Friday, 28 July 2017

"करम का लेख" विशेषण रहित है, अर्थात भेद-भाव से परे……………यह बहुतों को बुझाता नहीं और प्रमाण के लिए वैज्ञानिक तथ्य की गुहार करने लगता है और अन्ततः तभी बुझाती है जब ऊपर वाले की लाठी उस पर बरसती है अनायास और कह बैठता है....."हे भगवन, मैंने ऐसा क्या किया, जिसकी सजा मुझे दे रहे हो"................
खैर हर वह, जो  
समझे न समझे
पर गा भी देता है
"………………जैसा करम करेगा, वैसा फल देगा भगवान"
"जैसा" और "वैसा" भी भेद-भाव से परे वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित ध्वनि और प्रतिध्वनि सदृश्य ही तो हैं बस महसूस होने में बीच में कुछ "काल या कहें पल" का अंतर
'काल और पल" की गणना का भी अपना प्राचीनतम विज्ञान है, जिसे समझना और तदनुसार उद्घोषणा करना हर किसी के बूते की बात नहीं
फिर भी तमाम ज्योतिष शास्त्र विरोधी लोग भी अपने हर काम हेतु शुभ लग्न की तलाश में दिखते हैं और नारियल फोड़ने-फ़ुड़वाने से भी नहीं चूकते
गजब की सहमति असहमति वालों में भी अक्सर दिख ही जाती है हर शुभ समझे जाने वाले अवसर पर

Monday, 17 July 2017

अयोध्या में रामलला का बहु प्रतीक्षित भव्य मंदिर कब बनेगा.....ये तो किसी को भी पता नही
किन्तु
भव्य रायसीना में
"राम"
२५ जुलाई को जरूर प्रतिस्थापित होंगे....
इस पर अब शायद ही किसी को संन्देह हो
......डरात्मा/फालोवरात्मा तो अंतरात्मा पर आसीन हो यही कह रही है
और
"मीरा" तमाम गुणवत्ता से लबरेज होने के बावजूद इतिहास ही दोहराती पायी जायेंगी.....
गुण के गाहक सहस नर......
शायद राजनीति में उपयुक्त नहीं बैठता है.....अक्सर

Sunday, 16 July 2017

मुझे नहीं लगता कि
अपने देश में अब किसी भी विधा के जानकारों मसलन
* डाक्टर/नर्स
* इन्जीनियर
* CA/इकोनामिस्ट
* अध्यापक
* अधिकारी
* नेता
* साहित्यकार
* नाटककार
* कलाकार
* पत्रकार
* वकील
* धन्धेवाले
आदि की कोई कमी है, और उनके चलते इस देश मे समस्यायें तो अब कम ही होनी चाहिये, ऐसा माना जाना चाहिये
किन्तु निरंन्तर बढ़ती समस्यायों के चलते ऐसा महसूस होता है कि इन पढे-लिखे, समझदार और जिम्मेदार लोगों में से काफी लोग पथभ्रष्ट हो गये हैं, कारण
* स्वार्थ भी हो सकता है
* भ्रष्टाचार भी हो सकता है
* जल्दी ज्यादा पैसा कमाने की चाहत भी हो सकती है
* किसी का दबाव भी हो सकता है
* कोई मजबूरी भी हो सकती है
आदि-आदि
कारण चाहे कुछ भी हो, किन्तु कोई भी कारण इन्हें यदि पथभ्रष्ट कर देश में समस्याएं बढ़ा रहा है,
तो
ऐसे लोगों को सच्चा देशभक्त तो कदापि नहीं माना जा सकता है न

कबीरदास जी बहुत पहले ही बता गये हैं......
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोय
जो  देखा  मन आपनो, मुझसे  बुरा न कोय

Sunday, 2 July 2017

GST

अगर आप उपभोक्ता हो
तो
GST के पचड़े में न पड़ो, तो स्वस्थ रहोगे
नोटबन्दी की तरह GST लागू हो चुका है, ये एक हकीकत है
अत: ज़रूरत ज्यादा यह है कि
* सामान खरीदते वक्त बस दुकान से पक्का बिल लेना मत भूलो अब
* अपना दिमाग GST के चलते बढ़े हुये सर्विस टैक्स से घर के बढ़े खर्च को कैसे ऐडजस्ट किया जाये, उस पर लगया जाये तो शायद घर और देश के लिये ज्यादा मुफीद होगा
.......बाकी आप तो ज्यादा समझदार हैं ही......
कि
GST का सारा
* हिसाब-किताब,
* नियम- कानून,
* इनपुट  क्रेडिट
उत्पादक/वितरक/दुकानदार के लिये ही है
ये उनका हेडेक है.......हमारा नहीं
मतलब
एक देश- एक टैक्स भले हो
पर
हम तो अनेक हैं एक देश में, अलग- अलग राज्यों में
मसलन
* नौकरी-पेशा वाले
* मजदुरी वाले
* खेती वाले
* गरीब/BPL
* BC/OBC/SC/ST/
* अल्पसंख्यक
* विभिन्न धर्म वाले
* विभिन्न जाति वाले
* उत्तर/दक्षिण/पूर्वी/पश्चिमी/मध्य भारतीय
* अति उच्च/उच्च/मिडिल/लोवर क्लास लोग
* उद्योग/दुकान वाले
* ठेले-खुमचे वाले
* दलाली वाले
* नेतागिरी वाले
* कोचिंग क्लासेस वाले
* ढ़ाबे/रेस्टोरेंट/ होटल वाले
* हास्पिटल वाले डाक्टर/नर्स और सपोर्टींगस्टाफ
* गृहणियां
* छात्र-छात्रायें
* सेना वाले
* देशभक्त और देश द्रोही
* पक्ष- विपक्ष
और भी न जाने क्या- क्या अनेकतायें विद्यमान कर दी गयी है हम सब में......ताकि लोकतंत्र में हम अर्थात जनता कभी भी श्रेष्ठ न हो सके और राजनीतिज्ञों की मनमानी लगातार चलती रहे.....
G reat
S trategic
T actics
अर्थात GST से हम सब नियंत्रित रहे हैं, हैं और होते भी  रहेगें, इसमे किसी को कोइ शक नहीं होना चाहिये
अपनी इच्छाओं की पूर्ति की अभिलाषा में निरन्तर दौड़ने वालों
चाहो, न चाहो,
पर
रुकना तो पड़ेगा ही
* स्वस्थ रहने पर सुकून भरे भोजन, बाल-बच्चों के प्यार और बिन्दास शयन के लिये....घर मे
* अस्वस्थ होने पर इलाज कराने और मेडीक्लेम भुनाने को......हास्पिटल में
* हलकी-फुलकी अस्वस्थता में आराम और प्यारी देखभाल के लिये.... घर पर
* अपने मातहत से समय से और सही काम करवाने को......अपने-अपने आफिस/दुकान/संस्थान में
अपनी इच्छाओं की पूर्ति की अभिलाषा में निरन्तर दौड़ने वालों
चाहो, न चाहो,
पर
रुकना तो पड़ेगा ही
* स्वस्थ रहने पर सुकून भरे भोजन, बाल-बच्चों के प्यार और बिन्दास शयन के लिये....घर मे
* अस्वस्थ होने पर इलाज कराने और मेडीक्लेम भुनाने को......हास्पिटल में
* हलकी-फुलकी अस्वस्थता में आराम और प्यारी देखभाल के लिये.... घर पर
* अपने मातहत से समय से और सही काम करवाने को......अपने-अपने आफिस/दुकान/संस्थान में

Thursday, 30 June 2011

प्राकृतिक गंगा का आर्थिक युग में होता हुआ हश्र


* अभी करीब एक माह पूर्व अपने देश भारत को विश्व बैंक से करीब साढ़े चार हज़ार करोड़ का क़र्ज़ "गंगा को प्रदुषण मुक्त" करने के लिए दिया गया है.
* सोचने की बात है कि हमारे कितने राजनीतिज्ञों और सरकारी हुक्मरानों नें कितना प्रयास किया होगा यह सिद्ध करने के लिए " हे विश्व बैंक! हमारी गंगा कितनी मैली हो गयी है" .
* विश्व बैंक भी समझ गया होगा कि "इंडियंस" इतने काबिल नहीं कि वे अपनी "गंगा मदर" को भी पवित्र और साफ सुथरा "अपने दम" पर रख सकें. सो, इस आर्थिक युग में, जहाँ यह समझा जाता है कि सारे काम "पैसे के दम" पर हो जाते हैं, "क़र्ज़ का झुनझुना" विश्व बैंक ने हमारे हुक्मरानों के गिडगिडाने पर अंततः पकड़ा ही दिया.
* भ्रष्टाचार विरोधियों को यह क़र्ज़ भ्रष्टाचार कि गंगोत्री नज़र आने लगी है २-जी स्पेक्ट्रम घोटाले कि तरह......
* सनद रहे कि हमारे पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के कार्यकाल में १९८४ में "स्वच्छ गंगा अभियान" के तहत "केंद्रीय गंगा प्राधिकरण" बना और उसके सहनशाहों के तत्वाधान में १९८५ में "गंगा कार्य योजना" प्रारंभ भी कि गयी थी. आज २६ वर्ष बाद भी करोड़ों रुपये खर्च दिखाकर भी गंगा को और भी बुरी तरह प्रदूषित होने से न बचा सके और अपने दम से हताश हो विश्व बैंक के दम कि गुजारिश कर उठे.....
* सब समझदार हैं.....और सब समझते हैं कि इस क़र्ज़ का भी हश्र क्या होगा...... आने वाले समय में ठेके मिलने कि उम्मीद रखने वाले, ठेके देने वाले सब खुश, बाकि नाखुश.....

खैर.... उपरोक्त को नज़रंदाज़ करते हुए मुझे निम्न मुद्दे उठाने है.......
१. क्या प्राकृतिक उद्गम वाली सालों साल से प्रवाहित हो रही प्राकृतिक पवत्र गंगा ठहरे हुए पानी कि तरह प्रदूषित हो सकती है?
२. क्या कभी इस बात कि रिसर्च कि गयी कि गंगोत्री से निकलकर हुगली नदी में परिवर्तित हो कर बंगाल कि खाड़ी में सहित होने वाली प्राकृतिक पवित्र गंगा में प्रदुषण का स्तर हर एक किलोमीटर पर कितना है?
३. क्या क्रमशः बढ़ते प्रदुषण स्तर के आधार पर गंगा मैली करने वाले कारकों का अध्धयन किया गया, यदि किया गया तो कारकों को समाप्त करने के क्या उपक्रम किये गए.....
४. "रुट काज एनालिसिस" के आधार पर गंगा को प्रदूषित करने में सर्वाधिक कारण "प्रशासन क़ी नीतियों और उसके आधे-अधूरे कार्यान्वयन" का ही आएगा . उद्योग धंधें भी कमतर नहीं आंके जा सकते. उपरोक्त के मद्देनज़र प्रशासनिक विफलता के चलते और प्रदूषित करने वालों पर भरी भरकम जुर्माना लगाने के बजाये ईमानदार देशवासियों पर क़र्ज़ का बोझ डालना क्या उचित है?
५. प्रदुषण निवारण के बजाये, प्रदूषित करने के कारकों पर रोक क्यों नहीं लगाई जाती?
६. आज हर कंपनी अपनी बैलेंस शीट में करोड़ों का मुनाफा दिखने में अपनी तरक्की समझती है, पर गंगा मैली न होने पाए इसके लिए तनिक भी प्रयास नहीं किये जाते.... यदि यही गर्व है तो "शर्म" शब्द को शब्दकोष से क्या नहीं हटा देना चाहिए?