Sunday, 12 September 2010

चाहा जिसने जले-भुने, लगा "आग" छुप जाता है

बन "याचक" जो डटा रहा , "गुरु ज्ञान" वह पाता है
चाहा जिसने जले-भुने, लगा "आग" छुप जाता है

"अनुभव" जिसने सिखा दिया, वही आज संग अपने है
बाकी सब तो "बिसर" गया , करे याद ना आता है

सोना जितना "तपा" हुआ, "खरा" आज वह उतना है
समझा जिसने इसे नहीं, वही बाद पछताता है

जितना जिसको कमी लगे, उसे "आस" उतना भाता है
करने "लोलुभ", विज्ञापनी चका- चौंध मचवाता है


हालत ऐसी बनी "मुमुक्षु", सभी बात अब सुनता है
पा "अपनापन" सभी अभी, "समां" बांध गुण गाता है

Monday, 6 September 2010

'बातूनी' ने खबर पाई , 'महफ़िल' में फिर सुनाने को


थे जितना ही तुम व्याकुल, अपना कृतत्व बताने को
था उतना मैं भी व्याकुल, अपना अस्तित्व जताने को

जो जितना ही भ्रमित -सा, सपने उतने लेकर आये
'ज्ञानी' फिरता बावरा-सा, अपना सर्वस्व लुटाने को

जो जितना ही भाव-पूर्ण , उसमें उतनी निश्चलता है
हो भाव-रहित सब व्यस्त अब,लेखा-जोखा भुनाने को

जो जितना ही लगन-संग है, हारों से भी सबक लिया
'बातूनी' ने खबर पाई , 'महफ़िल' में फिर सुनाने को

'अनुभव' हरदम 'मुमुक्षु' को, दिग्भ्रमित कर रहा इतना
'बेबस' ज्यूँ हैं इस जगत में, 'सच' भी साक्ष्य जुटाने को