श्रद्धा
(२)
जन कर श्रद्धा मन में
भरती है स्फूर्ति बदन में
झंकृत कर तन- मन को
है प्यार दिखाती कण- कण में
पत्थर भी हैं देव उसी से
झुकते शीश जहाँ खुशी से
बीतेगा जीवन हँसी- खुशी से
बस श्रद्धा एक रमा ले मन में
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