उजड़ी होगी बगिया कोई, कुछ पल महल सजाने को
खर्चे होंगें "पैसे" ही तो,अपना अहम् दिखाने को
कैसे कितना काटें किसका, हरदम सोंच वहां चलती
हम "दुखियारे" खपते-मरते, बढ़ते खरच जुटाने को
"नौ की लकड़ी- नब्बे खर्चे", करता कौन, ज़रा जानों
इन "बेढब - से" खर्चों पर ही, पहले रोक लगाने को
सीखा जिसने "दिल" से देना, "दानी-वीर" रहे हैं वो
चिक-चिक वाले धूमिल करते, सारी साख ज़माने को
कतरा-कतरा सींचा जिसने, पागल "मुमुक्षु" वही तो है
पा चुटकी भर दौलत घुल-मिल, "दुनियादार" कहाने को
चंदर मोहन जी , ब्लॉग वापसी पर स्वागत है । एक मुद्दत के बाद आपको पढने को मिला है ।
ReplyDeleteमौजूदा हालातों पर बहुत बढ़िया कटाक्ष किया है ।
हम भी हैरान परेशान हैं इन हालातों से । लेकिन ज़ज्बा कभी कम नहीं होना चाहिए , लड़ने का ।
बहुत बढ़िया लिखा है ।
Ati uttam!
ReplyDeleteSaarthak kataaksh!
बहुत दिनों के बाद आपका शानदार पोस्ट पढने को मिला! बहुत बढ़िया लिखा है आपने जो प्रशंग्सनीय है! बधाई!
ReplyDeleteकतरा-कतरा सींचा जिसने, पागल "मुमुक्षु" वही तो है
ReplyDeleteपा चुटकी भर दौलत घुल-मिल, "दुनियादार" कहाने को
बहुत बढ़िया. कबीर की याद आ गयी!
हर शेर क़ाबिले तारीफ़ है.,
ReplyDeleteख़ास कर
"नौ की लकड़ी- नब्बे खर्चे", करता कौन, ज़रा जानों
इन "बेढब - से" खर्चों पर ही, पहले रोक लगाने को
...
वर्तमान हालातों पर इस गज़ल में खूब सही कटाक्ष किया है.
**बहुत दिनों बाद ब्लॉग अपडेट किया आप ने और बहुत ही सशक्त रचना के साथ.
बधाई.
shukria and
ReplyDeleteWELCOME BACK
मुमुक्षु जी !!! इतने लम्बे अर्से तक कहाँ रहे ...
ReplyDeleteआपकी सुंदर लेखनी बहुत इंतजार के बाद पढ़ने को मिली है ... सुंदर कविता
चंद्रमोहन जी बहुत अच्छा लगा काफ़ी लंबे गैप के बाद आप आएँ और आते ही छा गये..सुंदर रचना..बधाई
ReplyDelete... सुन्दर भाव!!!!
ReplyDeleteउजड़ी होगी बगिया कोई, कुछ पल महल सजाने को
ReplyDeleteखर्चे होंगें "पैसे" ही तो,अपना अहम् दिखाने को
बहुत समय बाद आपको पुन्ह ब्लॉग पर देख कर अच्छा लगा ... धमाकेदार रचना के साथ वापसी है आपके .. कुछ हक़ीकत से जुड़ी बातें कहीं है आपने हर पंक्ति में .. लाजवाब ...
Aadarniy Chandra Mohan ji bade dino baad aapka blog padne ko mila.Aap nirantar likha kariye kyonki aapse bahut kuch sikhne ko milta hai.
ReplyDelete:)
Der aye par durust aye.
ReplyDeleteबहुत सुन्दर रचना
ReplyDelete'कैसे कितना काटें किसका, हरदम सोंच वहां चलती
ReplyDeleteहम "दुखियारे" खपते-मरते, बढ़ते खरच जुटाने को'
- सौ टका सही.
"नौ की लकड़ी- नब्बे खर्चे", करता कौन, ज़रा जानों
ReplyDeleteइन "बेढब - से" खर्चों पर ही, पहले रोक लगाने को
सीखा जिसने "दिल" से देना, "दानी-वीर" रहे हैं वो
चिक-चिक वाले धूमिल करते, सारी साख ज़माने को
bahut dino baad aana hua aapka blog pe swagat hai ,rachna kafi shaandaar hai .hausala bas bana rahe ......
अरे..अचानक दिख गये आप..!
ReplyDeleteसुंदर रचना के साथ वापस की बधाई.
आपका इंतज़ार कर रहा था... आप कहीं भी रहें बीच बीच में दर्शन दे दिया करें.... इस समूह में आप जैसे ज्ञानी और उदार हृदयी व्यक्ति का होना अनिवार्य है.
ReplyDeleteरचना आपके स्वभाव के अनुकूल, वर्तमान परिदृश्य को बयां करती है. बहुत बढ़िया ग़ज़ल.
वाह.....क्या बात कही आपने...कितना सही कहा...
ReplyDeleteचिंतन को आधार देती बहुत ही सुन्दर रचना....आभार..
Sundar rachana ke liye dhanybad..Regards
ReplyDeleteLines Tell the Story of Life "Love Marriage Line in Palm"
"Bikhare sitare'pe aapkee shukr guzaaree pesh kee hai...zaroor gaur karen!
ReplyDeleteRespected chacha g'
ReplyDeleteI am also now here.