Mumukshh Ki Rachanain
Sunday, 6 April 2008
श्रद्धा
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श्रद्धा (३६) हर दिल को बरबस छू लेती है बालक की बाल सुलभ चंचलता हर युग में नए गीत बना करती है माँ की सहज त्यागमयी ममता पर स्वार्थियों की त...
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श्रद्धा
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श्रद्धा (३५) गहन विचारों में है जाता कौंन सतही बातें ही होती रहती है गैरों के दर्दों को है किसने समझा अपनी तो जान निकलती रहती है थोड़े प...
Saturday, 5 April 2008
श्रद्धा
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श्रद्धा ( ३४) कर्म करोगे हैवानों सद्रश्य तो सबकी गाली खानी होगी पा प्रतिस्पर्धा चरम दौर में गला काटने की ठानी होगी मिला है जीवन इंसान...
Friday, 4 April 2008
श्रद्धा
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श्रद्धा (३३) अच्छा दिखाने कि ख्वाहिश सबकी फिर, झूँठ ज़हन में क्यों आते हैं शायद अन्दर डर है या फिर वे इच्छाओं का सागर अपनाते हैं प्रयास ...
Tuesday, 25 March 2008
श्रद्धा
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श्रद्धा (३२) है झूठों को क्या ज्ञात नहीं झूंठ - सचों के सारे अन्तर मुँह से निकले बोले तो ऐसे ज्यों दे रहे हैं सच का जंतर साक्ष्य सभी खड़े...
Monday, 24 March 2008
श्रद्धा
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श्रद्धा (३१) हे राम ! तुम्हारी रामायण को कब किसने समझा- जाना है दिए उदाहरण स्वार्थ हेतु ही समझा इसको ताना- बाना है करें कल्पना राम - राज्...
Thursday, 20 March 2008
श्रद्धा
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श्रद्धा (३०) है किस्मत एक पहेली ऐसी जो सिंचित केवल कर्मों से होती है कहने दो लोंगों को कुछ भी "गीता" में ही ज्ञानों का मोती है ...
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