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Monday, 5 October 2009

दिल की पाती.... , "विद्रोही", अंत में, आभारव्यक्ति

दिल की पाती....

हे मेरे आवरण रूपी शरीर, मैं तेरे ही अन्दर बैठा तेरे हर कृत्यों का सहज अनुभव अनवरत आत्मसात करता रहता हूँ, मुझसे तेरा जाने- अनजाने किया कुछ भी नहीं छिपा है. तेरे दिखाने के और खाने के दाँतों से भलीभांति परिचित हूँ. तेरे हास्य में रुदन और रुदन में हास्य को भी भली भांति पढ़ लेता हूँ. मैं छोटा-सा ज़रूर हूँ, पर तेरे इस शरीर के लिए बहुत ज़रूरी हूँ. मेरे से ही तू और तेरा अहम् है, मैं नहीं तो कुछ भी नहीं....

तू आज इतना पढ़ लिख कर भी जितना कष्ट मुझे दे रहा है, उतना तो गुज़रे ज़माने के तुम्हारे अनपढ़ से पुरखों ने भी मुझे न दिया. बहुत तरक्की कर ली तूने, चाँद में भी पानी खोज लिया, पर तूने अपने उस पानी का क्या किया जिसके लिए रहीम ने कुछ यूँ कहा था........

रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून
पानी गए न ऊबरे , मोती , मानुष , चून

तू तरक्की करता हुआ खुद को दिखाता है, प्रचारित करता है, अपने पैसे के दम से खुद को शक्तिशाली और वैभवशाली दिखाता है, पर क्या तू जानता है कि तेरा कोई इन्सान कुछ बिगाड़ पाए या न पाए पर तेरी
* तथाकथित उन्नत हरकते,
* तेरे तथाकथित उन्नत रहन-सहन,
* तेरी तथाकथित उन्नत सोंच

तेरे अन्दर बसे इस महत्वपूर्ण छोटे से, मासूम से, नाज़ुक से, प्यारे से, दिल पर क्या कहर ढा रहीं हैं.....

क्या तू जानता है कि लोग तो पहले दिल दिया करते थे, लेने की अभिलाषा तो थी ही नहीं, पर जैसे-जैसे तेरे विकास कि यात्रा प्रारंभ होती गयी, उम्रदराज लोगों के दिल पर "अटैक" (हार्ट अटैक) होने लगे, प्रगति और बढ़ी इसने अपने असर युवाओं पर भी दिखाने शुरू कर दिए, प्रगति और बढती गयी, अब छोटे बच्चे भी इसके कहर से अछूते नहीं रहे, उनकी इस बीमारी को शायद आपके डाक्टर मित्र लोग "रयुमेटिक हार्ट डिजीज" कहते हैं.

तूने परेशान व्यथित हो पैसे के दम पर अपने डाक्टर मित्रों से इस कमज़ोर होती मेरी काया के बारे में जानने का यत्न किया तो उन्हों ने भी जैसा किताबों में पढ़ा, समझा, वैसे कारण बता दिए। यथा... १. स्पीडी लाइफ में अक्सर कालेस्ट्राल युक्त भोजन का सेवन करना,
२. फिजिकल एक्सरसाइज़ न करना
३. जर्दा, पान मसाले और स्मोकिंग की आदतें
४. तनाव
५. जनेटिक अर्थात पूर्वजों से प्राप्त
पर हे मेरे आवरण, अपनी बुद्धि पर से तो आवरण हटा कर कुछ सोंच...
१. स्पीडी लाइफ के लिए कौन जिम्मेदार है, अपने बुद्धि और पैसे की ताकत का प्रयोग जीवन के लाइफ स्टाइल को सहज बनाए रखने के लिए क्यों नहीं करता, वस्तुतः जीवन सहज तो है ही आपको उसे असहज बनाने के कारणों को हटाने का यत्न करना होगा।
२. नफा-नुकसान, लिखा-पढ़ी जैसे अनुत्पादक कर्मों में कम उलझ कर शारीरिक मेहनत भी कर प्रकृति में कुछ उत्पादक योगदान भी दे, यही तो वास्तविक फिजिकल एक्सरसाइज़ है।
३. जर्दा पान मसाले स्मोकिंग तो पूर्वज भी प्रयोग करते थे पर यथोचित मात्रा में पूर्ण मेहनत करते हुए और गुणवत्तायुक्त. अब हम इसके आदी और गुणवत्ता भी हम निर्धारित करने में सक्षम नहीं, विज्ञापनों के सहारे चल रहे हैं, स्टैण्डर्ड के हिसाब से. यदि शरीर में सहज जीवन, उचित खानपान से रोग प्रतिरोधक शक्ति है तो ये यथोचित और गुणवत्तायुक्त भी हमारा अधिक कुछ नहीं बिगाड़ सकते।
४. तनाव भी किसलिए...सबकुछ तो है, (तरक्की है तो इसका मतलब यही निकलता है.) ....., क्या थोडा सा और पाने के लिए.............अरे भाई तेरे पूर्वज तो कर्जे पर कर्जा लेकर भी तनाव रहित ही रहे, तनाव रहित रहने का प्रयत्न भी खुद ही करना होगा, और दूसरों के लिए भी तनाव का कारण न बनों, ये उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है....
५. जनेटिक, भाई ये बीमारी तो पूर्वजों में थी ही कंहाँ............न जाने कब से जनेटिक हो गई.......शायद जनेटिक भी इसे हमी ने बनाया....

में उपरोक्त "पाती" बहुत संकोच से लिख रहा हूँ, क्योंकि जानता हूँ कि तुम्हारा अहम् इसे स्वीकार न करेगा, क्योंकि
* तुम्हें डाक्टर की फीस चुकाना मंजूर है,
* मंहगी दवाएं खाना मंजूर है,
* बाई पास सर्जरी कारवां मंज़ूर है
* अपना स्टैण्डर्ड दिखाना पसंद है

पर हरक़त से बाज़ आना मंजूर नहीं......"जियो और जीने दो", "पसीने की कमाई का मोल", कब आखिर कब समझ में आएगा?

अंततः मैं तो यही कहूँगा कि समझ-समझ के भी जो न समझे............... और वो मुझे दिन- दूनी रात चौगनी गति से कमज़ोर और असहाय होता ही पायेगा...........थोडा लिखा, बहुत समझना.........
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एक छोटी सी रचना

"विद्रोही"

दिए गयें हैं विद्रोही को
सदा से ही बस दो रूप
इक समझे इन्हें ग़द्दार
दूजा देश-भक्त अनुरूप
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और अंत में
आज के लिए एक प्रश्नवाचक अधूरा चुटकला जो पूरा तब बनेगा जब अगले अंक में उसका उत्तर आएगा, तब तक आप इसे पढ़ कर अपने उत्तर से अवगत कराएं, हो सकता है आपका उत्तर ही चुटकले में उत्तर के रूप में हो....
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पहले का प्रश्न: यार कमरे में सभी खिड़की, दरवाजे और रोशनदान वगैरह अच्छी तरह बंद कर एसी चालू रख निंदिया के बिस्तर में आने की प्रतीक्षा की, फिर भी ससुरी निंदिया आई ही नहीं, आखिर क्यों.....?
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अभी तो आपका उत्तर..................प्रतीक्षित है.

"दूसरे" का उत्तर अगली पोस्ट में.......
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आभारव्यक्ति
मेरी २८ सितम्बर की पोस्ट पर प्राप्त आप सब की बहुमूल्यवान, सारगर्भित, प्रेणादायक, हौसलाअफजाई परक या आलोचनात्मक टिप्पणियों पर मैं अपनी आभारव्यक्ति अपनी ४ अक्तूबर की पोस्ट "अभारव्यक्ति" में ही सादर व्यक्त कर चुका हूँ.
आपसे विनम्र निवेदन है कि आभारव्यक्ति को पूर्णतः (डिटेल) में देखने के लिए
मेरी ४ अक्तूबर की पिछली पोस्ट भी ज़रूर देखे.
हार्दिक आभार।
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