श्रद्धा
(५४)
पाता सागर कैसे इतना जल
हिमशिखर यूँ अगर नहीं पिघलता
मेरुशिखर पर कैसे हिम जुटता
बन वाष्प समुद्र जल यदि न उड़ता
दे रही प्रकृति संदेश यथेष्ट
इक-दूजे के सब पूरक श्रेष्ठ
श्रद्धा - भावों में रमने वाला
वाद-विवाद में न कभी उलझता
अविचल सूर्य चन्द्रमा रहता
ReplyDeleteसीखें हम भी ये अविचलता
गर मानव भी सोचे सबकी
हिमगिरि इतना नहीं पिघलता
श्रद्धा - भावों में रमने वाला
ReplyDeleteवाद-विवाद में न कभी उलझता
अति-सुन्दर
श्याम सखा
आपकी टिपण्णी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया!
ReplyDeleteआप जैसे महान लेखक का टिपण्णी मिलने पर लिखने का उत्साह और बढ जाता है पर आपके कविता के सामने मेरी शायरी कुछ भी नहीं है! आप एक उम्दा लेखक हैं और आपकी जितनी भी तारीफ की जाए कम है!
आपका ये कविता मुझे बेहद पसंद आया ! बहुत बढ़िया !
श्रद्धावान वाद विवाद में नहीं उलझता - यह कोण ध्यान नहीं दिया था। पर सोचने में सही लगता है!
ReplyDeleteश्रद्धावान जिहाद भी नहीं करता शायद।
श्रद्धा - भावों में रमने वाला
ReplyDeleteवाद-विवाद में न कभी उलझता
bahut sundar likha he/ chhandbadhdh kavitao me apna ek alag aanand hota he// achchi lagi rachna
श्रद्धा - भावों में रमने वाला
ReplyDeleteवाद-विवाद में न कभी उलझता
सचमुच जहां श्रद्धा है, वहां तो विवाद ठहर ही नहीं सकता.....किन्तु अगर श्रद्धा कहीं अन्धश्रद्धा में बदल जाए तो कभी न कभी अवश्य ही विवादों को जन्म दे देती है.
श्रद्धा - भावों में रमने वाला
ReplyDeleteवाद-विवाद में न कभी उलझता
ये ही यथेष्ठ है..और सर्वोपरि!!
सुन्दर और सारगर्भित!
ReplyDelete... अदभुत, अतिसुन्दर, प्रभावशाली व प्रसंशनीय अभिव्यक्ति ।
ReplyDeleteअति-सुन्दर- भाव
ReplyDeleteसभी ने तारीफ में इतना कुछ लिख दिया...है..!मैं भी उनसे सहमत हूँ...एक बेहतरीन रचना के लिए धन्यवाद...
ReplyDeleteबहुत प्रेरणा दायक लगा इस रचना के रूप में यह सन्देश .शुक्रिया
ReplyDeleteदे रही प्रकृति संदेश यथेष्ट
ReplyDeleteइक-दूजे के सब पूरक श्रेष्ठ
wah atisunder
वाह....बहुत ही सहज......यथार्थ रचना है..............सच में सब इक दूजे के पूरक ही हैं
ReplyDeleteशाशाक्त और सुन्दर चिंतन .............. लाजवाब है
दे रही प्रकृति संदेश यथेष्ट
ReplyDeleteइक-दूजे के सब पूरक श्रेष्ठ
वाकई प्रकृति के सन्देश को समझने की जरुरत है.
"भावों में रमने वाला वाद-विवाद में न कभी उलझता"
ReplyDeletewaah...bahut sundar.
श्रद्धा - भावों में रमने वाला
ReplyDeleteवाद-विवाद में न कभी उलझता
उत्कृष्ट भाव !
bahut sundar rachna hai.... shukria humko padae ke liye........
ReplyDeleteकम शब्दों में गहरी बात। वाह।
ReplyDeleteसादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com
bahut sundar sir javaab nahi hai
ReplyDeleteश्रद्धा - भावों में रमने वाला
ReplyDeleteवाद-विवाद में न कभी उलझता
Gagar me sagar.Badhai.
बहुत सुन्दर!!
ReplyDelete>इतनी प्रवाहयुक्त, तर्कसंगत एवं यथार्थ के धरातल पर खड़ी रचना की प्रशंसा के लिए शब्द नहीं हैं मेरे पास. आपकी रचनाओं ने स्तब्ध कर दिया है. वैसे मेरे बारे में आपकी धारणा गलत बन ही चुकी होगी. मैं भी क्या करता, एक माह का समय कैसे बीता और कैसे बिताया, सोच कर कलेजा काँप जाता है. मैं चाहकर भी सिस्टम और नेट तक नहीं जा सकता था. मुझे ज्ञात है कि आप ने कई संदेश भेजे लेकिन मेरी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली. भाई, आज ही ब्लॉग पर एक रचना पोस्ट की है और बारी बारी सभी स्नेहीजनों से सम्पर्क कर क्षमा मांग रहा हूँ. आप से भी अपेक्षा है कि मेरी मजबूरी समझकर क्षमा प्रदान करेंगे
ReplyDeleteunnat vicharon se paripurn rachna. badhai.
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