Wednesday, 6 August 2008

श्रद्धा

श्रद्धा
(४२)
कुचले- रौन्दें जाने पर भी पेडों ने
आशाओं, उमंगों से न बढ़ना छोड़ा
जब तलक रही जमीं जड़ें धरा में
बिपरीत हालातों से न लड़ना छोड़ा
भ्रष्टाचार, मक्कारी के आधारों पर तो
आशाएं नहीं, मदमस्त लोभ पनपता
पर जुड़ने वालों ने श्रद्धा-आधारों से
लोभ-मोह के सोपानों पे चढ़ना छोड़ा

3 comments:

  1. कुचले- रौन्दें जाने पर भी पेडों ने
    आशाओं, उमंगों से न बढ़ना छोड़ा
    जब तलक रही जमीं जड़ें धरा में
    बिपरीत हालातों से न लड़ना छोड़ा
    " very very inspring thoughts full of life"
    Regards

    ReplyDelete
  2. आशाओं, उमंगों से न बढ़ना छोड़ा
    जब तलक रही जमीं जड़ें धरा में
    बिपरीत हालातों से न लड़ना छोड़ा
    "Very inspiring thought"

    ReplyDelete
  3. आशाएं नहीं, मदमस्त लोभ पनपता
    पर जुड़ने वालों ने श्रद्धा-आधारों से
    लोभ-मोह के सोपानों पे चढ़ना छोड़ा
    बहुत सुन्दर औरअच्छा लिखा है । बधाई स्वीकारें।

    ReplyDelete