Sunday, 6 April 2008

श्रद्धा

श्रद्धा
(३६)
हर दिल को बरबस छू लेती है
बालक की बाल सुलभ चंचलता
हर युग में नए गीत बना करती है
माँ की सहज त्यागमयी ममता
पर स्वार्थियों की तथाकथित सेवाकता
न दिल को छूती, न गीत बना करता
त्याग स्वार्थ श्रद्धा से कर्म करेगा तो
जन-जन में तेरा ही रूप संवारता

2 comments:

  1. balak ki baal sulabhta bahut khoob

    aapki ye rachna bahut achhi lagi

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  2. मुमुक्षु (सन्यासी) शब्द से पहले तो भय लगा। मुमुक्षु की रचनायें से तो लगा कि शुष्क परलौकिक बात होगी। पर आपने तो सहज और प्रेरक लिखा है।
    आप कृपया नियमित लिखें और (यदि आपको मान्य हो) वर्डवैरीफिकेशन हटा दें। उससे टिप्पणी में आसानी होती है।
    शुभकामनायें गुप्त जी।

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