प्रदान करते रहेंगें....
मैं उन गुरुजन से टिप्पणीकारों का भी विशेष आभारी हूँ, जिन्होंने अलग से मेरे मेल ऐड्रेस पर सन्देश लिख मुझे और भी बेहतर लिखने मार्फ़त सुझाव/ टिप्स दिए.
और अंत मे, मैं अपने उन सह्रदय, परम आदरणीय टिप्पणीकारों का भी आभार व्यक्त करना चाहता हूँ, जो प्रायः मेरे ब्लाग पर आकर मुझे अपने आशीष वचनों से नवाजते ज़रूर हैं, किन्तु मेरी पिछली पोस्ट पर किसी न किसी खास काम में व्यस्तता के कारण टीका-टिपण्णी करने से चूक गए।
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विनम्र अनुरोध
आप सब से विनम्र अनुरोध है कि कृपया इस "पोस्ट" पर टिपण्णी न करे, यह विशुद्ध रूप से सिर्फ और सिर्फ अपने सभी स्नेहिल टिप्पणीकारों के प्रति सम्मानपूर्वक आभारव्यक्ति के लिए है. इस पोस्ट से सम्बंधित किसी भी तरह की टिपण्णी आप मेरी अगली पोस्ट में कर सकते हैं. आशा है आप सभी अपना पूर्वत स्नेह बनाये रखेंगें..........
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Monday, 28 September 2009
कैसी संतुष्टि कैसा जुनून, महक उठे सारा वतन और आभारव्यक्ति
दैनिक नवज्योति के २४ सितम्बर के अंक में एक समाचार या कहें अजीबोगरीब खबर ने मुझे उसे आप सब के समक्ष अपने मनोभाव के साथ लाने को क्यों मजबूर कर दिया,इसे आप स्वयं पढ़ कर ही बेहतर समझ सकते हैं.......
जोधपुर से कोई ३५ किलोमीटर दूर एक रेलवे स्टेशन है "लूणी".इस स्टेशन के प्लेटफोर्म पर एक वेंडिग ट्राली नंबर २५ है। "इसका" या सम्मान से कहें कि "इसके" वेंडर ५३ वर्षीय माननीय अशोक कुमार भाटी जी है, जो अपनी ट्राली पर नौकर न रख कर सारा काम, मसलन माल बनाने से लेकर बेचने तक, खुद ही करते हैं. जवानी के दिनों में बी. काम. करने के बाद बैंक में डिस्पैच विभाग में नौकरी मिली पर काम पसंद न आने पर कुछ ही दिनों में उसे छोड़ कर पैत्रक व्यवसाय "वेंडिंग" को ही अपना लिया।
इन भाटी जी को अपना धंदा करते हुए भी पढाई करने का जूनून इस हद तक है कि अब तक वे नौ डिग्रियां हासिल कर चुके हैं. ये डिग्रिया हैं...... बी.काम., एम.काम., एम.ए., एल.एल.बी., डिप्लोमा इन लेबर ला एंड प्रेक्टिस, डिप्लोमा इन टैक्शेसन एंड प्रेक्टिस, डिप्लोमा इन टूरिज्म एंड होटल मैनेजमेंट, बैचलर ऑफ़ जर्नलिस्म एंड मास कम्नुकेशन(गोल्ड मैडल), पोस्ट ग्रेजूएट डिप्लोमा इन ह्युमन रिसोर्स मनेजमेंट और अभी भी जूनून बदस्तूर जारी है और अब भी महाशय पी. एच. डी कर रहे हैं।
आपको जानकर प्रसन्नता होगी कि इतनी डिग्रियां हासिल करने के कारण "लिम्का बुक अफ रिकार्ड के राष्ट्रीय पुरस्कार २००९" में भी इनका नाम दर्ज हो चुका है.
तो अब आप ऐसी किसी ग़लतफ़हमी में न रहे, एक मामूली सा काम करने वाला भी इतना पढ़ा-लिखा हो सकता है, ये ज़रूर ध्यान रखें.
भाटी जी का कहना है कि कोई भी काम छोटा नहीं होता और वे दृढ निश्चय के साथ कहते हैं कि उनका डिग्री प्राप्त करने का अभियान तब तक जारी रहेगा, जब तक उन्हें सफलता मिलती रहेगी. वे इसे सतत चलने वाली प्रक्रिया मानते हैं..........
तो कैसी रही भाटी जी की "अपने धन्दे से संतुष्टता और डिग्री पाते रहने की अभिलाषा?" भाटी जी अपने इस गुण के कारण "भारतीय रेल के गौरव" तो ज़रूर हैं पर उन्हें एक ही मलाल है कि भारतीय रेलवे ने कभी भी उनकी इस प्रतिभा का सम्मान करने कि ज़हमत नहीं उठाई...... यदि भाई "ज्ञानदत्त" जी भारतीय रेल में होने के कारण इस दिशा में कुछ कर सके, तो एक पुण्य के भागीदार होंगे...............
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महक उठे सारा वतन
मरा-मरा कह भी "राम-मयी" अब हर कोना ही है
तजी न लालच धनवान दीवाने से परवानों ने
सहज-सुलभ को भूल जिया असहज जीवन जिसने
गिरे कर्मों का व्यापार दिला दौलत तो जाता है
लुटा दिया सारा चमन "मुमुक्षु" इतना दिलदार अभी
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आभारव्यक्ति
मेरी पिछली पोस्ट (२१ सितम्बर,२००९) पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले निम्न सभी सम्मानीय क्षुदी और शुभचिन्तक पाठक/ पाठिकाओं... या कहें कि स्नेहिल टिप्पणीकारों (क्रम वही, जिस क्रम में टिपण्णी/ प्रतिक्रिया/ आलोचना प्राप्त हुई)....
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Monday, 21 September 2009
दुर्गा पूजा, ईद, दशहरा, आमरण अनशन, इंसानों कि उलट कथा, मितव्ययिता और आभारव्यक्ति
दुर्गा पूजा, ईद, दशहरा
कितना अज़ब संयोग है, प्रकृति का इसे अप्रतिम वरदान भी कह सकते हैं कि विभिन्न धर्म सम्प्रदायों को अपने-अपने सर्वप्रिय त्यौहार एक साथ मिलजुल कर मनाने का सुखद और भावभीना अवसर प्राप्त हुआ. सभी के लिए ये त्यौहार ख़ुशी के त्यौहार हैं, बरसात तो कम हुई पर त्योहारों की बारिश देख हर कोई प्रफ्फुल्लित है. रात-दिन सभी तरफ रौनक और खुशहाली का आलम ही भयंकर महंगाई के बावजूद भी दृष्टिगत ही हो रहा है.
"रब" से हमारी करबद्ध प्रार्थना है कि ऐसी सार्वधर्मिक अप्रतिम खुशियों को किसी की भी बुरी नज़र न लगे और सब मिलजुल कर इसे बेहतर ढंग से निर्भीक हो कर पूर्ण आनंद और ख़ुशी से मना सकें. आशा ही नहीं वरन विश्वास भी है की यदि रब ने संयोग बनाया है तो ईमानदार प्रार्थना/इबादत भी सुनेगें ही.........
आप सभी को दुर्गा पूजा, ईद, दशहरा की हार्दिक शुभकामनाएं.
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आमरण अनशन
असीम दुःख कि अनुभूति इसलिए कि सरकार जो स्वयं में सक्षम है,इतनी बड़ी छूत की इस बीमारी (भ्रष्टाचार) के विरुद्ध आज तक कोई भी ठोस कार्यवाही को सच्चे अर्थों में अंजाम न दे सकी और यह बीमारी दिन दुनी रात चौगुनी बढती ही गई...... एक ९१ वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी को आमरण अनशन का संकल्प इसलिए लेना पड़ा कि
यदि हम और कुछ न कर सकें तो कम से कम इतनी प्रार्थना तो कर ही सकते हैं कि ईश्वर मानसिक रूप से स्वस्थ, चुस्त, दुरुस्त इस ९१ वर्षीय स्वाधीनता सेनानी की पवित्र रगों में इतनी शक्ति प्रदान करे कि आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे भ्रष्टाचारियों को उनके वास्तविक मुकाम तक पहुँचा सकने के लिए सरकार को मजबूर करने में सक्षम हो सकें.
दुःख का विषय है कि पूर्व में तत्कालीन सर्वाधिक युवा प्रधानमंत्री ने देश में व्याप्त आकंठ भ्रष्टाचार कि बात को स्वीकार कर ईमानदारी का तो परिचय दिया था किन्तु कोई कारगर कदम उठाने कि हिमाकत न कर ईमानदारी को एक बार फिर हारने देने का अक्षम्य अपराध भी किया. उन्हें शायद सारथी के रूप में कोई "कृष्ण" न मिला जो उन्हें अपने ही भ्रष्ट भाई-बंधुओं के विरुद्ध अंतिम घोर युद्ध लड़ने के लिए प्रेरित करने हेतु "गीता" ज्ञान देता. और ऐसे अस्त्र-शस्त्र डाल देने वाले का भी हम "समरथ को नहि दोष गुसाई" के रूप में महिमा मंडन ही करते आ रहे हैं.
वर्तमान प्रधान मंत्री भी भ्रष्टाचार की बात तो स्वीकारते है,अधिकारियों को भी कारगर कदम उठाने का भाषण तो पिलाते हैं पर महामारी के विरुद्ध जैसे कारगर कदम उठाने चाहिए और उसकी निगरानी, समीक्षा और उचित संरक्षण प्रदान करना चाहिए, हाल-फ़िलहाल तो कहीं दर्शन होता दिखाई नहीं देता है, और इसी कहावत को चातितार्थ करता दिखाई देता है "थोथा चना, बाजै घना"
भविष्य के कहे जाने वाले संभावित सर्वाधिक युवा प्रधानमंत्री भी अपने पिता से भी अधिक सच बयानी करते हुए बढे हुए व्याप्त भ्रष्टाचार कि बात को स्वीकार करने में नहीं हिचकिचाते, पर कर्म द्वारा भ्रष्टाचार के विरुद्ध अभी तक उनका भी कोई युद्ध प्रारंभ न हो सका, अर्थात् यहाँ भी वही "ढाक के वही तीन पात" द्रष्टिगत हो रहे हैं....
अब जबकि सक्षम को भी अहसास है भ्रष्टाचार का, भ्रष्टाचार के कारण होने वाले दुष्प्रभावों का, स्विस बैंक में जमा अकूत काले धन का,तो अब तक की असक्षमताओं की जिम्मेदारी लेते हुए कौन जवाब देगा कि
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नज़ारे इनायत है.....
इंसानों की उलट कथा
लगते ही फल पेड़ों की टहनी भी झुक जाती है
बेलें पा कर तनिक संग आँचल में ढक लेती हैं
कर किलकारी नदियाँ तो बहती नित नीचे रहती
मटमैली सी भू-माँ का "घास हरी' श्रंगार करे
मुमुक्षु प्रकृति से कुछ भी ले थोडा भी कुहराम नहीं
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अब जरा यह भी जान लें की यसपीजी सुरक्षा प्राप्त व्यक्ति के लिए क्या करना पड़ता है. हवाई जहाज के इकोनोमी क्लास में इनके लिए आगे की प्रथम चार पंक्तिया खाली रखनी पड़ती है, यही नियम ट्रेन में भी है. आप खुद सोच सकते हैं की यह यात्रा कैसे देश हित में मितव्ययी हुई?
अब यही नहीं दिल्ली-लुधियाना के बीच की ४०० किलोमीटर की दूरी पर ट्रेन के रूट में पड़ने वाले तीन राज्यों में करीब १५००-१६०० जवान तैनात थे,और तो और रस्ते में हुई पथराव की घटना की जाँच जारी है जिस पर और कितना खर्च होगा, भगवान जाने. कहने का आशय यह कि दिखावे कि यह राजनीति देश पर भारी पड़ रही है.दिखावा कर आदर्श प्रस्तुत करने का माद्दा है तो तो सभी सुरक्षा हटा कर गुप्त रूप से आम यात्री बन यात्रा करो, देश की सही तस्वीर परखो, सच और गलत का भेद करना सीखो,अवसरवादियों और जरूरतमंदों की पहचान करना सीखो. शायद यही सबसे अधिक मितव्ययी, सच्चा और भरोसेमंद जनादर्श है और राष्ट्रपिता गाँधी जी का देश के भावी कर्णधारों के लिए सन्देश भी.
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आभारव्यक्ति
मेरी पिछली पोस्ट (१४ सितम्बर,२००९) पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले निम्न सम्मानीय क्षुदी और शुभचिन्तक पाठक/ पाठिकाओं... या कहें कि स्नेहिल टिप्पणीकारों (क्रम वही, जिस क्रम में टिपण्णी/ प्रतिक्रिया/ आलोचना प्राप्त हुई)....
बबली जी, नीरज गोस्वामी जी, सर्वत एम. ज़माल जी, दिगम्बर नासवा जी, निर्मला कपिला जी, विनोद कुमार पांडेय जी, Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" जी, राज भाटिय़ा जी, अभिषेक ओझा जी, ज्ञानदत्त पाण्डेय जी, "क्षमा" जी, लता 'हया' जी, अल्पना वर्मा जी, योगेन्द्र मौदगिल जी, समीर लाल (उड़न तश्तरी)जी, पी.सी. गोदियाल जी, प्रसन्न वदन चतुर्वेदी जी, शरद कोकास जी, दर्पण साह 'दर्शन' जी, शोभना चौरे जी, ज्योति सिंह जी, डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी, सुमन जी, रंजना [रंजू भाटिया] जी, अनुपम अग्रवाल जी, रंजना (रंजना राठौर) जी, सुलभ सतरंगी जी, मुरारी पारीक जी, अमिताभ (अमिताभ श्रीवास्तव) जी, योगेश स्वप्न जी, मार्क राय जी, अलका सर्वत जी, चंदन कुमार झा जी, क्रिएटिव मंच, Mrs. आशा जोगलेकर जी, डा. संध्या गुप्ता जी, अपूर्व जी, मुकेश कुमार तिवारी जी, वंदना अवस्थी दुबे जी, हिमांशु पाण्डेय जी, राजीव (भूतनाथ जी), संजय व्यास जी, प्रेम फर्रुखाबादी जी एवं मनोज भारती जी का विशेषरूप से हार्दिक आभारी हूँ कि आप सभी ने पहले की ही तरह स्नेह बनाये रखते हुए १४ सितम्बर की मेरी पोस्ट पर भी ह्रदय से मेरी हौसला अफजाई कर भविष्य में भी इसी तरह कुछ न कुछ लिखते रहने और पोस्ट करने लायक संबल प्रदान किया है और आशा है कि भविष्य में भी कुछ यूँ ही अपना-अपना स्नेहिल मार्गदर्शन मेरे ब्लाग पर आकर मुझे अनवरत प्रदान करते रहेंगें....
मैं उन गुरुजन से टिप्पणीकारों का भी विशेष रूप से आभारी हूँ, जिन्होंने अलग से मेरे मेल ऐड्रेस पर सन्देश लिख मुझे और भी बेहतर लिखने मार्फ़त सुझाव/टिप्स दिए.
और अंत मे, मैं अपने उन सह्रदय, परम आदरणीय टिप्पणीकारों का भी आभार व्यक्त करना चाहता हूँ, जो प्रायः मेरे ब्लाग पर आकर मुझे अपने आशीष वचनों से नवाजते ज़रूर हैं, किन्तु मेरी पिछली पोस्ट पर किसी न किसी खास काम में व्यस्तता के कारण टीका-टिपण्णी करने से चूक गए.
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