Friday, 1 October 2010

कोई कड़ी 'विश्वास" की , टूट गहरी चुभी होगी

दे न सके सम्मान तुम, बात कुछ तो रही होगी
कोई कड़ी 'विश्वास" की , टूट गहरी चुभी होगी

"तीर" बहुत "शब्दों" के, "शब्दवेधी" सा कौशल ना
कौन करे अभ्यास अब, "वक्त" की ही कमी होगी

"शतरंजिया " चालों कि वो बादशाहत-अदाएं भी
आज कुंद-सी हो गई, "बात" कुछ तो खली होगी

"रार' ठनी मन में जब , "काल" समझो बुरा तय है
ईश-शरण में रमने पर, मानसिक तुष्टि मिली होगी

ठाठ "मुमुक्षु" के पास भी, बेखटक सो रहा वह तो
गहन निंद्रा जी-भर मिली, "पाक-मन" से लुभी होगी


39 comments:

  1. वर्तमान परिवेश में खूबसूरत ग़ज़ल ।
    छुट्टियों में स्वागत है ।

    ReplyDelete
  2. बहुत सुन्दर गजल है। बहुत बहुत बधाई।

    ReplyDelete
  3. बेहद उम्दा रचना ...
    आभार और बधाई...

    ReplyDelete
  4. .

    कोई कड़ी 'विश्वास" की ,टूट गहरी चुभी होगी ...

    अक्सर ऐसा होता है । मन में जब कहीं कोई विश्वास की कड़ी टूटती है तो सामने वाले ke लिए सम्मान में कमी हो ही जाती है।

    बेहद खूबसूरत और सार्थक रचना।

    आभार।

    .

    ReplyDelete
  5. "शतरंजिया " चालों कि वो बादशाहत-अदाएं भी
    आज कुंद-सी हो गई, "बात" कुछ तो खली होगी

    बहुत गहरी बात कही है ..अच्छी गज़ल

    ReplyDelete
  6. बेहतरीन रचान पिरोयी है, शब्दों की।

    ReplyDelete
  7. "तीर" बहुत "शब्दों" के, "शब्दवेधी" सा कौशल ना
    कौन करे अभ्यास अब, "वक्त" की ही कमी होगी

    "शतरंजिया " चालों कि वो बादशाहत-अदाएं भी
    आज कुंद-सी हो गई, "बात" कुछ तो खली होगी
    बहुत खूबसूरत आपकी लेखनी मे तो माँ शार्दे का निवास है। बधाई आपको।

    ReplyDelete
  8. ईश शरण में रमने पर मानसिक तुष्टि मिली होगी,
    मेरे ब्लाग पर आइए तो ,मन की बगिया खिली होगी।

    ReplyDelete
  9. बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल लिखा है आपने ! इस उम्दा ग़ज़ल के लिए आपको बधाई!

    ReplyDelete
  10. इस रचना में शब्दों का बेहतरीन प्रयोग है ।

    ReplyDelete
  11. अति खुब सुरत गजल जी धन्यवाद

    ReplyDelete
  12. अब मैं क्या कहूं। मेरी पीठ वैसे भी बहुत ही घायल है। उस दर्द को जाने-अनजाने खुरच डालता हूं। आप टिपियाने के लिए आएं तो क्या बात है।

    ReplyDelete
  13. आनंद वर्धन ओझा जी ने मुझे मेल पर निम्न टिपण्णी भेजी है ....

    चन्द्रमोहनजी,
    लगाता है, तीर खाए कीर का कोई पीर आज बोला है ! ज़िन्दगी है तो ऐसे अनुभवों की कमी भी नहीं ! आपकी इस रचना में सादगी और संजीदगी का अद्भुत सम्मिश्रण है ! 'तीर खाइए और पीर सहिये--यही जीवन है, तो ऐसा ही सही !!
    सप्रीत--आ

    ReplyDelete
  14. दे न सके सम्मान तुम, बात कुछ तो रही होगी कोई कड़ी 'विश्वास" की , टूट गहरी चुभी होगी

    dil ke the mahman tum,बात कुछ तो रही होगी
    bane rahe anjaan tum ,बात कुछ तो रही होगी

    बहुत सुन्दर .बधाई!!

    ReplyDelete
  15. दे न सके सम्मान तुम, बात कुछ तो रही होगी
    कोई कड़ी 'विश्वास" की , टूट गहरी चुभी होगी
    एक-एक शब्‍द प्रत्‍येक शेर के लाजवाब हैं। बहुत अच्‍छी गजल के लिए बधाई।

    ReplyDelete
  16. बहुत सुन्दर गजल है। बहुत बहुत बधाई।

    ReplyDelete
  17. ब्लॉग को पढने और सराह कर उत्साहवर्धन के लिए शुक्रिया.

    ReplyDelete
  18. माफ़ करिए चन्द्र मोहन जी देरी से आने के लिए. आप यह मत समझिये कि आपने टिपण्णी की इसलिए हम आये :) आप अगर नहीं भी करते तो भी हम यहाँ जरूर आते क्योंकि विद्वता का सम्मान करने में हमें भी गर्व होता है. और वैसे भी हम आपकी हिंदी के कायल हैं पर इन दिनों आप नियमित रचना नहीं कर रहे हैं और आपका पुराना अंदाज़ कहीं खो सा गया है.
    संक्षिप्त पर गहरी बात कही है आपने इन ग़ज़लों में......
    आभार
    रोशनी

    ReplyDelete
  19. तीर" बहुत "शब्दों" के, "शब्दवेधी" सा कौशल ना
    कौन करे अभ्यास अब, "वक्त" की ही कमी होगी


    क्या खूब कहा है आपने.... यह पंक्तियाँ तो बहुत ही लाजवाब हैं..... बहुत ही अच्छी लगी यह ग़ज़ल...

    ReplyDelete
  20. "रार' ठनी मन में जब , "काल" समझो बुरा तय है
    ईश-शरण में रमने पर, मानसिक तुष्टि मिली होगी

    सच कहा है .... तभी तो ईश्वर की शरण से ज़्यादा कुछ नही .... मन को निर्मल रखना चाहिए .....

    ReplyDelete
  21. "तीर" बहुत "शब्दों" के, "शब्दवेधी" सा कौशल ना
    कौन करे अभ्यास अब, "वक्त" की ही कमी होगी
    bahut badhiyaa

    ReplyDelete
  22. बहुत सुन्दर गजल है। आभार और बधाई...

    ReplyDelete
  23. यूँ तो सभी खास है मगर ...
    दे न सके सम्मान तुम, बात कुछ तो रही होगी
    कोई कड़ी 'विश्वास" की , टूट गहरी चुभी होगी
    बहुत अच्छी लगी यह पंक्ति ...सम्मान काम होने के पीछे कहीं न कहीं गहरी चुभन होती है ...स्त्री हो या पुरुष ...!

    ReplyDelete
  24. एक-एक शेर उम्दा !!!
    "रार' ठनी मन में जब , "काल" समझो बुरा तय है ईश-शरण में रमने पर, मानसिक तुष्टि मिली होगी

    यह तो बहुत ही अच्छा लगा

    ReplyDelete
  25. प्रिय गुप्ता जी आज आपकी रचना पढ़ मन गाद गाद हो गया शब्द और भाव अनूठे पिरोये हैं आपने इस रचना में...बहुत खूब...यूँ ही लिखते रहें....आपको पढ़ना एक खूबसूरत अनुभव से गुजरने से कम नहीं...

    नीरज

    ReplyDelete
  26. "तीर" बहुत "शब्दों" के, "शब्दवेधी" सा कौशल ना
    कौन करे अभ्यास अब, "वक्त" की ही कमी होगी !!

    लाजवाब! रचना बहुत ही गहरे भाव समेटे हुए....

    ReplyDelete
  27. दे न सके सम्मान तुम, बात कुछ तो रही होगी
    कोई कड़ी 'विश्वास" की , टूट गहरी चुभी होगी

    "तीर" बहुत "शब्दों" के, "शब्दवेधी" सा कौशल ना
    कौन करे अभ्यास अब, "वक्त" की ही कमी होगी
    aapko dekh kar bahut dino baad bahut khushi hui ,vandana se khabar mili ki aap kahi baahar rahte hai is karan post daal nahi paate .
    aaj ki gazal bahut hi shaandaar hai .aap sada hi sundar likhte hai .

    ReplyDelete
  28. कुछ न कुछ बात तो होगी जो तुम सम्मान न दे सके ’’कुछ तो मजबूरियां रही होंगी आदमी यूं बेवफा नहीं होता ’’शतरंज की चाल और वादशाहत की अदायें वल्लाह ऐसी कौन सी बात खल गई जो चाल और अदायें दौनों कुन्द हो गई ।मन में लडाई का निश्चय कर लिया समझो बुरा वक्त आगया ।ईश शरण और तुष्टि का तो सिध्दान्त ही है ।अति श्रेष्ठ रचना ।

    ReplyDelete
  29. हर शेर लाजवाब है बहुत सुन्दर

    ReplyDelete
  30. कोई कड़ी 'विश्वास" की , टूट गहरी चुभी होगी

    बेहतरीन रचना...

    ReplyDelete
  31. "तीर" बहुत "शब्दों" के, "शब्दवेधी" सा कौशल ना
    कौन करे अभ्यास अब, "वक्त" की ही कमी होगी

    gehre bhav.sundar prastuti.badhai.

    ReplyDelete
  32. विश्वास की कडी टूटती है तो गहरी चुभती है । सही कहा ।

    ReplyDelete
  33. "तीर" बहुत "शब्दों" के, "शब्दवेधी" सा कौशल ना
    कौन करे अभ्यास अब, "वक्त" की ही कमी होगी '

    वाह! बहुत खूब कहा है.
    ......................
    बहुत ही अच्छी गज़ल है.

    ReplyDelete
  34. "रार' ठनी मन में जब , "काल" समझो बुरा तय है
    ईश-शरण में रमने पर, मानसिक तुष्टि मिली होगी
    ..बहुत सुंदर।
    ..पूरी गज़ल पढ़कर जो भाव बनता है वह लाज़वाब है।

    ReplyDelete