Monday 24 August 2009

शर्मों-हया चलता नहीं

बहुत दिनों से तमन्ना थी कि और लोगों की तरह यदि कोई मुकम्मल ग़ज़ल न भी लिख सकूं, तो कम से कम एक टूटी-फूटी ग़ज़ल तो लिखने का प्रयास करुँ।
बहुत कोशिशें की, देखने, सुनने, पढने की, पर जब भी लिखने बैठा तो कभी मतले ने अटका दिया तो कभी बहर ने। जितनी सावधानी बरतो, मूल भाव पर से ध्यान हट जाता। मुकम्मल ग़ज़ल की कौन कहे, टूटी - फूटी ग़ज़ल भी मुकम्मल न हो पाती। बहुत पन्ने फाड़े, बहुत वक्त जाया किया, इस हूनर को पकड़ने का, पर ज्यादातर प्रयासों में मुहकी ही खानी पड़ी.
खैर..... ऊपर वाले की मेहरबानी से एक टूटी-फूटी सी ग़ज़ल लिखने में अपनी निगाह में ( "निज कवित्त केहि लागि न नीका" इस्टाइल में) कामयाब तो हो गया, और इसे अपने ब्लॉग पर (क्योंकि और कोई तो इसे स्थान देगा नहीं) ठेलने की कोशिश कर रहा हूँ, कृपया इसे झेलने का कष्ट कर अनुग्रहित करें...

शर्मों-हया चलता नहीं

इंसानियत का अब कहीं एतबार भी दिखता नहीं
मासूमियत भी तो दिखे, हालात यूँ बनता नहीं

दावें करें वे चाह कर कितना यहाँ आकर अभी
विश्वास तो खंडित यहाँ, मंडित अभी लगता नहीं

दौलत मिले ये बात ही तो अब ज़हन में मचलती
"कितना गिरे" अहसास तो अब कहीं जगता नहीं

इतना बढा कर पाँव को, चादर किया छोटा जभी
टूटी सभी वे हसरतें, परिवार भी पलता नहीं

सारे ज़तन वे कर चुके, दीवानगी हारी नहीं
पाकर ज़रा सा साथ भी, ये रास्ता थमता नहीं

दौलत हुई पहचान अब, इसका 'मुमुक्षु' को भास है
नव-पीढियाँ सिखला रही, 'शर्मों-हया' चलता नहीं

38 comments:

वन्दना अवस्थी दुबे said...

बहुत सुन्दर रचना. आज के परिप्रेक्ष्य में एकदम सटीक. और हां ये कोई टूटी-फूटी गज़ल नहीं साबुत और असरदार रचना है. बधाई.

योगेन्द्र मौदगिल said...

वाह क्या बात है.... बधाई पर निरंतरता निखारेगी आपको... शुभकामनाएं..

अल्पना वर्मा said...

-ग़ज़ल के साथ अक्सर होता है व्याकरण निभाने के चक्कर में भाव और कथन में कहीं प्रभाव कम हो जाता है.
-अब आप ने पहले ही ग़ज़ल बहुत अच्छी लिखी है..आखिर के दो शेर ज्यादा पसंद आये.
badhaayee pahali mukammal gazal ke liye..

vikram7 said...

इंसानियत का अब कहीं एतबार भी दिखता नहीं मासूमियत भी तो दिखे, हालात यूँ बनता नहीं
प्रयास सराहनीय,दिल के भावों को व्यक्त कर देने का
माध्यम होती हॆ,कविता या गजल

कैटरीना said...

दुनिया की हवा को सलीके से कैद किया है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएं, राष्ट्र को प्रगति पथ पर ले जाएं।

sarwat m said...

आपके प्रयास तथा साहस को कोटि-कोटि नमन. गजल के छंद को, बहर को साथ लिए हुए चले. अब व्याकरण और उर्दू(फारसी) कोई हमारे देश-घर के तो हैं नहीं कि इन पर पकड़ बने ही बने. आप थोड़ी सी मेहनत, किसी सिद्धहस्त के सम्पर्क में रह कर करें, मुझे विश्वास है गजल और आप की जुगलबन्दी ऐसी होगी कि हम जैसों को सबसे पहले बोरिया बिस्तर समेट कर भागना पड़ेगा. भाई, मैं संजीदगी से कह रहा हूँ.

रश्मि प्रभा... said...

इतना बढा कर पाँव को, चादर किया छोटा जभी
टूटी सभी वे हसरतें, परिवार भी पलता नहीं
bahut achhi rachna

kshama said...

आज पूछा जाता है ,'शर्मो -हया किस चिडिया का नाम है '!
'बिखरे सितारे पे' टिप्पणी के तहे दिलसे शुक्रिया...सच तो ये है,कि, आगे,आगे ये सत्य कथा जो मोड़ लेगी, शायद उसका अंदाज़ा कोई पाठक लगा नही सकता...

विनोद कुमार पांडेय said...

ग़ज़ले नही एक भाव है, जो आपने प्रस्तुत किया,
इंसानियत क्यों खो रही,यह सोचने की बात है.

बेहतरीन ग़ज़ल!!!

Dr.T.S. Daral said...

दौलत हुई पहचान अब, इसका 'मुमुक्षु' को भास है
नव-पीढियाँ सिखला रही, 'शर्मों-हया' चलता नहीं

बहुत सही बात कही है भाई.

संजीव गौतम said...

इतना बढा कर पाँव को, चादर किया छोटा जभी
टूटी सभी वे हसरतें, परिवार भी पलता नहीं
ये टूटी फूटी ग़ज़ल बहुत अच्छी है. अपने को कम मत आंकिये. अच्छी ग़ज़ल है. वैसे विनम्रता भी काम की चीज़ है हा हा

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

वाह्! बहुत खूब्!!
आपका ये प्रथम प्रयास तो लाजवाब है!! बधाई और शुभकामनाऎं दोनो स्वीकार करें।

Harkirat Haqeer said...

इतना बढा कर पाँव को, चादर किया छोटा जभी
टूटी सभी वे हसरतें, परिवार भी पलता नहीं

बहुत खूब.....अब आपका इस छेत्र में भी धमाल मचाने का इरादा है ......!!

ज्योति सिंह said...

सारे ज़तन वे कर चुके, दीवानगी हारी नहीं
पाकर ज़रा सा साथ भी, ये रास्ता थमता नहीं
ati sundar ,meri dost vandana ne sahi kaha hai .main sonch rahi thi kai dino se ane ke liye lekin tyohar ke karan vyast rahi .aapki tippani kafi prabhavshali hoti hai jo man ko taslli bhi deti hai .

शिवम् मिश्रा said...

इस सुन्दर पोस्ट के लिए बधाई!

क्रिएटिव मंच said...

सारे ज़तन वे कर चुके, दीवानगी हारी नहीं
पाकर ज़रा सा साथ भी, ये रास्ता थमता नहीं

असरदार रचना
बधाई


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क्रियेटिव मंच

गर्दूं-गाफिल said...

मुमुक्च्छ जी
पहली गजल पर इतनी अच्छी टिप्पनिया मिली है
हमे तो पहली कविता के लिए पूछा गया था भैया किसकी चुराई है

खैर व्याकरण तो पीछे आता है कथ्य और कहन ही मंगलसूत्र और मांग की लाली है गहने तो बाद में अपनी दुल्हनिया को खूब पहना लेना .
ग़ज़ल को परणीता बनाने के लिए बधाई

Babli said...

अत्यन्त सुंदर ग़ज़ल! बहुत बढ़िया लगा आपका ये भावपूर्ण और उम्दा ग़ज़ल! बहुत बहुत बधाई !

Nirmla Kapila said...

इतना बढा कर पाँव को, चादर किया छोटा जभी
टूटी सभी वे हसरतें, परिवार भी पलता नहीं
और दौलत हुई पहचान अब मुमुक्ष ---------- दोनो शेर लाजवाब हैं सरी गज़ल बहुत सुन्दर है बधाई

sandhyagupta said...

Aapne ise tuthi-puthi kaise kah diya?

भूतनाथ said...

आपका प्रयास निस्संदेह अच्छा बन पडा है....और दो लाईनें मैं भी जोड़ता चलूँ....गलती से भटक जाने वाले को भले कभी रास्ता मिल भी जाए.....जानबूझकर भटकने वाले को कभी रास्ता दिखता नहीं....!!

योगेश स्वप्न said...

दौलत मिले ये बात ही तो अब ज़हन में मचलती
"कितना गिरे" अहसास तो अब कहीं जगता नहीं

pahla prayas bahut badhia hai, bhavishya ke liye shubhkaamnayen.
badhai.

परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर गज़ल है।बधाई।

श्याम सखा 'श्याम' said...

अच्छी शुरूआत है मेहनत करते रहें निखरेगीं आगे चल कर

MUFLIS said...

दौलत हुई पहचान अब, इसका 'मुमुक्षु' को भास है
नव-पीढियाँ सिखला रही, 'शर्मों-हया' चलता नहीं

जनाब ये तो बड़ा ही नायाब शेर कह डाला आपने
भाव-पक्ष बहुत ही जानदार है पूरी ग़ज़ल का
जब मन की बात कह ली जाये तो समझो रचना मुकम्मिल ...
---मुफलिस---

Ravi Srivastava said...

सचमुच में बहुत ही प्रभावशाली लेखन है... भावनाओं का सजीव चित्रण... वाह…!!! वाकई आपने बहुत अच्छा लिखा है। आशा है आपकी कलम इसी तरह चलती रहेगी, बधाई स्वीकारें।

आप के द्वारा दी गई प्रतिक्रियाएं मेरा मार्गदर्शन एवं प्रोत्साहन करती हैं।
आप के अमूल्य सुझावों का 'मेरी पत्रिका' में स्वागत है...
Link : www.meripatrika.co.cc

…Ravi Srivastava

मुकेश कुमार तिवारी said...

चन्द्रमोहन जी,

आप स्वस्थ्य हो ब्लॉगिंग पर लौट आये, ईश्वर को अनेक धन्यवाद।

रही बात गज़ल की तो सबने कहा ही है कि बहुत ही अच्छी बन पड़ी है :-

दौलत हुई पहचान अब,इसका 'मुमुक्षु' को भास है
नव-पीढियाँ सिखला रही, 'शर्मों-हया' चलता नहीं

शे’र अच्छा कहा है।

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

इस सुन्दर और भावपूर्ण रचना के लिए बधाई।

महफूज़ अली said...

इतना बढा कर पाँव को, चादर किया छोटा जभी
टूटी सभी वे हसरतें, परिवार भी पलता नहीं


bahut hi sahi baat kahi hai aapne...... aajkal ke jeevanshaili ko darshaati hai ye lines.......


bahut hi asardaar kavita......

अनुपम अग्रवाल said...

एतबार मासूमियत का भी दिखता नहीं
इंसानियत दिखे, हालात यूँ बनता नहीं
.........
यूँ चमकते सूर्य को दिखा दिया देता मगर
पीढ़ीयों से सीखकर वो बढ गया ढलता नहीं

लता 'हया' said...
This comment has been removed by the author.
गौरव said...

थोड़ा सा संकोच हो रहा है.......इतने लोगों के बीच, और इतनी तारीफ के बाद शब्द नही बचे हैं.............नई शुरुआत के लिए बधाई........

Suman said...

nice

शरद कोकास said...

आप्के प्रोफाईल में आपने लिखा है कि आप स्वांत:सुखाय लिखते है । लेकिन यह स्वांत:सुखाय तभी तक होता है जब तक यह प्रकाशित न हो .अब आपकी रचना पाठकों की अदालत में है । तो आपको रचना पर ध्यान देना ही होगा । थोड़ी मेहनत और करे।

Prem said...

pryaas toota phoota nahin,bahut sunder aur bhav poorn rachna.shubhkamnayen

mark rai said...

दौलत मिले ये बात ही तो अब ज़हन में मचलती
"कितना गिरे" अहसास तो अब कहीं जगता नहीं ....bahut hi sundar....kamaal ka likha aur kahte hai ki tuti futi hai...agar ye tuti futi hai to jab aap achchi likhege to kya hoga....

दिगम्बर नासवा said...

इतना बढा कर पाँव को, चादर किया छोटा जभी
टूटी सभी वे हसरतें, परिवार भी पलता नहीं

सटीक......... सराहनीय प्रयास .......Bahoot khoob likha hai ...

लता 'हया' said...

thanx for visiting my blog regularly and ur comments. ur shardha is good and by the way m first time visiting ur blog so earlier comments were not mine.yes neeraj ji is my cousin so he might have tried to reply on behalf of me.as i hardely get time to post new gazal.m very greatful to neeraj bhayya who helps me a lot in this hitech.media,blog etc. connection.cz sometime mujhse 'blog haya chalta nahin.'