श्रद्धा
(३२)
है झूठों को क्या ज्ञात नहीं
झूंठ - सचों के सारे अन्तर
मुँह से निकले बोले तो ऐसे
ज्यों दे रहे हैं सच का जंतर
साक्ष्य सभी खड़े भी कर देते हैं
सच लाचार खड़ा रह जाता है
लाचार , ठगा - सा सच्चा मन
फिर भी न छोड़े श्रद्धा का जंतर
श्रद्धा
(३१)
हे राम ! तुम्हारी रामायण को
कब किसने समझा- जाना है
दिए उदाहरण स्वार्थ हेतु ही
समझा इसको ताना- बाना है
करें कल्पना राम - राज्य की
पर हरकत विपरीत मिले हरदम
आदर्श रचोगे हो श्रद्धा में रत
तभी राम - राज्य को आना है
श्रद्धा
(२७)
नहीं बुलाती मधुशाला उनको
जो पीने से कतराता है
छक कर ये तो खूब पिलाती
जो ख़ुद ही पीने आता है
क्यों कहते हो शिक्षा देने को
लेने वाला तो ले ही जाता है
श्रद्धा रही जहाँ जिसकी जैसी
मनचाहा वह हरदम पाता है